Agriculture News: कपास के डोडों में घुसकर रुई और बीज खा जाती है गुलाबी सुंडी, कृषि विभाग ने बताए बचाव के तरीके

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Agriculture: कपास पर ‘गुलाबी सुंडी’ का खतरा, कृषि विभाग ने दी किसानों को सलाह
Last Updated:October 01, 2026, 14:23 IST
Bhilwara Cotton Crop Pink Bollworm: भीलवाड़ा जिले में करीब 40 से 50 हजार हेक्टेयर में बोई जाने वाली कपास की फसल पर ‘गुलाबी सुंडी’ रोग का प्रकोप देखा जा रहा है, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता प्रभावित हो रही है. कृषि विभाग के उद्यान विशेषज्ञ डॉ. शंकर सिंह राठौड़ के अनुसार, फसल के 60-70 दिन बाद डोडों में लट आने पर इस बीमारी का पता चलता है. इसके बचाव के लिए कृषि विभाग ने पुरानी बनेठियों व अवशेषों को नष्ट करने, 60 दिन की फसल पर 5% नीम सीड कर्नल एक्सट्रैक्ट का छिड़काव करने और अनधिकृत मिश्रित कीटनाशकों के प्रयोग से बचने की सलाह दी है.
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Bhilwara: राजस्थान की वस्त्र नगरी भीलवाड़ा में कपास का एक बड़ा और प्रमुख हब स्थापित है. जिले के अधिकांश किसान कपास की खेती को अपनी मुख्य आय का जरिया मानते हैं. हालांकि, इन दिनों क्षेत्र के किसानों के लिए कपास की फसल पर छाया ‘गुलाबी सुंडी’ (पिंक बोलवर्म) का प्रकोप चिंता का बड़ा कारण बना हुआ है. कीट के प्रभाव से फसल के खराब होने की आशंका को देखते हुए कृषि विभाग अलर्ट मोड में आ गया है. विभाग किसानों को इस रोग के समय रहते पहचान करने और बचाव के वैज्ञानिक तरीके बता रहा है, ताकि किसानों को भारी आर्थिक नुकसान से बचाया जा सके.
भीलवाड़ा कृषि विभाग के उद्यान विभाग में कार्यरत डॉ. शंकर सिंह राठौड़ ने बताया कि भीलवाड़ा जिला न केवल वस्त्र उद्योग में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखता है, बल्कि कृषि के मामले में भी कपास उत्पादन में हमेशा अग्रणी रहा है. जिले में कई कॉटन और जिनिंग मिल्स संचालित होने के कारण यहां के किसानों को कपास की फसल का अच्छा और समय पर बाजार मूल्य मिल जाता है. यही वजह है कि भीलवाड़ा जिले में किसान हर साल लगभग 40 से 50 हजार हेक्टेयर के विशाल रकबे में कपास की खेती करते हैं. लेकिन बीते कुछ दिनों से गुलाबी सुंडी के प्रकोप के कारण कपास की गुणवत्ता (क्वालिटी) और उत्पादन (यील्ड) दोनों में गिरावट दर्ज की जा रही है.
फसल में सुंडी रोग के प्रमुख लक्षण और पहचानकपास की फसल में सुंडी रोग एक अत्यंत घातक बीमारी है, जिसमें कीट सीधे कपास के डोडे (टिंडे) पर हमला करते हैं. डॉ. राठौड़ के अनुसार, फसल की बुवाई के लगभग 60 से 70 दिन बीत जाने के बाद इस रोग का असर प्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलता है. जब डोडे में लट (इल्ली) प्रवेश करने लगती है और अंदर ही अंदर रुई व बीजों को नुकसान पहुंचाती है, तब किसानों को इसके प्रकोप का पता चलता है. चूंकि यह कीट डोडे के अंदर रहकर नुकसान पहुंचाता है, इसलिए इसके नियंत्रण के लिए किसानों को फसल की शुरुआत से ही अग्रिम प्रबंध (एडवांस प्रिकॉशन) करने की सख्त जरूरत होती है.
खेत की सफाई और प्रबंधन से रोकें प्रसारकृषि विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि नए सीजन में कीटों का प्रसार रोकने के लिए पुराने फसल अवशेषों का सही समय पर निस्तारण करना बेहद जरूरी है.
किसान कपास की बुवाई से पहले खेत और उसके आसपास रखी पुरानी बनेठियों (लकड़ियों) को अच्छी तरह झाड़ लें और पुराने सूखे डोडे नष्ट कर दें.
खेत की मेढ़ों और आसपास बनेठियों के बड़े ढेर लगाने से बचें, क्योंकि इनमें कीट पनपते हैं.
जिनिंग मिलों और कपास फैक्ट्रियों के पास पड़े फसल अवशेषों को भी समय रहते पूरी तरह नष्ट कराया जाए ताकि अगली फसल में इसका संक्रमण न फैले.
नीम एक्सट्रैक्ट और संतुलित कीटनाशक का छिड़कावडॉ. शंकर सिंह राठौड़ ने कीट नियंत्रण के लिए सटीक छिड़काव का समय और तकनीक भी साझा की. उन्होंने बताया कि कपास की फसल जब 60 दिन की हो जाए, तब उस पर 5 प्रतिशत नीम सीड कर्नल एक्सट्रैक्ट (NSKE) का छिड़काव करना चाहिए. यह एक जैविक और प्रभावी तरीका है जो शुरुआती चरण में कीटों को पनपने से रोकता है. इसके अलावा, जब फसल 60 से 120 दिन की अवधि में हो, तो किसानों को बिना कृषि विशेषज्ञों की सलाह के कोई भी मिश्रित या भारी रासायनिक कीटनाशक इस्तेमाल करने से बचना चाहिए. कृषि विभाग द्वारा अनुशंसित प्रामाणिक दवाइयों का ही निश्चित मात्रा में छिड़काव करना फसल और पर्यावरण दोनों के लिए सुरक्षित है.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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Bhilwara,Bhilwara,Rajasthan
First Published :
October 01, 2026, 14:23 IST



