कौन हैं जैसलमेर के सुमेर सिंह भाटी? चरागाह बचाकर बदली हजारों की जिंदगी, अब मिला ये बड़ा सम्मान

जैसलमेर. राजस्थान के थार में जहां दूर-दूर तक रेत के धोरों का विस्तार दिखाई देता है, वहीं इसी मरुस्थलीय इलाके में कुछ ऐसे भी जगह हैं, जो हजारों जिंदगियों का आधार भी है. थार रेगिस्तान में सिर्फ रेत ही नहीं है, यहां हजारों परिवारों की जिंदगी और पशुओं का सहारा बनने वाले बड़े-बड़े चरागाह भी हैं. इन्हें ओरान कहा जाता है. ये धार्मिक आस्था से जुड़े सामुदायिक जंगल और चरागाह होते हैं, जहां पशुओं के लिए घास मिलती है. साथ ही ये पानी बचाने और वन्यजीवों को सुरक्षित रखने में भी अहम भूमिका निभाते हैं. इन ओरानों को बचाने के लिए जैसलमेर के पारंपरिक ऊंट पालक सुमेर सिंह भाटी ने लंबे समय तक काम किया. उनके इसी प्रयास को अब राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है. सुमेर सिंह को प्रतिष्ठित रेंजलैंड रेस्टोरेशन अवॉर्ड 2026 से सम्मानित किया गया है.
सुमेर सिंह भाटी जैसलमेर के पारंपरिक ऊंट पालक हैं. उनका जीवन बचपन से ही ऊंटों, चरागाहों और गांवों से जुड़ा रहा है. उन्होंने करीब से देखा कि अगर चरागाह खत्म हो गए तो इसका सीधा असर पशुपालकों और उनके पशुओं पर पड़ेगा. इसी वजह से उन्होंने ओरान और चरागाहों को बचाने की मुहिम शुरू की. जब जैसलमेर के देगराई माता ओरान सहित कई जगहों पर चरागाहों पर खतरा बढ़ा तो सुमेर सिंह ने आसपास के गांवों को साथ जोड़ना शुरू किया. उन्होंने करीब 20 गांवों के लोगों को एकजुट किया और जैसलमेर से जयपुर तक ओरान बचाओ पदयात्रा निकाली. इस यात्रा के जरिए उन्होंने ओरान और चरागाहों को बचाने की आवाज सरकार और आम लोगों तक पहुंचाई.
10 हजार हेक्टेयर चरागाह बचाने में निभाई भूमिका
सुमेर सिंह के प्रयासों से देगराई माता ओरान में करीब 10 हजार हेक्टेयर चरागाह भूमि के संरक्षण में मदद मिली. यहां स्थानीय घास और पानी के स्रोतों को फिर से बेहतर करने की दिशा में काम हुआ. इससे पशुओं के लिए चारा और पानी की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिली. इन प्रयासों का फायदा सिर्फ पर्यावरण को नहीं हुआ, बल्कि हजारों परिवारों की जिंदगी भी इससे जुड़ी है. बताया गया है कि इस काम से करीब 5 हजार परिवारों की आजीविका को सहारा मिला. वहीं 50 हजार से ज्यादा ऊंट, भेड़ और बकरियों के लिए चराई की जगह सुरक्षित करने में भी मदद मिली.
गोडावण की सुरक्षा के लिए भी उठाई आवाज
सुमेर सिंह का काम केवल चरागाह बचाने तक सीमित नहीं रहा. उन्होंने थार में पाए जाने वाले दुर्लभ वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए भी आवाज उठाई. ग्रेट इंडियन बस्टर्ड यानी गोडावण की बिजली की ऊंची लाइनों से होने वाली मौतों का मुद्दा उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर उठाया. इसके अलावा जैसलमेर में बेहद कम दिखाई देने वाली एशियाटिक कैराकल की मौजूदगी को दर्ज करने के काम में भी उनका योगदान रहा. उनका प्रयास रहा कि थार के प्राकृतिक इलाकों के साथ वहां रहने वाले वन्यजीव भी सुरक्षित रहें.
क्यों खास है सुमेर सिंह को मिला सम्मान?
रेंजलैंड रेस्टोरेशन अवॉर्ड 2026 सुमेर सिंह के वर्षों के जमीनी काम की पहचान है. उनका काम यह बताता है कि पर्यावरण बचाने का मतलब सिर्फ पेड़ लगाना नहीं है. राजस्थान जैसे रेगिस्तानी इलाके में घास के मैदान और चरागाह भी प्रकृति और इंसानों के लिए बेहद जरूरी है. सुमेर सिंह ने अपने गांव और आसपास के लोगों को साथ लेकर यह दिखाया कि एक आम पशुपालक भी बड़े स्तर पर बदलाव ला सकता है. उन्होंने ओरान बचाने की मुहिम को लोगों की आजीविका, पशुओं और वन्यजीवों से जोड़ा. उनकी कहानी इस बात की मिसाल है कि चरागाह बचेंगे तो पशु बचेंगे, पशु बचेंगे तो हजारों परिवारों की रोजी-रोटी भी सुरक्षित रहेगी.



