कभी प्याज से चमकता था नागौर, अब जल संकट ने बदली तस्वीर, अब इस नकदी फसल पर दांव लगा रहे किसान

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घटते भूजल ने बदला खेती का गणित, प्याज छोड़ इस नकदी फसल पर दांव लगा रहे किसान
Last Updated:June 19, 2026, 15:26 IST
Nagaur Roon region Onion cultivation Crisis: नागौर के रूण क्षेत्र में कभी बड़े पैमाने पर होने वाली तीन पत्ती प्याज की खेती अब तेजी से सिमट रही है. घटते भूजल स्तर, बढ़ती लागत और बाजार में कम भाव मिलने के कारण किसान इस पारंपरिक फसल से दूरी बना रहे हैं. जहां कुछ वर्ष पहले 100 से 200 हेक्टेयर क्षेत्र में प्याज की खेती होती थी, वहीं अब इसका रकबा घटकर करीब 20 हेक्टेयर रह गया है. किसान अब कम पानी और कम लागत में बेहतर मुनाफा देने वाली पान मेथी जैसी नकदी फसलों को अपनाने लगे हैं. किसानों को डर है कि जल संरक्षण की समुचित व्यवस्था नहीं हुआ तो प्याज की खेती और घट सकती है.
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नागौर: कभी मिर्च और तीन पत्ती प्याज की खेती के लिए पहचान रखने वाला रूण क्षेत्र अब खेती के बदलते स्वरूप का साक्षी बन रहा है. घटते भूजल स्तर, बढ़ती उत्पादन लागत और बाजार में फसलों के कम भाव के कारण किसान पारंपरिक प्याज की खेती से दूरी बना रहे हैं. इसके स्थान पर अब किसान कम पानी में अधिक लाभ देने वाली पान मेथी जैसी नकदी फसलों की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं. किसान और कृषि विभाग के अनुसार, कुछ वर्ष पहले तक रूण क्षेत्र में 100 से 200 हेक्टेयर भूमि पर तीन पत्ती प्याज की खेती होती थी. उस समय यह फसल किसानों की आय का प्रमुख आधार मानी जाती थी.
खेतों में दूर-दूर तक प्याज की फसल लहलहाती नजर आती थी, लेकिन वर्तमान में इसका रकबा सिमटकर करीब 20 हेक्टेयर रह गया है. कृषि पर्यवेक्षक अनिल कुमार वर्मा ने बताया कि प्याज की खेती की प्रक्रिया लंबी और अधिक मेहनत वाली होती है. अक्टूबर-नवंबर में नर्सरी तैयार की जाती है तथा जनवरी-फरवरी में पौधों की खेतों में रोपाई की जाती है. रोपाई के तुरंत बाद सिंचाई की आवश्यकता होती है और पूरे फसल चक्र के दौरान नियमित पानी, खाद और देखभाल करनी पड़ती है. लगभग चार से पांच माह बाद अप्रैल-मई में फसल तैयार होकर कटाई योग्य होती है.
थांवला क्षेत्र से मंगवाया जाता है बीज
उन्होंने बताया कि एक बीघा भूमि में करीब दो किलो बीज की आवश्यकता होती है. यह बीज मुख्य रूप से अजमेर और थांवला क्षेत्र से मंगवाया जाता है, जिसकी कीमत लगभग 1000 से 1200 रुपये प्रति किलो तक होती है. खेत की तैयारी के दौरान गोबर खाद डाली जाती है तथा फसल को रोगों और कीटों से बचाने के लिए दो से तीन बार स्प्रे भी करना पड़ता है. अनुकूल परिस्थितियों में एक बीघा भूमि से 40 से 60 क्विंटल तक प्याज का उत्पादन प्राप्त हो सकता है.
इस वजह से पान मैथी की ओर बढ़ रहे किसान
किसान शंकर गोलिया और मनीष गोलवा का कहना है कि लगातार गिरते जलस्तर ने खेती की दिशा बदल दी है. प्याज की फसल में पर्याप्त सिंचाई की आवश्यकता होती है, जबकि क्षेत्र में पानी की उपलब्धता लगातार कम होती जा रही है. इसके अलावा उत्पादन लागत बढ़ने के बावजूद बाजार में प्याज का भाव केवल 10 से 12 रुपये प्रति किलो मिलने से किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल रहा. ऐसे में किसान अब कम पानी और कम लागत में बेहतर आय देने वाली पान मेथी जैसी फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल संरक्षण के प्रभावी उपाय नहीं किए गए तो आने वाले वर्षों में क्षेत्र में प्याज की खेती और अधिक सीमित हो सकती.
About the Authordeep ranjan
दीप रंजन सिंह 2016 से मीडिया में जुड़े हुए हैं. हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, ईटीवी भारत और डेलीहंट में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 2022 से हिंदी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. एजुकेशन, कृषि, राजनीति, खेल, लाइफस्ट…और पढ़ें
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Location :
Nagaur,Rajasthan



