आधी रात की मैगी, रूफटॉप कैफे और होमली वाइब्स… कोटा का ऐसा गर्ल्स हॉस्टल, जहां वार्डन नहीं, ओनर खुद पूछती हैं ‘खाना खाया?’

कोटा. देश की कोचिंग सिटी के रूप में मशहूर कोटा का ‘लैंडमार्क सिटी’ इलाका. अमूमन इस पूरे इलाके की सुबह किताबों के पन्नों को पलटने के साथ शुरू होती है और रातें कॉम्पिटिशन के भारी-भरकम प्रेशर के साथ गुजरती हैं. लेकिन इसी स्टूडेंट एरिया के बीचों-बीच एक ऐसा गर्ल्स हॉस्टल भी मौजूद है, जिसने कोटा के ट्रेडिशनल और पुराने हॉस्टल कल्चर को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है.
हाई-स्पीड इंटरनेट, ओपन जिम और सबसे खास बात देर रात में पढ़ाई के बीच अचानक लगने वाली भूख को शांत करने के लिए एक रूफटॉप कैफे. जी हां, कोटा का ‘मधुराम हॉस्टल’ इस वक्त शहर का इकलौता ऐसा हॉस्टल होने का दावा कर रहा है, जहां छात्राओं को पढ़ाई के बेहतरीन माहौल के साथ-साथ वो हर लग्जरी और केयर मिल रही है, जो उन्हें अपने घर की याद बिल्कुल नहीं आने देती.
बिजनेस नहीं, बॉन्डिंग: खुद वार्डन बनकर छात्राओं के बीच पहुंचती हैं कविताजब हमारी ग्राउंड टीम इस खास हॉस्टल के अंदर पहुंची, तो मुख्य एंट्री गेट से ही यहां की वाइब्स काफी पॉजिटिव और सुकून देने वाली नजर आईं. हॉस्टल की दीवारों पर जगह-जगह सुंदर और प्रेरक मोटिवेशनल पोस्टर्स लगे हुए हैं, जो सीधे तौर पर यहां रहने वाले स्टूडेंट्स के माइंडसेट को हिट करते हैं. हॉस्टल की ओनर कविता राठी ने इस बारे में बात करते हुए बताया, “हमारा मुख्य मकसद स्टूडेंट्स को सिर्फ रहने के लिए एक कमरा देना भर नहीं है. हम हॉस्टल में आने वाली सभी छात्राओं को मानसिक रूप से इतना मोटिवेट करते हैं कि जैसे ही वो हॉस्टल के अंदर कदम रखें, उन्हें अपनी सबसे पहली प्रायोरिटी याद रहे कि वो यहां अपने और अपने माता-पिता का सपना पूरा करने के लिए आई हैं.”
यूं तो कविता राठी खुद एक वर्किंग वुमन हैं और यह हॉस्टल उनके हस्बैंड का है. हॉस्टल की रोजमर्रा की देखभाल के लिए उन्होंने बकायदा वार्डन भी रखी हुई है, लेकिन कविता को व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि सिर्फ स्टाफ के भरोसे इतनी दूर से आईं बच्चियों को अकेला नहीं छोड़ा जा सकता. यही बड़ी वजह है कि वो खुद रोज नियम से हॉस्टल पहुंचती हैं, गर्ल्स स्टूडेंट्स के बीच बैठती हैं, उनका हाल-चाल जानती हैं और उनकी पढ़ाई का फीडबैक लेती हैं. कविता कहती हैं, “कोटा में हॉस्टल्स की कोई कमी नहीं है, लेकिन हमने कुछ अलग करने का सोचा. लड़कियां अपने घर से बहुत दूर हैं, उन्हें यहां अकेलापन न खले, इसलिए मैं खुद उनके साथ टाइम स्पेंड करती हूं ताकि उन्हें बिल्कुल ‘घर जैसा फील’ हो सके.”
‘लेट नाइट क्रेविंग्स’ का परफेक्ट इलाज है हॉस्टल का रूफटॉप कैफेकोटा के आम हॉस्टल्स की बात करें तो वहां सुबह के नाश्ते, दोपहर और रात के खाने का एक फिक्स टाइम होता है. अगर स्टूडेंट पढ़ाई के चक्कर में थोड़ा भी लेट हुआ, तो उसे अक्सर भूखे पेट ही सोना पड़ता है. लेकिन मधुराम हॉस्टल की कहानी इससे पूरी तरह अलग है. इस हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करने वाली स्टूडेंट प्राची ने लोकल 18 से बातचीत करते हुए अपना निजी एक्सपीरियंस शेयर किया.
प्राची ने बताया, “जब हम रात में देर तक जागकर पढ़ाई करते हैं, तो भूख लगना बेहद लाजमी है. ऐसे में हमें खाने-पीने की चीजों के लिए रात में हॉस्टल से बाहर भटकने की जरूरत नहीं होती. हमारे हॉस्टल की छत पर ही एक बेहद शानदार रूफटॉप कैफे बना हुआ है. वहां जाकर हम आधी रात को भी जो कुछ ऑर्डर करते हैं, वो तुरंत फ्रेश और गरम बनकर हमें मिल जाता है. मुझे और मेरी फ्रेंड्स को रात में गरम मैगी खाना, फ्रेश जूस या शेक पीना सबसे ज्यादा पसंद है. यहां खाने का कोई टाइमिंग प्रेशर नहीं है. यह आजादी हमें पूरी तरह फील कराती है कि हम हॉस्टल में नहीं, बल्कि अपने ही घर में हैं.” ऐसे में जहां पढ़ाई का प्रेशर आज कोटा के स्टूडेंट्स के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है, वहीं इस हॉस्टल की यह अनूठी पहल दिखाती है कि अगर बच्चों को सही माहौल, सही मोटिवेशन और घर जैसा सपोर्ट मिले, तो उनकी मुश्किल राहें भी काफी आसान हो सकती हैं.



