राजस्थान में प्रसूताओं की मौत पर एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट! इलाज व्यवस्था पर उठे सवाल, जानें जांच में क्या आया सामने

कोटा: राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में सिजेरियन ऑपरेशन (C-Section) के बाद हुई प्रसूताओं की मौतों और स्वास्थ्य जटिलताओं की जांच के लिए गठित आठ सदस्यीय राज्य स्तरीय एक्सपर्ट कमेटी ने अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंप दी है. रिपोर्ट में इन मौतों के पीछे किसी दवा के रिएक्शन को नहीं, बल्कि अस्पतालों की गंभीर प्रक्रियात्मक कमियों, खराब मॉनिटरिंग और प्रबंधन की खामियों को मुख्य वजह माना है.
शुरुआती जांचों और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा मांगी गई जानकारी के बाद यह आशंका जताई जा रही थी कि डिलीवरी के दौरान इस्तेमाल होने वाले ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन के बेअसर होने की वजह से ये मौतें हुईं. राज्य की ड्रग टेस्टिंग लैबोरेटरी को जैक्सन लैबोरेटरीज द्वारा बनाए गए ऑक्सीटोसिन के एक बैच में कोई एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट (API) नहीं मिला था, यानी इंजेक्शन में सिर्फ पानी था. इसके बाद कंपनी का लाइसेंस भी रद्द कर दिया गया था.
मौतों की मुख्य वजह नहीं मानाहालांकि, जून के आखिर में सौंपी गई एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट ने इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया है. रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया, ‘लगभग सभी मामलों में क्लिनिकल लक्षण अलग-अलग थे. दवाओं से किसी भी तरह के रिएक्शन या शॉक का मामला न के बराबर देखा गया. कमेटी का मानना है कि ऑक्सीटोसिन में एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट की अनुपस्थिति को इन मौतों की मुख्य वजह नहीं माना जा सकता.’
अलग-अलग मेडिकल स्थितियां बनीं मौतों का कारणजांच कमेटी ने उन 12 महिलाओं के क्लिनिकल रिकॉर्ड की विस्तृत समीक्षा की जिनकी मौत हो गई थी या जिन्हें गंभीर जटिलताएं हुई थीं. रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं की मौत किसी एक समान कारण से नहीं, बल्कि अलग-अलग जटिल मेडिकल स्थितियों की वजह से हुई:
कोटा का जेके लोन अस्पताल: यहाँ भर्ती एक महिला की मौत पहले से मौजूद हृदय रोग के कारण हुई, जबकि दूसरी महिला की मौत प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव (Postpartum Haemorrhage – PPH) के चलते हुई.
न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल (कोटा): यहाँ एक महिला की मौत ‘डिसमिनेटेड इंट्रावास्कुलर कोएगुलेशन’ (DIC) के कारण हुए ‘पल्मोनरी एम्बोलिज्म’ (फेफड़ों की धमनी में खून का थक्का जमना) से हुई. इसके अलावा, एक अन्य महिला की मौत अत्यधिक खून बहने से अंग फेल होने यानी ‘हाइपोवोलेमिक शॉक’ से हुई, जबकि तीसरी मौत गर्भाशय ग्रीवा पर लगे टांके के संक्रमण (‘कोरियोएम्निओनाइटिस’) की वजह से हुई.
रिकॉर्ड कीपिंग और मरीजों की सहमति में गंभीर कमियांकमेटी ने अस्पतालों की प्रशासनिक और क्लिनिकल कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, अस्पतालों में मरीजों के इतिहास, दिए गए इलाज और ब्लड प्रेशर व पल्स रेट जैसी बुनियादी मापदंडों की मॉनिटरिंग का कोई उचित रिकॉर्ड क्लिनिकल नोट्स, ऑपरेशन थिएटर नोट्स या नर्सिंग डॉक्यूमेंटेशन में नहीं मिला.
इसके अलावा, अस्पताल हर मरीज की जरूरत के हिसाब से अलग नोट्स बनाने के बजाय पहले से छपे हुए (Pre-printed) क्लिनिकल नोट्स और ट्रीटमेंट ऑर्डर्स का इस्तेमाल कर रहे थे, जो तय मानकों के खिलाफ है. मरीजों के परिजनों से ‘इन्फॉर्म्ड कंसेंट’ (इलाज के जोखिम और विकल्पों से जुड़ी सोच-समझकर दी गई सहमति) लेने की प्रक्रिया भी बेहद लचर पाई गई.
एम्स (AIIMS) की रिपोर्ट ने भी जताई चिंताइस मामले में एम्स की 6 सदस्यीय समिति ने भी अपनी रिपोर्ट दी थी, जिसका विश्लेषण राज्य समिति ने किया. एम्स की रिपोर्ट ने अस्पतालों में नसबंदी (स्टरलाइजेशन), ऑपरेशन थिएटर (OT) में संक्रमण नियंत्रण (Infection Control) के तरीकों, ऑपरेशन के बाद की गंभीर देखभाल (Post-operative Care) की निगरानी और दवाओं के भंडारण व वितरण के तरीकों में गंभीर कमियां उजागर की थीं. राज्य समिति ने भी इन बिंदुओं पर तुरंत ध्यान देने और कड़े प्रोटोकॉल लागू करने की सिफारिश की है.
क्या कहते हैं आंकड़े और विशेषज्ञ?राजस्थान की प्रमुख स्वास्थ्य सचिव गायत्री राठौर ने बताया कि ये मौतें अलग-अलग कारणों से हुईं, लेकिन चूंकि कोटा के इन दोनों अस्पतालों में सबसे जटिल और हाई-रिस्क मामले रेफर होकर आते हैं, इसलिए ये दुर्भाग्यपूर्ण मौतें एक साथ हुईं और चर्चा में आ गईं. फेडरेशन ऑफ ऑब्स्टेट्रिक एंड गायनेकोलॉजिकल सोसाइटीज ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष डॉ. ऋषिकेश पाई ने भी इस बात का समर्थन करते हुए कहा कि जब तक डेथ रिव्यू कमेटी पक्के तौर पर मौतों को खराब ऑक्सीटोसिन से नहीं जोड़ती, तब तक हमें इन्हें हाई-रिस्क प्रेगनेंसी की जटिलताएं ही मानना होगा. बड़े अस्पतालों के लिए ये आंकड़े असामान्य नहीं हैं.
आंकड़ों के अनुसार, कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में साल 2025 में 14 प्रसूताओं की मौत दर्ज हुई थी, जबकि इस साल अब तक 3 मौतें हुई हैं. वहीं, जेके लोन अस्पताल में 2025 में 25 प्रसूताओं की मौत हुई थी और इस साल अब तक 4 मामले सामने आए हैं. फिलहाल, कमेटी ने अस्पतालों में दवाओं और ब्लड प्रोडक्ट्स की खरीद, स्टोरेज और संक्रमण नियंत्रण के लिए सख्त मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाने की तत्काल आवश्यकता पर ज़ोर दिया है.



