Success Story: कौन हैं नीरज खंडेलवाल? 50 लाख की नौकरी ठुकराकर स्पेस टेक का स्टार, PM मोदी भी हुए मुरीद

Last Updated:August 25, 2026, 06:41 IST
Neeraj Khandelwal Success Story: राजस्थान के चौमूं से निकले नीरज खंडेलवाल की कहानी छोटे शहर से निकलकर देश की अत्याधुनिक तकनीक तक पहुंचने की मिसाल है. बर्तन कारोबारी परिवार में पले-बढ़े नीरज ने पढ़ाई में शानदार प्रदर्शन करते हुए जेईई में ऑल इंडिया 143वीं रैंक हासिल की और आईआईटी मुंबई से विद्युत अभियांत्रिकी की डिग्री ली. उन्हें यूरोप में 50-60 लाख रुपए सालाना पैकेज की नौकरी का ऑफर मिला, लेकिन उन्होंने विदेश जाने के बजाय भारत में रहकर कारोबार करने का फैसला किया. दोस्त के साथ 2018 में कॉइनडीसीएक्स शुरू करने के बाद उन्होंने अंतरिक्ष तकनीक का रुख किया. आईआईटी बैचमेट और पूर्व इसरो वैज्ञानिक देवा के साथ एस्ट्रोबेस स्पेस टेक्नोलॉजीज की शुरुआत की. करीब 18 महीने के शोध, डिजाइन और परीक्षण के बाद कंपनी ने 800 किलो न्यूटन क्षमता वाला एफएफएससी एलओएक्स-मीथेन रॉकेट इंजन ‘एवरेस्ट’ तैयार किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस उपलब्धि की सराहना की है.
कभी बर्तन कारोबारी परिवार के बेटे के रूप में चौमूं में पले-बढ़े नीरज खंडेलवाल ने आज भारत की निजी अंतरिक्ष तकनीक में अपनी पहचान बना ली है. बेंगलुरु की एस्ट्रोबेस स्पेस टेक्नोलॉजीज के सह-संस्थापक और सीईओ नीरज के नेतृत्व में कंपनी ने 800 किलो न्यूटन क्षमता वाला फुल-फ्लो स्टेज्ड कंबशन (एफएफएससी) एलओएक्स-मीथेन रॉकेट इंजन तैयार किया है. इस इंजन का नाम एवरेस्ट रखा गया है. खास बात यह है कि उनकी इस उपलब्धि की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सराहना की है.
नीरज के पिता अशोक खंडेलवाल का चौमूं में बर्तन का कारोबार है. नीरज की शुरुआती पढ़ाई भी यहीं के निजी स्कूल में हुई. सामान्य पारिवारिक माहौल में पले-बढ़े नीरज के सपने जरूर असाधारण थे. पढ़ाई में रुचि और कुछ बड़ा करने की चाह उन्हें कोटा ले गई, जहां उन्होंने निजी कोचिंग से आईआईटी की तैयारी की. पहले ही प्रयास में जेईई में ऑल इंडिया में 143वीं रैंक हासिल की.
आईआईटी मुंबई से विद्युत अभियांत्रिकी की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें यूरोप की एक कंपनी से करीब 50-60 लाख रुपए सालाना पैकेज का ऑफर मिला. यह ऐसा अवसर था जिसे कोई भी युवा आसानी से छोड़ना नहीं चाहेगा, लेकिन नीरज का लक्ष्य सिर्फ अच्छी नौकरी हासिल करना नहीं था. उन्होंने विदेश जाने के बजाय भारत में रहकर कुछ अलग करने का फैसला किया. कुछ समय दोस्त की कंपनी में काम करने के बाद उन्होंने बिजनेस की राह पकड़ ली.
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दोस्त के साथ मिलकर नीरज ने 2018 में कॉइनडीसीएक्स की शुरुआत की. कंपनी ने तेजी से विस्तार किया और आज करीब 800 लोगों को रोजगार दे रही है. कंपनी का टर्नओवर करीब 25 हजार करोड़ रुपए बताया जाता है. आर्थिक सफलता हासिल करने के बाद भी नीरज यहीं नहीं रुके. उनके सामने अब एक ऐसा लक्ष्य था, जो सिर्फ सफलता से नहीं बल्कि देश की तकनीकी ताकत से जुड़ा था. उन्होंने भारत को अत्याधुनिक अंतरिक्ष तकनीक में आत्मनिर्भर और वैश्विक स्तर पर मजबूत बनाने का काम शुरू किया.
नीरज ने अपने आईआईटी बैचमेट और वैज्ञानिक देवा के साथ बेंगलुरु में एस्ट्रोबेस स्पेस टेक्नोलॉजीज की शुरुआत की. देवा करीब 10 वर्षों तक इसरो में काम कर चुके हैं. टीम ने रॉकेट इंजन तकनीक पर काम शुरू किया और करीब 18 महीने तक लगातार रिसर्च, डिजाइन और परीक्षण के बाद उन्होंने 800 किलो न्यूटन क्षमता वाला इंजन तैयार किया. इसका नाम एवरेस्ट इंजन रखा गया.
एवरेस्ट इंजन की उपलब्धि को केवल एक तकनीकी सफलता के रूप में देखना पूरी कहानी नहीं है. इसकी सबसे बड़ी कहानी यह है कि भारत में निजी कंपनियां अब अत्याधुनिक रॉकेट तकनीक विकसित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही हैं. एफएफएससी तकनीक और एलओएक्स-मीथेन प्रणोदक पर आधारित यह इंजन भारत की निजी अंतरिक्ष क्षमता के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस उपलब्धि को सराहा है.
हजारों करोड़ रुपए के कारोबारी सफर और अंतरिक्ष तकनीक में बड़ी उपलब्धि के बावजूद नीरज की जड़ें आज भी चौमूं में हैं. परिवार के साथ समय बिताना और प्रमुख त्योहार घर पर मनाना उनकी प्राथमिकता रहती है. उनकी कहानी सिर्फ एक युवा उद्यमी की सफलता नहीं, बल्कि उस सोच की कहानी है जिसमें छोटे शहर का एक लड़का आईआईटी तक पहुंचता है, करोड़ों-अरबों का कारोबार खड़ा करता है और फिर देश के अंतरिक्ष मिशन की तकनीकी क्षमता बढ़ाने में जुट जाता है. चौमूं का यह बेटा अब आसमान नहीं, अंतरिक्ष की ऊंचाइयों को छूने की तैयारी में है.
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August 25, 2026, 06:41 IST



