‘चाचा ने सलाम किया’… ‘मौसम कैसा है?’ जहां सुने ये बात तुरंत थाम लें जेब, वरना लग सकता है मोटा चूना

भीड़भाड़ वाली बसों और सड़कों पर जेबकतरों से अक्सर ही सावधान रहने की सलाह दी जाती है, लेकिन क्या हो अगर आम बातचीत के बीच सुनाई देने वाले कुछ शब्द ही खतरे का इशारा हों? मुंबई के अंधेरी में पॉकेटमारों के एक गैंग के नए कारनामे ने पुलिस को भी चौंका दिया है. इस गिरोह के सदस्य चोरी की जगह, शिकार और पुलिस की मौजूदगी पर खुलकर बात नहीं करते थे. इसके बजाय उन्होंने रोजमर्रा की सुनाई देने वाली कुछ ऐसी बातों को अपना कोड बना रखा था, जिनका असली मतलब सिर्फ गैंग के सदस्यों को पता था.
अंधेरी के MIDC पुलिस की जांच में सामने आया कि ‘चाचा ने सलाम किया’ और ‘आज मौसम कैसा है?’ जैसे वाक्य दरअसल गिरोह के लिए कोडवर्ड थे. इनका इस्तेमाल यह पता लगाने के लिए किया जाता था कि कोई सदस्य पुलिस के हत्थे तो नहीं चढ़ा, रास्ता सुरक्षित है या फिर चोरी की योजना को आगे बढ़ाया जा सकता है.
पुलिस के मुताबिक, यह गिरोह बेहद संगठित तरीके से काम करता था. गैंग के सदस्यों के बीच बाकायदा जिम्मेदारियां बांटी गई थीं. कोई शिकार पर नजर रखता था, कोई धक्का-मुक्की कर ध्यान भटकाता था और कोई मौका देखकर मोबाइल या पर्स उड़ा देता था.
हर सुबह बदलता था कोड
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, जांच में पता चला कि गैंग का सरगना हर सुबह व्हाट्सऐप के जरिए सदस्यों से संपर्क करता था. खास बात यह थी कि कोड रोज बदल दिया जाता था. बातचीत के बाद ही तय होता था कि उस दिन कहां जुटना है और किस बस रूट को निशाना बनाना है.
पुलिस की कार्रवाई के बाद जब गैंग के दो सदस्य पकड़े गए तो बाकी लोग सतर्क हो गए और आंधेरी छोड़कर नवी मुंबई के जुईनगर इलाके में चले गए. यानी पुलिस की गतिविधियों पर नजर रखते हुए गिरोह अपना ठिकाना भी बदल रहा था.
पहले आंखों के इशारे, अब व्हाट्सऐप का सहारा
मुंबई पुलिस के अधिकारियों के मुताबिक, इस गिरोह का तरीका शहर में सक्रिय पुराने जेबकतरों गिरोहों की याद दिलाता है. फर्क सिर्फ इतना है कि पहले अपराधी आंखों के इशारे, हाथ के संकेत, तौलिया या किसी खास शब्द का इस्तेमाल करते थे, जबकि अब वही काम मोबाइल फोन और व्हाट्सऐप के जरिए किया जा रहा है.
मुंबई में अपराधी गिरोहों के बीच सीक्रेट कोडवर्ड का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है. 1990 के दशक में कई गिरोह बसों और ट्रेनों में यात्रियों को निशाना बनाते थे. गिरोह के तीन-चार सदस्य अलग-अलग भूमिकाओं में काम करते थे. चोरी का सामान भी एक सदस्य से दूसरे सदस्य तक पहुंचा दिया जाता था, ताकि पकड़े जाने पर पुलिस को असली आरोपी तक पहुंचने में मुश्किल हो.
उस दौर में आंख मारना खतरे का संकेत, तौलिया हिलाना आसपास सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी होने की सूचना और किसी खास नाम को जोर से पुकारना ऑपरेशन रोकने का इशारा हो सकता था. कई गैंग चोरी के बाद अलग-अलग बस स्टॉप पर उतरते थे, ताकि पुलिस को एक साथ कई संदिग्धों को पकड़ने का मौका न मिले.
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, कुछ गिरोह चोरी को अपने बीच ‘जादू’ या ‘झटका’ जैसे नामों से बुलाते थे. उनका पूरा नेटवर्क इस तरह काम करता था कि आम यात्रियों को कुछ भी असामान्य नजर न आए.
‘मशीन’ करता था असली काम
कुछ पुराने मामलों की जांच कर चुके पुलिस अधिकारियों ने बताया कि बस में चार-पांच लोग एक साथ सफर करते थे, लेकिन आपस में बातचीत नहीं करते थे. जैसे ही किसी यात्री को निशाना बनाया जाता, दो-तीन सदस्य उसका ध्यान भटकाते और गिरोह का एक सदस्य मोबाइल या पर्स निकाल लेता. इसके बाद सभी अलग-अलग स्टॉप पर उतर जाते.
आंधेरी में पकड़े गए ‘धक्का गैंग’ का तरीका भी कुछ ऐसा ही था. भीड़ में धक्का देना, यात्री का ध्यान भटकाना और इसी दौरान मोबाइल पार कर देना इनके काम करने का तरीका था.
एक दिन में पांच महंगे मोबाइल तक चोरी
पुलिस की जांच में इस गिरोह की चोरी का पैमाना भी सामने आया है. अधिकारियों के मुताबिक, गिरोह के सदस्य कथित तौर पर एक दिन में करीब पांच महंगे मोबाइल तक चोरी कर लेते थे.
पुलिस ने आरोपियों के पास से 135 मोबाइल फोन बरामद किए हैं, जिनकी कीमत करीब 90 हजार से 1.5 लाख रुपये के बीच बताई गई है. दिलचस्प बात यह है कि गिरोह आईफोन को आम तौर पर निशाना नहीं बनाता था. पुलिस के अनुसार, आईफोन को अनलॉक करना मुश्किल होता है और उनके तय बाजारों में इसकी बिक्री भी अपेक्षाकृत कठिन थी.
इस पूरे मामले ने यह जरूर दिखा दिया कि अपराधियों की भाषा भले बदल जाए, उनका तरीका बदल जाए और हाथ के इशारों की जगह स्मार्टफोन आ जाएं, लेकिन पुलिस की नजर से बचना अब भी आसान नहीं है.



