आज से करीब 150 साल पहले ऐसे होता था शिव का रुद्राभिषेक, बीकानेर की बही में दर्ज है कहानी

Last Updated:August 08, 2026, 12:07 IST
Bikaner Riyasat Shivbadi Temple: बीकानेर रियासतकाल में सावन के दौरान शिवबाड़ी मंदिर में बीकानेर दरबार की ओर से विशेष रुद्राभिषेक का आयोजन कराया जाता था. वर्ष 1876 की काउंसिल हुक्म की बही के अनुसार महाराजा डूंगरसिंह के काल में सावन के चारों सोमवार को शिवलिंग की जलेरी को दूध, दही, घी और शहद से भरने के लिए राजकोष से 331 रुपये 6 आने की राशि स्वीकृत की गई थी. राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के अभिलेख बताते हैं कि उस दौर में धार्मिक परंपराओं को राजदरबार का पूर्ण संरक्षण प्राप्त था.
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Bikaner: सावन का पवित्र महीना आते ही भगवान शिव की उपासना और आराधना की सदियों पुरानी सनातनी परंपराएं एक बार फिर जीवंत हो उठती हैं. जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और विशेष शिव पूजन के साथ सावन के सोमवार का सनातन धर्म में अत्यधिक धार्मिक महत्व माना गया है. राजस्थान की ऐतिहासिक बीकानेर रियासत में शिव आराधना की यह समृद्ध परंपरा केवल आमजन की श्रद्धा तक सीमित नहीं थी, बल्कि रियासतकाल में इसे सीधे बीकानेर राजदरबार का संरक्षण और वित्तीय सहयोग प्राप्त था.
राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के वरिष्ठ अनुसंधान अधिकारी डॉ. नितिन गोयल के अनुसार, रियासतकालीन हुक्म की बहियों में दर्ज विवरण बीकानेर की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का अमूल्य दस्तावेज हैं. वर्ष 1876 की काउंसिल हुक्म की बही में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि बीकानेर के प्रसिद्ध शिवबाड़ी मंदिर में सावन के सोमवार को शिवलिंग के विशेष अभिषेक के लिए सामग्री का प्रबंध सीधे राजकोष से किया जाता था. राजकोष से स्वीकृत यह राशि बताती है कि करीब डेढ़ शताब्दी पूर्व सावन में शिव पूजन केवल एक व्यक्तिगत अनुष्ठान नहीं था, बल्कि यह बीकानेर की राजकीय व्यवस्था और सामाजिक संस्कृति का अभिन्न अंग हुआ करता था.
महाराजा डूंगरसिंह के काल में चारों सोमवार को भरकर होता था जलाभिषेकडॉ. नितिन गोयल ने बताया कि तत्कालीन महाराजा डूंगरसिंहजी के शासनकाल में सावन महीने के चारों सोमवार को शिवबाड़ी स्थित मंदिरों में राजकीय स्तर पर भव्य धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते थे. इस पूजन के दौरान शिवलिंग के चारों ओर निर्मित जलेरी को दूध, दही, शुद्ध देसी घी और शहद जैसे पंचामृत द्रव्यों से पूरा भरकर भव्य रुद्राभिषेक संपन्न कराया जाता था. ऐतिहासिक अभिलेखों में इस पूरे आयोजन पर हुए व्यय का बाकायदा मद-वार ब्योरा दर्ज है. सावन के चारों सोमवार को जलेरी भरने के लिए राजकोष से दूध के लिए 74 रुपये, दही के लिए 17 रुपये, घी के लिए 161 रुपये और शहद के लिए 77 रुपये स्वीकृत किए गए थे. इस प्रकार कुल 331 रुपये 6 आने की राशि धार्मिक अनुष्ठान हेतु राजकोष से जारी की गई थी.
राजकोष से बजट आवंटन: राजकीय संरक्षण और लोक आस्था का अटूट रिश्ताधार्मिक अनुष्ठानों के लिए राजकोष से बाकायदा वित्तीय स्वीकृति जारी किया जाना उस दौर की शासन व्यवस्था और जन-आस्था के बीच के प्रगाढ़ संबंध को उजागर करता है. बीकानेर दरबार केवल परंपराओं का हिस्सा ही नहीं बनता था, बल्कि लोक आस्था से जुड़े सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजनों को आवश्यक अनुदान देकर उनके संरक्षण में मुख्य भूमिका निभाता था. आज भी जब सावन के सोमवार को बीकानेर के शिव मंदिरों में जलाभिषेक की परंपरा निभाई जाती है, तो रियासतकाल के ये प्राचीन दस्तावेज इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक गहराई की याद ताजा कर देते हैं.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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Bikaner,Bikaner,Rajasthan
First Published :
August 08, 2026, 12:07 IST



