WHO ने 3 दवाइयों में बताया कैंसर कारक तत्व, पर डॉक्टरों ने कहा मरीज न हो पैनिक, जानें पूरी खबर

Last Updated:August 06, 2026, 12:28 IST
Cancer Causing Drugs: विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO ने आम जीवन में खूब यूज होने वाली 3 दवाइयों को कैंसर कारक दवा की श्रेणी में रख दिया है. हालांकि डॉक्टरों का मानना है कि इससे घबराने की जरूरत नहीं है. क्योंकि यह चेतावनी केवल जोखिम की पहचान है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वे कौन सी दवाइयां जिनसे उल्टे कैंसर का ही खतरा बढ़ जाता है. इन्हीं सवालों का जवाब जानने के लिए हमने मैक्स अस्पताल में इंटरनल मेडिसीन के डायरेक्टर और यूनिट हेड डॉ. प्रभात रंजन सिन्हा से बात की.WHO की चेतावनी, 3 दवाओं में कैंसर वाले तत्व.
हाई ब्लड प्रेशर, फंगल इंफेक्शन और ऑर्गन ट्रांसप्लांट में काम आने वाली तीन दवाइयों को विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO की रिसर्च यूनिट IARC ने कार्सिनोजेनिक घोषित कर दिया है. ये तीन दवाइयां हैं हाई ब्लड प्रेशर की हाइड्रोक्लोरोथियाजाइड, फंगल इंफेक्शन के लिए वोरिकोनाजोल और अंग प्रत्यारोपन के बाद रिजेक्शन के खतरे को कम करने के लिए इस्तेमाल होने वाली दवा टैक्रोलिमस. इन तीनों दवाओं को डब्ल्यूएचओ ने कार्सिनोजेनिक ग्रुप 1 में रखा है. ये तीनों दवाएं WHO की आवश्यक दवाओं की मॉडल सूची में शामिल हैं और दुनियाभर में लाखों लोगों को दी जाती हैं. अब सवाल है कि ये क्या ये दवाइयां तत्काल बैन हो जाएगी या जारी रहेगी. इन दवाइयों में ऐसा क्या है जिससे कैंसर का खतरा है. मैक्स अस्पताल में इंटरनल मेडिसीन के डायरेक्टर और यूनिट हेड डॉ. प्रभात रंजन सिन्हा से इसे विस्तार से समझाया है.
कैंसर के जोखिम का मतलब दवा बंद करना नहीं
डॉ. प्रभात रंजन सिन्हा ने स्पष्ट किया कि हमारे पास कई ऐसी दवाइयां हैं जिनमें कार्सिनोजेनिक तत्व होते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम उन दवाइयों का इस्तेमाल बंद कर दें. जान बचाने के लिए कई दवाइयां हमारे लिए जरूरी है. हाइड्रोक्लोरोथियाजाइड हाई ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण दवा है. इसके अलावा टेकरोलाइमस ऐसी दवा है जिसे हम ऑर्गेन ट्रांसप्लांट के बाद देते हैं और उसको उसके लेवल के साथ फॉलो करते हैं. अगर यह दवा नहीं देगें तो दूसरे ग्रुप की दवा देंगे लेकिन इस दवा को देना अनिवार्य है वरना मरीज की जान जा सकती है. इसलिए हमें यह देखना होगा कि जिन दवाओं को WHO ने कार्सिनेजेनिक श्रेणी में रखा है उसकी फ्रीक्वेंसी कितनी है. यानी दवा के कितने अंश से कैंसर का खतरा है और किस तरह से खतरा है. इसका डोज के साथ क्या संबंध है. इन सारी चीजों पर विचार करने के बाद ही किसी दवा को बैन किया जाता है. फिलहाल इन दवाओं को बैन करने की कोई संभावना नहीं है क्योंकि डब्ल्यूएचओ की रिसर्च पेपर में कहा गया है कि दवाओं की यह कैटगरी कैंसर के खतरों की पहचान करता है. इसका मतलब यह नहीं है कि मरीज डॉक्टर से सलाह लिए बिना अपनी दवा बंद कर दें.
डॉक्टरों की निगरानी में दवा लेने से नुकसान नहीं
डॉ. प्रभात रंजन सिन्हा ने बताया कि निश्चित रूप से ग्रुप 1 वाले कार्सिनेजेनिक तत्व मजबूत तथ्य पर शामिल होते हैं. इस पर गहन रिसर्च होती है. WHO के बाद कई अन्य संस्थाओं में भी इस पर रिसर्च होती है. फिर जब सभी रिसर्च में यह प्रमाणित हो जाती है कि किसी तत्व से पूरी तरह कैंसर का खतरा है, तब अंत में इसे बैन कर दिया जाता है. पहले भी कुछ दवाओं को लेकर ऐसी बातें हुई हैं लेकिन वे दवाइयां आज भी इस्तेमाल में है. उन्होंने कहा कि बीपी की दवा हाइड्रोक्लोरोथायाज्ड बेहद प्रभावशाली दवा है जो किडनी के रीनल ट्यूब्यूल्स में सोडियन को एब्जॉर्व कर लेता है. ग्रुप में 1 में इसका शामिल होना बेहद आश्चर्यजनक है. कीमोथेरीप की दवाइयां कैंसर सेल्स को मारने का काम करता है. कभी-कभी एक्टिमेटाबोलाइज की स्थिति में यह भी सेल के ग्रोथ को तेज कर सकती है. लेकिन जब तक आप सक्षम डॉक्टरों की निगरानी में इसे ले रहे हैं तो इसका खतरा न के बराबर है. इसलिए इन दवाओं का इस्तेमाल सिर्फ एक्सपर्ट डॉक्टर की सलाह से ही लें.
कार्सिनोजेनिक का क्या अर्थ है
आसान शब्दों में कहें तो ऐसे तत्व जो शरीर की कोशिका के अंदर घुसकर उसके डीएनए को नुकसान पहुंचाएं तो इसे कार्सिनोजेनिक कहा जाता है. किसी भी कोशिका में जब डीएनए में गड़बड़ी होते हैं तो कोशिका बिना लगाम वृद्धि करने लगती है. यह कैंसर ट्यूमर या कैंसर कोशिका बन जाती है. पर कार्सिनोजेनिक को WHO तीन श्रेणी में बांटती है. जिसमें यह पक्का सबूत हो कि इस तत्व या पदार्थ से इंसानों में कैंसर पैदा होता है जैसे कि तंबाकू, एस्बेस्टेस आदि उसे ग्रुप 1 में रखा जाता है. वहीं ग्रुप 2 में उन तत्वों को रखा जाता है जिसमें इंसानों में सीमित लेकिन जानवरों में पक्के सबूत हैं कि यह कैंसर कर सकता है. वहीं ग्रुप 3 में अंदेशा होता है कि इस चीज से कैंसर हो सकता है.
तो क्या दवा बैन हो जाएगी
नहीं, डॉ. प्रभात रंजन सिन्हा ने बताया कि दवा के मामले में यह बात थोड़ी अलग है. कई दवाएं ऐसी होती है जिनसे कैंसर को खतरा रहता है, फिर भी इसका यूज होता है. कुछ अन्य दवाइयां खुद ही कार्सिनोजेनिक की श्रेणी में आती है लेकिन जान बचाने के लिए यह मरीजों को देना पड़ता है. पर डॉक्टर इसे बेहद सटीक और नियंत्रित मात्रा में देते हैं. कई बार मूल दवा कार्सिनोजेनिक नहीं होती बल्कि उसमें बनने वाली अशुद्धियों के कारण WHO या FDA चेतावनी जारी करता है. ऐसी स्थिति में उस बैच या दवा के निर्माण पर रोक लगा दी जाती है. यदि WHO ने हाल ही में तीन दवाओं को कार्सिनोजेनिक माना है, तो इसका मतलब है कि उन दवाओं के लंबे समय तक या अनियंत्रित उपयोग से कैंसर होने का खतरा है. हालांकि ऐसी दवाओं को हमेशा अपने डॉक्टर की सलाह और निर्देशों के तहत ही बंद या चालू करना चाहिए.
About the AuthorLakshmi Narayan
लक्ष्मी नारायण पत्रकारिता जगत का ऐसा नाम हैं, जो भविष्य की आहट और ट्रेंड्स को समय से पहले भांप लेते हैं. मीडिया में 20 साल का अनुभव है और वर्तमान में न्यूज 18 …
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First Published :
August 06, 2026, 12:28 IST



