क्यों पड़ा ‘भाद्राजून’ नाम? महाभारत काल की सुभद्रा-अर्जुन प्रेम कथा से जुड़ा है इतिहास

Last Updated:June 29, 2026, 14:54 IST
Bhadrajun Jalore Mahabharat Subhadra Arjun Connection: जालोर जिले का ऐतिहासिक कस्बा ‘भाद्राजून’ महाभारत काल में अर्जुन और सुभद्रा के विवाह का साक्षी माना जाता है. लोक मान्यता के अनुसार, द्वारिका से निकलने के बाद दोनों ने इसी स्थान पर वैदिक रीति से विवाह किया था, जहाँ अर्जुन ने अपना कड़ा (शंख) दान किया, जिससे पास के स्थान का नाम ‘शंखवाली’ पड़ा. इतिहासकार बंशीलाल सोनी के अनुसार, ‘सुभद्रा-अर्जुन’ नाम के ही भाषाई अपभ्रंश से इस कस्बे का नाम समय के साथ बदलकर ‘भाद्राजून’ हो गया.
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Bhadrajun Jalore History: राजस्थान का मारवाड़ अंचल और जालोर जिला अपने प्राचीन किलों, शौर्य गाथाओं और अनूठी विरासत के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है. लेकिन इसी जालोर जिले में स्थित ‘भाद्राजून’ कस्बा अपने भीतर सिर्फ पत्थरों का इतिहास ही नहीं, बल्कि द्वापर युग यानी महाभारत काल की एक अनोखी और अमर प्रेम कहानी भी समेटे हुए है. यह पौराणिक और आध्यात्मिक कहानी साक्षात भगवान श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा और सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर पांडुपुत्र अर्जुन के पावन विवाह से जुड़ी हुई मानी जाती है. स्थानीय लोक मान्यताओं और मारवाड़ के इतिहासकारों के अनुसार, आज के ‘भाद्राजून’ कस्बे का नामकरण भी इसी अद्भुत प्रेम कथा के ताने-बाने से निकला है.
इतिहासकार बंशीलाल सोनी ने इस स्थान की ऐतिहासिकता के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि महाभारत काल में अर्जुन और सुभद्रा का प्रेम संबंध और विवाह भारतीय इतिहास की सबसे चर्चित घटनाओं में से एक है. पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम मित्र और सखा अर्जुन को अपनी दिव्य नगरी द्वारिका आमंत्रित किया था. द्वारिका प्रवास के दौरान ही अर्जुन और सुभद्रा के बीच का अनुराग और भी अधिक गहरा हो गया. लेकिन उस दौर की परिस्थितियों को देखते हुए यह प्रेम विवाह इतना सहज और आसान नहीं था, क्योंकि बलराम सुभद्रा का विवाह किसी और से करना चाहते थे. ऐसे में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इस विवाह का गुप्त रूप से पूर्ण समर्थन किया और अर्जुन को कूटनीतिक सलाह दी कि वे सुभद्रा का हरण कर (लेकर) यहाँ से तुरंत प्रस्थान कर जाएं.
शंखवाली और भाद्राजून: जहाँ अर्जुन-सुभद्रा ने दान किए थे अपने आभूषणश्रीकृष्ण के परामर्श पर अर्जुन और सुभद्रा रथ पर सवार होकर द्वारिका नगरी से निकल गए और सुरक्षित दूरी बनाते हुए सुदूर जंगलों व अरावली की शांत घाटियों की ओर चले गए. लंबे और थका देने वाले सफर के बाद जब वे जालोर क्षेत्र के एक बेहद शांत, सुरक्षित और मनोरम स्थान पर पहुंचे, तो दोनों ने निर्णय लिया कि अब वैदिक रीति-रिवाजों के साथ विवाह बंधन में बंधना उचित होगा.
इस दिव्य विवाह से जुड़ी मुख्य मान्यताएं इस प्रकार हैं:
देवताओं की उपस्थिति: लोक मान्यता है कि अर्जुन (जिन्हें देवराज इंद्र का अंश/पुत्र माना जाता है) के इस पावन विवाह के साक्षी बनने के लिए स्वयं इंद्र देव और उनकी पत्नी शची भी अदृश्य रूप से उस स्थान पर अवतरित हुए थे.
वैदिक विवाह और आभूषण दान: जंगलों में निवास करने वाले एक सिद्ध ब्राह्मण ने पूरी विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ सुभद्रा और अर्जुन का पाणिग्रहण संस्कार संपन्न कराया. विवाह के उपरांत दक्षिण स्वरूप अर्जुन ने अपने हाथ का दिव्य कड़ा (जिसे पौराणिक संस्कृत में शंख कहा जाता था) और माता सुभद्रा ने अपने कानों की अमूल्य बाली (कुंडल) उस पुरोहित को भेंट स्वरूप सहर्ष अर्पित कर दी.
शंखवाली का नामकरण: स्थानीय निवासियों का दृढ़ विश्वास है कि जिस पावन स्थान पर अर्जुन और सुभद्रा ने अपने ये आभूषण दान किए थे, उस जगह का नाम कालान्तर में ‘शंखवाली’ पड़ गया, जो आज भी इसी नाम से जालोर में स्थित है.
सदियों के भाषाई अपभ्रंश से ‘सुभद्रा-अर्जुन’ बन गया ‘भाद्राजून’स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, जहाँ इस अलौकिक विवाह की रस्में शुरू हुईं और दोनों का मिलाप हुआ, उस पूरे क्षेत्र को शुरुआत में श्रद्धापूर्वक ‘सुभद्रा-अर्जुन’ क्षेत्र के नाम से पुकारा जाने लगा. समय के चक्र के साथ जैसे-जैसे भाषा, बोलचाल और स्थानीय मारवाड़ी उच्चारण में बदलाव आया, यह बड़ा नाम आम जनमानस की जुबान पर छोटा होता चला गया. सदियों के भाषाई अपभ्रंश (बदलाव) के दौर से गुजरते हुए ‘सुभद्रा-अर्जुन’ का नाम धीरे-धीरे बदलकर पहले ‘भाद्राजुन’ और अंततः आज का ‘भाद्राजून’ बन गया. यही नाम आज इस गौरवशाली ऐतिहासिक कस्बे और वहाँ के सुप्रसिद्ध किले की मुख्य पहचान बन चुका है.
जालोर और मारवाड़ के इतिहासकारों का भी स्पष्ट मानना है कि इस संपूर्ण भू-भाग में प्राचीन पाषाण काल और वैदिक काल से ही मानव बसावट के प्रमाण मिलते रहे हैं, और कई पौराणिक कथाएं यहाँ की अनूठी लोकसंस्कृति और लोकगीतों का अभिन्न हिस्सा रही हैं. हालांकि, हजारों साल पुरानी इन कथाओं के प्रत्यक्ष पुरातात्विक या लिखित ऐतिहासिक साक्ष्य बेहद सीमित हैं, लेकिन पीढ़ियों से दादा-दादी और नानी की कहानियों के माध्यम से चली आ रही ये जीवंत मान्यताएं और अटूट आस्था आज 5 हजार साल बाद भी सुभद्रा-अर्जुन की कहानी को भाद्राजून की वादियों में जिंदा रखे हुए हैं.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें
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