Hyderabad | Story | हैदराबाद में प्लास्टिक के तंबू के नीचे बनते हैं क्रिकेट बैट, संघर्ष की यह कहानी कर देगी भावुक

Last Updated:June 29, 2026, 11:27 IST
Hyderabad News : हैदराबाद की चमक-दमक के बीच एक ऐसी दुनिया भी बसती है, जहां परिवार प्लास्टिक के तंबुओं के नीचे क्रिकेट बैट बनाकर अपना जीवन चलाते हैं. ईएसआई अस्पताल के पीछे लगी छोटी-छोटी दुकानों में सुबह से शाम तक लकड़ी को तराशने, सैंडिंग करने और बैट तैयार करने का काम चलता है. पुरुषों के साथ महिलाएं भी इस काम में बराबरी से हाथ बंटाती हैं. बारिश का मौसम इनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है, क्योंकि पानी भरने से तैयार माल खराब हो जाता है और कई दिनों तक कमाई भी नहीं हो पाती. इसके बावजूद इन परिवारों ने उम्मीद नहीं छोड़ी है. उनका सबसे बड़ा सपना अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाकर इस कठिन पेशे से दूर बेहतर जीवन देना है. संघर्ष, मेहनत और आत्मसम्मान से भरी यह कहानी बताती है कि कठिन परिस्थितियों में भी इंसान उम्मीद के सहारे आगे बढ़ता रहता है और भविष्य के बेहतर कल का सपना देखना कभी नहीं छोड़ता.
हैदराबाद. चारमीनार और हाई-टेक सिटी के इस महानगर में, जहां गगनचुंबी इमारतें और मेट्रो ट्रेनें आधुनिक भारत की तस्वीर पेश करती हैं, वहीं सड़कों के किनारे एक और भारत भी बसता है. यह मेहनत, मजबूरी और कभी न टूटने वाली उम्मीद का भारत है. हैदराबाद के ईएसआई अस्पताल के ठीक पीछे प्लास्टिक के तंबुओं के नीचे चल रही क्रिकेट के बल्ले बनाने वाली 10 छोटी दुकानें इसी संघर्ष की गवाह हैं.
ये दुकानें उन परिवारों की हैं, जो सालों पहले बेहतर भविष्य की तलाश में एक ही गांव से यहां आए थे. कभी ये लोग शहर की मुख्य सड़क पर अपनी रोजी-रोटी कमाते थे, लेकिन मेट्रो रेल परियोजना शुरू होने के बाद उन्हें वहां से हटा दिया गया. धूल और लकड़ी के बुरादे से सने एक कारीगर ने अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा- अच्छे घर में रहने का मन तो हर किसी का होता है, लेकिन मजबूरी ऐसी है कि यहां रहना पड़ता है.
सुबह से शाम तक मेहनत, परिवार भी देता है साथइन कारीगरों की दिनचर्या सुबह 10 बजे से शुरू होकर देर शाम तक चलती है. दोपहर में भोजन के लिए मिलने वाले एक-दो घंटे के विराम को छोड़कर वे पूरे दिन लकड़ी को तराशने, सैंडिंग करने और उस पर चमकीले स्टिकर लगाने में व्यस्त रहते हैं. परिवार की महिलाएं भी इस काम में बराबरी से हाथ बंटाती हैं. वे न केवल बल्लों की फिनिशिंग करती हैं, बल्कि ग्राहकों को संभालने का काम भी करती हैं.
बारिश बन जाती है सबसे बड़ी परेशानीहालांकि, इनका यह सफर आसान नहीं है. बारिश का मौसम इनके लिए किसी अभिशाप से कम नहीं होता. प्लास्टिक के अस्थायी टेंटों में पानी भर जाता है, जिससे तैयार माल खराब हो जाता है और ग्राहक भी बहुत कम आते हैं. कारीगर मनोज बताते हैं कि कई बार पूरा दिन बिना एक भी रुपये की कमाई के गुजर जाता है. जब पैसे नहीं होते, तो जो थोड़ा-बहुत राशन बचा होता है, उसी से खाना बनाकर गुजारा करना पड़ता है. हालांकि, वे यह भी कहते हैं कि हैदराबाद की एक बात उन्हें हमेशा हिम्मत देती है. अगर कभी कारोबार न भी हो, तो यहां के कई लोग उन्हें भूखा नहीं रहने देते और अपने स्तर पर भोजन देकर मदद करते हैं.
बच्चों के लिए देखते हैं बेहतर भविष्यइस काम में शारीरिक मेहनत बहुत ज्यादा है, लेकिन उसके मुकाबले आमदनी काफी कम है. यही वजह है कि जिन कारीगरों ने अपने पिता से यह हुनर सीखा, वे अब अपनी अगली पीढ़ी को इस पेशे में नहीं लाना चाहते. उनका सपना है कि उनके बच्चे अच्छी शिक्षा हासिल करें और सम्मानजनक नौकरी करें. तमाम अभावों के बावजूद जब उनके बच्चे क्रिकेट खेलने की जिद करते हैं, तो ये माता-पिता अपनी सारी थकान भूलकर उनके साथ खेलने लगते हैं. बच्चों की मुस्कान में ही उन्हें अपनी खुशियां नजर आती हैं. यह कहानी सिर्फ बल्ले बनाने वाले इन कारीगरों की नहीं, बल्कि उस जज्बे की है जो हर मुश्किल और हर विपरीत परिस्थिति के बावजूद उम्मीद का दामन नहीं छोड़ता.
About the AuthorAnand Pandey
आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें
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