बाड़मेर में मस्जिदों पर बुलडोज़र, कोर्ट में कानूनी जंग… लेकिन थार में दिखी हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल

Last Updated:July 05, 2026, 09:01 IST
Barmer Mosque Demolition Case: राजस्थान के बाड़मेर और बीकानेर जिलों में अंतरराष्ट्रीय सीमा के 15 किलोमीटर के दायरे में 18 से 20 जून के बीच प्रशासन ने 12 मस्जिदों को ढहा दिया है. इसके विरोध में बाड़मेर के आठ और बीकानेर के चार सीमावर्ती गांवों में भारी आक्रोश है और लगातार व्यापक प्रदर्शन हो रहे हैं. जहां पीड़ित पक्ष ने बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के कार्रवाई का आरोप लगाकर राजस्थान हाई कोर्ट में याचिका दायर की है, वहीं स्थानीय स्तर पर हिंदू और मुस्लिम समुदायों ने एकजुट होकर अद्भुत भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश की है.
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बाड़मेर में मस्जिदों पर कार्रवाई के बाद बदली तस्वीर, हिंदू-मुस्लिम एक साथ आए, मामला हाई कोर्ट पहुंचा
Barmer Mosque Demolition Case: राजस्थान के संवेदनशील सीमावर्ती जिलों में हाल ही में की गई एक बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई ने राज्य में गंभीर कानूनी और सामाजिक बहस छेड़ दी है. बाड़मेर और बीकानेर के भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे इलाकों में अतिक्रमण हटाने के नाम पर एक बड़ा अभियान चलाया गया. इस अभियान के तहत 18 जून से 20 जून के बीच ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए कई धार्मिक ढांचों को जमींदोज़ कर दिया गया. इस कार्रवाई के खिलाफ पीड़ित पक्ष ने जहां सीधे राजस्थान हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, वहीं जमीनी स्तर पर ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा है जिसके चलते सीमावर्ती क्षेत्रों में लगातार व्यापक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं.
राजस्थान हाई कोर्ट में दाखिल की गई एक जनहित याचिका में प्रशासनिक कार्रवाई के चौकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं. याचिका के मुताबिक महज तीन दिनों के भीतर यानी 18 से 20 जून के अंतराल में कुल 12 मस्जिदों को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया गया. यह कार्रवाई बाड़मेर जिले के आठ सीमावर्ती गांवों और बीकानेर जिले के चार गांवों में अंजाम दी गई है. खास बात यह है कि ये सभी विध्वंस भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा के महज 15 किलोमीटर के बेहद संवेदनशील दायरे में किए गए हैं. इस कार्रवाई को लेकर स्थानीय मुस्लिम समाज में गहरा रोष व्याप्त है और वे इसे एकतरफा कार्रवाई बता रहे हैं.
गोचर भूमि और राष्ट्रीय सुरक्षा की दलील
स्थानीय प्रशासन और पुलिस विभाग इस पूरी कार्रवाई को नियमानुसार बता रहे हैं. अधिकारियों का तर्क है कि ये सभी धार्मिक ढांचे गोचर यानी सरकारी चरागाह भूमि पर अवैध रूप से बनाए गए थे. इसके अलावा प्रशासन ने इस कार्रवाई के पीछे हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से जारी उस निर्देश का भी हवाला दिया है जिसमें अंतरराष्ट्रीय सीमा के 15 किलोमीटर के दायरे में आने वाले सभी अवैध अतिक्रमणों के खिलाफ शून्य-सहिष्णुता यानी ज़ीरो-टॉलरेंस की नीति अपनाने को कहा गया था. हालांकि, स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि इस क्षेत्र में अन्य कई तरह के अतिक्रमण भी मौजूद हैं, लेकिन प्रशासन ने जानबूझकर केवल एक वर्ग विशेष के धार्मिक स्थलों को ही निशाना बनाया है.
नियमों को ताक पर रखकर कार्रवाई करने का आरोप
ग्रामीणों का सबसे बड़ा आरोप यह है कि इस पूरी कार्रवाई में स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं और माननीय सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का खुलेआम उल्लंघन किया गया है. सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेश हैं कि किसी भी ढांचे को गिराने से पहले संबंधित पक्ष को कम से कम 15 दिनों का नोटिस दिया जाना चाहिए ताकि वे अपना कानूनी पक्ष रख सकें. लेकिन पीड़ितों का दावा है कि उन्हें राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम की धारा 91 के तहत जारी नोटिस कार्रवाई से ऐन एक दिन पहले थमाए गए. बाड़मेर के केरकोरी गांव के निवासियों के अनुसार, उन्हें 17 जून की शाम साढ़े सात बजे नोटिस मिला और अगली सुबह 18 जून को भारी पुलिस बल और मशीनों के साथ आकर मस्जिद को ढहा दिया गया. ग्रामीणों का कहना है कि यह मस्जिद उन्होंने पिछले तीस सालों में पाई-पाई जोड़कर बनाई थी.
नफरत की सियासत पर भारी पड़ी आपसी भाईचारे की दीवार
इस संवेदनशील घटना के बाद जहां कुछ तत्व इलाके का माहौल बिगाड़ना चाहते थे, वहीं थार मरुस्थल की सदियों पुरानी गंगा-जमुनी तहजीब ने नफरत की हर कोशिश को नाकाम कर दिया. तोड़फोड़ के बाद जब गहरे सदमे के कारण मुस्लिम परिवारों ने रोष स्वरूप अपने घरों में चूल्हा नहीं जलाया, तो उनके पड़ोसी हिंदू परिवारों ने संवेदनशीलता दिखाते हुए खुद अपने हाथों से खाना बनाकर उनके घरों तक पहुंचाया. इतना ही नहीं, इस नाइंसाफी के खिलाफ दोनों धर्मों के लोगों ने एकजुट होकर ‘सर्व धर्म शांति सभा’ नाम से एक नया मोर्चा बना लिया है. इस मंच के तले हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदाय के सैकड़ों लोग कंधे से कंधा मिलाकर रैलियां निकाल रहे हैं और राष्ट्रपति व राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंप रहे हैं. स्थानीय हिंदू सरपंचों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे अवैध कब्जों का समर्थन नहीं करते, लेकिन अगर गोचर भूमि खाली करानी है तो सभी धर्मों के ढांचों पर समान कार्रवाई होनी चाहिए, किसी एक को चुनकर कार्रवाई करना देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर आघात है.
अदालत का रुख और गरमाई राज्य की राजनीति
पीर मोहम्मद शाह जिलानी दरगाह समिति द्वारा दायर याचिका पर हाई कोर्ट में तीखी बहस चल रही है. सरकारी वकीलों ने अदालत में दलील दी है कि सीमा क्षेत्र के 50 किलोमीटर के भीतर किसी भी धार्मिक स्थल के निर्माण के लिए जिला कलेक्टर की पूर्वानुमति आवश्यक होती है, जिसका उल्लंघन किया गया. वहीं, याचिकाकर्ताओं के वकीलों का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में बुनियादी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी नहीं की जा सकती. इस विवाद पर राजस्थान की राजनीति भी पूरी तरह गरमा गई है. कांग्रेस सांसद उम्मेदाराम बेनीवाल और स्थानीय निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने इस कार्रवाई पर गंभीर चिंता जताते हुए सामाजिक समरसता बनाए रखने की अपील की है. विपक्ष का आरोप है कि सरकार आगामी स्थानीय चुनावों को देखते हुए ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है. हालांकि, सत्तारूढ़ भाजपा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि सरकार बिना किसी मजहबी भेदभाव के केवल अवैध कब्जों के खिलाफ काम कर रही है. फिलहाल इस पूरे मामले पर सबकी नजरें हाई कोर्ट के अगले कदम पर टिकी हैं.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें
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