नागौर की मिट्टी में जन्मी कृष्ण भक्ति की अनोखी कहानियां, मीरा के साथ करमा बाई और रानाबाई का भी रहा खास नाम

Last Updated:September 07, 2026, 11:01 IST
Nagaur Hindi News: नागौर जिला केवल ऐतिहासिक विरासत के लिए ही नहीं, बल्कि कृष्ण भक्ति की समृद्ध परंपरा के लिए भी जाना जाता है. यहां करमा बाई से लेकर रानाबाई तक कई भक्तों की गाथाएं लोक स्मृतियों में आज भी जीवंत हैं. इन भक्तों ने अपनी श्रद्धा और समर्पण से कृष्ण भक्ति को नई पहचान दी. नागौर की धरती से जुड़ी ये कथाएं राजस्थान की भक्ति परंपरा का अनूठा अध्याय हैं.
नागौर की पहचान केवल भक्त मीरा की कृष्ण भक्ति से नहीं जुड़ी है, बल्कि इस धरती ने ऐसे कई संतों और भक्तों को जन्म दिया, जिनका पूरा जीवन भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अटूट आस्था और समर्पण का उदाहरण रहा है. करमा बाई, रानाबाई और संत किशनदास महाराज की भक्ति कथाएं आज भी नागौर और आसपास के क्षेत्रों में श्रद्धा के साथ सुनाई जाती हैं. इन भक्तों की जीवन गाथाएं कृष्ण प्रेम की अलग-अलग तस्वीर पेश करती हैं.
बोरावड़ के पास स्थित कालवा बड़ा गांव में जीवन राम डूडी के घर करमा बाई का जन्म हुआ था. बचपन से ही उनका मन भगवान कृष्ण की भक्ति में रमा रहता था. लोकमान्यता के अनुसार उनके पिता उन्हें भगवान की पूजा की जिम्मेदारी सौंपकर पुष्कर स्नान के लिए चले गए थे. करमा बाई ने पूरी श्रद्धा से भगवान की सेवा की. उनकी सरलता और निष्कपट भक्ति से भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न हुए और उनकी भक्ति अमर कथा बन गई.
करमा बाई से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध लोककथा उनके हाथ के बनाए खीचड़े से जुड़ी है. मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण स्वयं करमा बाई के हाथ का खीचड़ा खाने के लिए आते थे. इसी वजह से आज भी करमा बाई की कथा कृष्ण भक्ति और वात्सल्य भाव का प्रतीक मानी जाती है. जीवन के अंतिम समय में वे जगन्नाथपुरी चली गईं. पुजारियों की मान्यता के अनुसार 30 नवंबर 1702 को भगवान के दर्शन के बाद वे सशरीर बैकुंठ चली गईं.
Add as Preferred Source on Google
नागौर की कृष्ण भक्त परंपरा में रानाबाई का नाम भी विशेष श्रद्धा से लिया जाता है. रानाबाई को राजस्थान की दूसरी मीरा कहा जाता है. वे संत चतुरदासजी की शिष्या थीं और उनका जीवन पूरी तरह भगवान की भक्ति को समर्पित रहा. लोककथाओं के अनुसार रानाबाई ने विवाह नहीं किया और सांसारिक जीवन से दूर रहकर भक्ति को अपना मार्ग बनाया. उनकी साधना और कृष्ण के प्रति समर्पण आज भी लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है.
रानाबाई के जीवन से जुड़ी मान्यता के अनुसार उन्होंने विक्रम संवत 1627 में फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी के दिन जीवित समाधि ली थी. उनकी स्मृति और भक्ति को आज भी श्रद्धालु विशेष महत्व देते हैं. रानाबाई के नाम से हर माह मेला भरने की परंपरा है इन मेलों में श्रद्धालु पहुंचकर उनकी भक्ति को याद करते हैं और धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होते हैं. इस तरह रानाबाई की कृष्ण भक्ति पीढ़ियों से लोक आस्था का हिस्सा बनी हुई है.
नागौर की संत परंपरा में टांकला में जन्मे संत किशनदास महाराज का भी अहम स्थान माना जाता है. स्थानीय मान्यता में उन्हें भगवान श्रीकृष्ण का अवतार माना जाता है. उनके जन्म को लेकर भी धार्मिक कथा प्रचलित है, जिसके अनुसार भगवान शिव साधु के वेश में धरती पर आए थे. संत किशनदास के गुरु दरियाव महाराज बताए जाते हैं. उनकी आध्यात्मिक साधना और संत जीवन ने क्षेत्र में गहरी धार्मिक छाप छोड़ी.
मान्यता है कि संत किशनदास महाराज ने विक्रम संवत 1825 में 79 वर्ष की आयु में जीवित समाधि ली थी. उनकी आध्यात्मिक ख्याति इतनी व्यापक बताई जाती है कि राजा भर्तृहरि और गोपीचंद भी उनके दर्शन के लिए आए थे. आज भी उनके मंदिर में चरण पादुकाएं रखी हुई थी. करमा बाई की कृष्ण भक्ति, रानाबाई का त्याग और संत किशनदास की साधना मिलकर नागौर की समृद्ध संत परंपरा और धार्मिक विरासत की कहानी बयां करते हैं.
न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें। राजस्थान की ताजा खबरें पढ़ने के लिए क्लिक करें|First Published :
September 07, 2026, 11:01 IST



