विश्व योग दिवस पर बड़ा खुलासा! 125 साल पुरानी जैन पांडुलिपि में मिले योग के दुर्लभ प्रमाण, जानें क्या है रहस्य

Last Updated:June 21, 2026, 10:29 IST
International Yoga Day: विश्व योग दिवस के अवसर पर सामने आई 125 वर्ष पुरानी एक दुर्लभ पांडुलिपि ने योग के इतिहास से जुड़े महत्वपूर्ण प्रमाणों को उजागर किया है. इस प्राचीन दस्तावेज में उल्लेख मिलता है कि योग केवल शारीरिक अभ्यास नहीं था, बल्कि जैन मुनियों की दैनिक दिनचर्या और आध्यात्मिक साधना का अहम हिस्सा माना जाता था. पांडुलिपि में विभिन्न योग क्रियाओं, ध्यान पद्धतियों और अनुशासित जीवनशैली का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो उस समय की आध्यात्मिक परंपराओं को दर्शाता है. शोधकर्ताओं के अनुसार यह दस्तावेज भारतीय योग परंपरा की प्राचीनता और व्यापकता को प्रमाणित करने वाला महत्वपूर्ण स्रोत है. विश्व योग दिवस के मौके पर यह खोज न केवल योग के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करती है.
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बीकानेर. आज पूरा विश्व अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मना रहा है. आधुनिक जीवनशैली में योग को स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन का आधार माना जाता है, लेकिन बीकानेर में संरक्षित एक दुर्लभ पांडुलिपि इस बात का प्रमाण देती है कि योग सदियों पहले भी भारतीय जीवन और विशेष रूप से जैन मुनियों की दैनिक दिनचर्या का अभिन्न अंग था. बीकानेर स्थित राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान में सुरक्षित करीब 125 वर्ष पुरानी एक दुर्लभ पांडुलिपि में 108 योग आसनों का चित्रित एवं विस्तृत वर्णन मिलता है, जो तत्कालीन समय में योग की समृद्ध परंपरा को दर्शाता है.
राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान में सुरक्षित यह दुर्लभ पांडुलिपि आज भी शोधार्थियों और इतिहासकारों के लिए अध्ययन का महत्वपूर्ण स्रोत बनी हुई है तथा भारतीय योग परंपरा की समृद्ध विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य कर रही है. राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के वरिष्ठ अनुसंधान अधिकारी डॉ. नितिन गोयल ने बताया कि संस्थान में लगभग 30 हजार दुर्लभ पांडुलिपियाँ संरक्षित हैं. इनमें से एक विशेष पांडुलिपि 19वीं शताब्दी की है, जो लगभग 125 वर्ष पुरानी मानी जाती है. यह पांडुलिपि जैन परंपरा से जुड़ी हुई है और इसमें जैन मुनियों की दैनिक साधना में योग के महत्व का विस्तृत उल्लेख किया गया है.
योगाभ्यास कर अपने शरीर और मन को स्वस्थउन्होंने बताया कि इस पांडुलिपि में कुल 108 योग आसनों का चित्रों सहित वर्णन किया गया है. इनमें कई ऐसे दुर्लभ आसन भी शामिल हैं जो वर्तमान समय में लगभग प्रचलन से बाहर हो चुके हैं. उदासीनासन, कर्मुकतवासन सहित अनेक पारंपरिक योग मुद्राओं का इसमें विस्तार से उल्लेख मिलता है. इन आसनों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि जैन मुनि नियमित रूप से योगाभ्यास कर अपने शरीर और मन को स्वस्थ, संयमित एवं सशक्त बनाए रखते थे.
हिंदी तथा गुजराती भाषा में भी अनुवाद दिया गयाडॉ. गोयल ने बताया कि पांडुलिपि का पहला पृष्ठ विशेष रूप से आकर्षक है. इसमें एक योगी का योगासन करते हुए सुंदर चित्र बनाया गया है. चित्र के नीचे संस्कृत भाषा में श्लोक लिखे गए हैं. इसके साथ ही उन्हीं श्लोकों का हिंदी तथा गुजराती भाषा में भी अनुवाद दिया गया है. तीन भाषाओं में प्रस्तुत सामग्री इस पांडुलिपि की प्रमाणिकता और उस समय विभिन्न भाषाओं के माध्यम से ज्ञान के प्रसार की परंपरा को भी दर्शाती है.
योग संबंधी ज्ञान की समृद्ध परंपरा को भी प्रदर्शित करतेउन्होंने बताया कि यह पांडुलिपि हस्तनिर्मित कागज (हैंडमेड पेपर) पर तैयार की गई है. इसमें कुल 53 पृष्ठ हैं और प्रत्येक पृष्ठ के आगे-पीछे योग आसनों का चित्रात्मक एवं लिखित विवरण अंकित है. चित्रों के साथ दिए गए विवरण उस समय की चित्रकला, लेखन शैली और योग संबंधी ज्ञान की समृद्ध परंपरा को भी प्रदर्शित करते हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार यह पांडुलिपि केवल योग के इतिहास का दस्तावेज नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक परंपरा और ज्ञान-विज्ञान की विरासत का भी महत्वपूर्ण प्रमाण है. यह बताती है कि योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि अनुशासित और संतुलित जीवनशैली का हिस्सा रहा है. विश्व योग दिवस के अवसर पर सामने आया यह ऐतिहासिक दस्तावेज इस बात को और अधिक मजबूती से स्थापित करता है कि भारत में योग की परंपरा सदियों पुरानी है और विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक परंपराओं ने इसे अपने जीवन का महत्वपूर्ण अंग बनाया था.
About the AuthorJagriti Dubey
Hi, I am Jagriti Dubey, a media professional with 6 years of experience in social media and content creation. I started my career with an internship at Gbn 24 news channel in 2019 and have worked with many repu…और पढ़ें
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