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न GPS, न डिजिटल टैग… पहले का देसी जुगाड़! घंटियों की मधुर धुन बता देती थी किसका है पशु, जानिए अनोखी परंपरा

Last Updated:July 02, 2026, 18:45 IST

Animal Bells: आधुनिक दौर में जहां पशुओं की पहचान के लिए डिजिटल टैग, जीपीएस ट्रैकर और माइक्रोचिप जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है, वहीं एक समय ऐसा भी था जब घंटियों की मधुर आवाज ही पशुओं और उनके मालिक की पहचान बनती थी. राजस्थान सहित देश के कई ग्रामीण इलाकों में गाय, बैल, ऊंट और भेड़ों के गले में अलग-अलग आकार और ध्वनि वाली घंटियां बांधी जाती थीं. इनकी अनोखी आवाज सुनकर चरवाहे और ग्रामीण कई किलोमीटर दूर से ही पहचान लेते थे कि कौन-सा पशु किस दिशा में है और उसका मालिक कौन है. यह परंपरा केवल सुविधा का माध्यम नहीं थी, बल्कि ग्रामीण संस्कृति, पशुपालन और लोक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा भी थी.

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जोधपुर: आज के आधुनिक दौर में पशुओं की पहचान के लिए डिजिटल टैग और नई तकनीकों का उपयोग किया जाता है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब राजस्थान के गांवों में केवल घंटियों की मधुर आवाज ही पशुओं और उनके मालिक की पहचान बन जाती थी। ऊंट, गाय, बैल, भेड़ और बकरियों के गले में अलग-अलग आकार और ध्वनि वाली घंटियां बांधी जाती थीं। इनकी आवाज इतनी विशिष्ट होती थी कि कई किलोमीटर दूर से ही पशुपालक समझ जाते थे कि कौन-सा पशु और किस मालिक का झुंड उनकी ओर आ रहा है। यह परंपरा केवल सुविधा का साधन नहीं, बल्कि राजस्थान की समृद्ध लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा थी.

इन घंटियों को स्थानीय कारीगर बड़ी बारीकी से तैयार करते थे. प्रत्येक घंटी का आकार, वजन और धातु इस तरह चुनी जाती थी कि उसकी आवाज दूसरे पशुओं की घंटियों से अलग हो.ऊंटों के लिए बड़ी और गूंजदार घंटियां बनाई जाती थीं, जबकि गाय, बैल, भेड़ और बकरियों के लिए अलग-अलग आकार की घंटियां तैयार होती थीं.पशुपालक इन आवाजों से अपने पशुओं की गतिविधियों पर नजर रखते थे और यदि कोई पशु झुंड से अलग हो जाए तो उसकी घंटी की आवाज सुनकर उसे आसानी से ढूंढ लिया जाता था.

ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्साराजस्थान के ग्रामीण इलाकों में घंटियों की यह मधुर ध्वनि सुबह से शाम तक वातावरण में गूंजती रहती थी। चरागाहों में चरते पशुओं की घंटियों की आवाज गांवों की पहचान बन चुकी थी.यह परंपरा पशुपालन की व्यवस्था को आसान बनाने के साथ-साथ लोकजीवन में संगीत जैसा अहसास भी भर देती थी.यही कारण है कि इन घंटियों को केवल उपयोगी वस्तु नहीं, बल्कि लोक शिल्प और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी माना जाता है.

संग्रहालयों में सहेजी गई धरोहरसमय के साथ आधुनिक तकनीक ने इन पारंपरिक घंटियों की जगह ले ली, लेकिन उनकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता आज भी कम नहीं हुई है. राजस्थान के कई संग्रहालयों और लोक विरासत केंद्रों में इन घंटियों को सुरक्षित रखा गया है, जहां देश-विदेश से आने वाले पर्यटक इन्हें देखकर उस दौर की जीवनशैली और पशुपालन की अनोखी परंपरा को समझते हैं. ये घंटियां आज भी इस बात की गवाही देती हैं कि राजस्थान की लोक संस्कृति केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि ऐसी अमूल्य धरोहर है जिसे आने वाली पीढ़ियों तक संजोकर रखना बेहद जरूरी है.

About the AuthorJagriti Dubey

Hi, I am Jagriti Dubey, a media professional with 6 years of experience in social media and content creation. I started my career with an internship at Gbn 24 news channel in 2019 and have worked with many repu…और पढ़ें

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