सब कुछ छूट गया, जेब में बचे थे कुछ रुपये… ‘बंटवारा 1947’ देख छलका पाकिस्तान से देहरादून आए परिवार का दर्द

Batwara 1947 Review: देशभर में 15 अगस्त के दिन जश्न-ए-आज़ादी मनाया जाता है, लेकिन इससे ठीक एक दिन पहले देश के दो हिस्से हुए थे. 14 अगस्त 1947, वह तारीख है जब देश दो भागों में बंट गया था भारत और पाकिस्तान. यह सिर्फ एक भूभाग का टुकड़ा ही दो हिस्सों में नहीं टूटा था, बल्कि लाखों लोगों ने अपने घर-परिवार और सब कुछ छोड़ दिया था. दूसरे शब्दों में कहें तो देश के विभाजन में जो त्रासदी लोगों ने झेली, उस विभीषिका को कभी भुलाया नहीं जा सकता है. विभाजन के इसी दर्द को फिल्मी पर्दे पर डायरेक्टर राजकुमार संतोषी ने अपनी फिल्म ‘बंटवारा 1947’ में दिखाने की कोशिश की है. शुक्रवार को यह फिल्म देहरादून के कई सिनेमाघरों में रिलीज कर दी गई है. सुबह के शो में सिनेमाघरों में ज्यादा भीड़ नजर नहीं आई क्योंकि लगातार बारिश बनी हुई थी और राजधानी में ऑरेंज अलर्ट जारी किया गया था, लेकिन दूसरे शो में बारिश के बावजूद सिनेमाघरों में इस फिल्म को देखने के लिए काफी संख्या में दर्शक पहुंचे.
ऐतिहासिक तारीख और जबरदस्त एडवांस बुकिंग‘बंटवारा 1947’ फिल्म को स्वतंत्रता दिवस से ठीक एक दिन पहले उसी तारीख को रिलीज किया गया है जिस दिन भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ था, इसलिए यह और ज्यादा लोगों की भावनाओं से जुड़ी हुई फिल्म है. फिल्म का दमदार ट्रेलर देखने के बाद ही लोग इसे देखने के लिए बेहद उत्साहित नजर आ रहे थे. फिल्म की एडवांस बुकिंग भी कई सिनेमाघरों में पहले ही कर ली गई थी. दोपहर 2:30 बजे तक देशभर में इस फिल्म को 8,886 शोज़ मिले, जिनमें 65,391 के करीब टिकटें बिक गईं.
बुजुर्गों के दर्द को पर्दे पर देखने पहुंचे दर्शकदेहरादून के सिनेमाघर में ‘बंटवारा 1947’ देखने पहुंचे करनवीर सिंह ने बताया कि वैसे तो वह सनी देओल की कई सारी फिल्में देख चुके हैं, लेकिन यह फिल्म खास इसलिए थी क्योंकि वह विभाजन के ऊपर फिल्माई गई इस फिल्म को देखना चाहते थे. सबसे बड़ी बात यह है कि उनके पूर्वज भी पाकिस्तान के ही रहने वाले थे, जो विभाजन के दौरान देहरादून आकर बस गए थे. उन्होंने बताया कि दादा-दादी से विभाजन के किस्से सुने थे, जिसे वह स्क्रीन पर भी देखना चाहते थे.
शून्य से शुरू किए गए संघर्ष की दास्तानकरनवीर सिंह बताते हैं कि उनके दादा पाकिस्तान में रहते थे और वहां उनकी जेवर की दुकान थी. लेकिन अचानक जब दंगे और मारकाट शुरू हुई, तो विभाजन के दौरान वह सब कुछ छोड़-छाड़ कर देहरादून आ गए. उन्होंने बताया कि उनकी जेब में जो कुछ रुपये बचे थे, उन्हीं से उन्होंने कई दिनों तक सर्वाइव किया और इसके बाद धीरे-धीरे यहां काम करना शुरू किया. चकराता रोड पर उन्होंने आर्मी के लिए ड्रेस और जूते बनाने की एक दुकान खोली. उन्होंने बताया कि वह अक्सर बंटवारे की कहानी अपने बुजुर्गों से सुनते थे और ऐसी फिल्में अपने बच्चों को भी दिखानी चाहिए ताकि उन्हें भी अपने इतिहास का पता चल सके. कई लोग फिल्म की कहानी को देखने के लिए सिनेमाघर आए, तो कुछ लोग सनी देओल की वजह से यहां खिंचे चले आए.
सनी देओल और शबाना आजमी के अभिनय का जादूइरशाद बताते हैं कि वह पिछले 25 सालों से सनी देओल की फिल्में देख रहे हैं. वे बताते हैं कि जब वह 18 साल के थे, तब से ही उन्होंने सनी देओल की हर फिल्म सिनेमाघरों में देखी है. उन्होंने सनी देओल की ‘घातक’, ‘घायल’, ‘बॉर्डर’, ‘बॉर्डर 2’ और ‘गदर’ जैसी हर फिल्म देखी है क्योंकि वह उनके बहुत बड़े फैन हैं. उन्हें सनी देओल के डायलॉग और एक्शन बहुत पसंद हैं और चूंकि यह फिल्म देशभक्ति से जुड़ी है, इसलिए वह इसे देखने आए हैं. उन्हें शबाना आजमी का रोल भी काफी पसंद आया, जिनके किरदार के इर्द-गिर्द ही पूरी फिल्म बुनी गई है. इस फिल्म में एक्शन, भावनात्मक जुड़ाव और बंटवारे का दर्द दर्शकों को पूरी तरह संतुष्ट करता नजर आया.
‘आवारापन 2’ से क्लैश और वीकेंड पर बड़ी उम्मीदेंवहीं कई दर्शकों को सनी देओल और प्रीति जिंटा की जोड़ी भी काफी पसंद आई, जो इससे पहले फिल्म ‘हीरोज’ में देखने को मिली थी. दर्शकों ने कहा कि सनी देओल ‘सिकंदर मिर्ज़ा’ के किरदार में काफी जंचे हैं. इस फिल्म की खास बात यह भी है कि इसमें सनी देओल के बेटे करण देओल अपने पिता के साथ ऑनस्क्रीन भी बेटे के किरदार में ही नजर आए हैं. शबाना आजमी का इमोशनल और अभिमन्यु सिंह का नेगेटिव रोल भी इस फिल्म में जान डालने का काम करता है. हालांकि देहरादून के सिनेमाघरों में 14 अगस्त के दिन ही 19 साल बाद इमरान हाशमी की ‘आवारापन 2’ भी रिलीज हुई है, जिसके चलते दोनों फिल्मों में क्लैश देखने को मिल रहा है. इसके बावजूद 15 अगस्त और वीकेंड की छुट्टियों में ‘बंटवारा 1947’ को देखने बड़ी संख्या में दर्शकों के पहुंचने की पूरी उम्मीद है.



