Animal Husbandry News: पशुपालन में भूलकर भी न करें ये 5 गलतियां, वरना बीमार होंगे पशु और घटेगा दूध

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पशुपालन में भूलकर भी न करें ये 5 गलतियां, वरना बीमार होंगे पशु और घटेगा दूध
Last Updated:July 11, 2026, 18:41 IST
Animal Husbandry Expert Tips: पशुपालन में छोटी गलतियां बड़े नुकसान का कारण बनती हैं. पशु चिकित्सक विशाल प्रजापति के अनुसार, आहार को अचानक न बदलें, बल्कि 10 दिनों में धीरे-धीरे बदलाव करें. दूध उत्पादन के लिए पशु को 24 घंटे साफ पानी उपलब्ध कराएं. हर 3-4 महीने में पशुओं को कृमिनाशक दवा दें, लेकिन गाभिन पशुओं के मामले में डॉक्टर की सलाह जरूर लें. थनैला रोग से बचने के लिए फर्श को सूखा और साफ रखें. साथ ही, बछड़ों को जन्म के दो घंटे के भीतर मां का पहला दूध यानी खीस जरूर पिलाएं ताकि उनकी इम्यूनिटी बढ़ सके.
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Animal Husbandry News: पशुपालन व्यवसाय में छोटी-छोटी लापरवाहियां पशुपालकों के लिए बड़ा आर्थिक नुकसान साबित हो सकती हैं. पशुओं के आहार में अचानक बदलाव करना, पर्याप्त पानी की कमी, समय पर कृमिनाशक दवा न देना और नवजात बछड़ों के प्रति असावधानी जैसी गलतियां सीधे तौर पर पशुओं के स्वास्थ्य और दूध उत्पादन पर गहरा असर डालती हैं. पशु चिकित्सकों का स्पष्ट मानना है कि यदि पशुपालक प्रबंधन के कुछ बुनियादी और सामान्य नियमों का गंभीरता से पालन करें, तो पशुओं को लंबे समय तक स्वस्थ रखा जा सकता है और उनके दूध उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है.
पशु चिकित्सक विशाल प्रजापति के अनुसार, पशुपालकों की सबसे आम गलती पशुओं के चारे या दाने में अचानक परिवर्तन करना है. अचानक आहार बदलने से पशुओं में आफरा, पेट फूलने और दस्त जैसी गंभीर पाचन समस्याएं हो सकती हैं. विशेषज्ञों का सुझाव है कि जब भी पशु का दाना या चारा बदलना हो, तो इसे 7 से 10 दिनों की अवधि में धीरे-धीरे करें. शुरुआत में पुराने चारे में केवल 10 से 20 प्रतिशत नया दाना मिलाएं और फिर प्रतिदिन धीरे-धीरे इसकी मात्रा बढ़ाते जाएं. इस प्रक्रिया से पशु का पाचन तंत्र नए आहार के अनुरूप आसानी से ढल जाता है.
पानी की उपलब्धता और दूध उत्पादन का संबंधदूध का लगभग 87 प्रतिशत हिस्सा पानी होता है. अतः यदि पशु को पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं मिलता है, तो दूध उत्पादन में स्वतः भारी गिरावट आ जाती है. कई पशुपालक दिन में केवल दो बार यानी सुबह और शाम ही पानी पिलाते हैं, जबकि पशु को जब भी प्यास लगे, उसे पानी की उपलब्धता होनी चाहिए. इसके लिए पानी की टंकी या खेली हमेशा पशु की पहुंच में रखनी चाहिए, ताकि वह दिनभर अपनी शारीरिक आवश्यकता के अनुसार पानी पी सके.
कृमिनाशक दवा का महत्वपशुओं को बीमारियों से बचाने के लिए नियमित रूप से कृमिनाशक (कीड़े मारने की) दवा देना अनिवार्य है. डॉ. प्रजापति बताते हैं कि बड़े पशुओं को हर 3 से 4 महीने के अंतराल पर दवा जरूर दी जानी चाहिए. हालांकि, उन्होंने विशेष चेतावनी दी है कि गाभिन पशुओं को किसी भी प्रकार की दवा देने से पहले पशु चिकित्सक की सलाह लेना आवश्यक है, ताकि गर्भस्थ शिशु पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े.
पशुशाला की स्वच्छता और थनैला रोग से बचावपशुशाला की साफ-सफाई और फर्श की स्थिति पशुओं के स्वास्थ्य का आधार है. यदि पशु लगातार गीले या चिकने फर्श पर बैठते हैं, तो उनके थनों में बैक्टीरिया प्रवेश कर सकते हैं, जिससे थनैला (मैस्टाइटिस) रोग होने का खतरा बढ़ जाता है. इसके अतिरिक्त, फिसलन भरे फर्श पर गिरने से पशु गंभीर चोटिल भी हो सकते हैं. पशु के बैठने की जगह को हमेशा सूखा रखें. पक्के फर्श पर रबर मैट बिछाएं या सूखी रेत और मिट्टी का उपयोग करें, जिसे नियमित अंतराल पर बदलते रहना चाहिए.
नवजात को खीस पिलाना क्यों है अनिवार्यविशाल प्रजापति ने नवजात बछड़ों को लेकर प्रचलित एक गलत धारणा को भी खारिज किया. कई पशुपालक जेर गिरने तक बछड़े को दूध नहीं पिलाते, जो कि एक गंभीर भूल है. जन्म के एक से दो घंटे के भीतर नवजात को मां का पहला गाढ़ा दूध यानी खीस अवश्य पिलाना चाहिए. यह खीस किसी प्राकृतिक टीके की तरह कार्य करती है और बछड़े की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने का काम करती है.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें
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