जो शहर दूसरों की प्यास बुझाता था, आज वॉटर ट्रेन के सहारे क्यों? जानिए पाली का कड़वा सच

पाली. राजस्थान का पाली शहर एक बार फिर भयंकर जल संकट की कगार पर खड़ा है. इस बार मानसून में हुई कम बारिश ने शहरवासियों की धड़कनें बढ़ा दी है. हर बार की तरह जब बांध जवाब देने लगते हैं, तो प्रशासन का रुख जोधपुर की ओर वॉटर ट्रेन चलाने के लिए होता है. लाखों रुपये पानी की तरह बहाए जाते हैं, लेकिन जनता की प्यास फिर भी अधूरी रह जाती है. मगर हर बार यह सवाल इन हालातों के बीच उठकर खड़ा हो जाता है कि जब पानी की दिक्कत हर बार रहती है तो आखिर प्रशासन इसका पाइप लाइने बिछाकर स्थाई समाधान क्यों नही करता?
2250 करोड की जवाई पुनर्भरण की योजना भी बनी मगर न जाने किन वजह से पार नहीं लग पाई. करोड़ों रुपये पानी की तरह भाड़े में बहाए जाते हैं, लेकिन जनता की प्यास फिर भी अधूरी रह जाती है. ऐसे में हर बार यह कड़वा सवाल उठ खड़ा होता है कि जब पानी का संकट हर दूसरे-तीसरे साल तय है, तो प्रशासन और सरकार पाइपलाइन बिछाकर इसका स्थायी समाधान क्यों नहीं करती? 2250 करोड़ रुपये की जवाई पुनर्भरण योजना बनी, मगर न जाने किन वजहों से अब तक धरातल पर नहीं उतर पाई.
2002 से जारी है ‘वॉटर ट्रेन’ का सिलसिला
राजस्थान में पाली संभवतः एकमात्र ऐसा शहर है जिसकी प्यास बुझाने के लिए दशकों से भारतीय रेलवे की पटरियों का सहारा लिया जा रहा है. पाली के लिए पहली बार ‘वॉटर स्पेशल ट्रेन’ वर्ष 2002 में चलाई गई थी. इसके बाद जब भी मानसून कमजोर रहा तब-तब जोधपुर के भगत की कोठी और कांकाणी रेलवे स्टेशन से पानी के वैगन भरकर पाली भेजने पड़े. वर्ष 2009, 2016, 2019, 2021 और 2022 में रेलवे स्टेशन से पानी के वैगन भरकर पाली भेजने पड़े.
वॉटर ट्रेन के लिए रोजाना 20 लाख भुगतान करना पड़ता है
उत्तर पश्चिम रेलवे को इस वॉटर ट्रेन के संचालन के लिए प्रतिदिन लगभग 20 लाख रुपये का भुगतान किया जाता है. एक सीजन में जब 2 से 4 महीने तक ट्रेन चलाई जाती है, तो सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये केवल ट्रेन के भाड़े पर खर्च हो जाते हैं. एक वॉटर ट्रेन से दिन में 20 से 25 लाख लीटर पानी ही पाली पहुंच पाता है, जबकि शहर की दैनिक आवश्यकता 5 करोड़ लीटर से अधिक है. करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी आपूर्ति सामान्य नहीं हो पाती.
रोहट तक पानी आ गया, फिर 30 किमी आगे पाली क्यों नहीं?
स्थानीय नागरिकों में जल प्रबंधन की नाकामी और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को लेकर भारी आक्रोश है. श्याम मेवाड़ा ने कहा कि पिछले 20 सालों से क्षेत्र में विधायक भाजपा के रहे, लेकिन उन्होंने कभी यह प्रयास नहीं किया कि पाली की इस मूल पानी की समस्या का स्थायी समाधान कैसे निकाला जाए. जोधपुर से रोहट तक पानी की मुख्य पाइपलाइन आ चुकी है. रोहट से पाली की दूरी मात्र 30 किलोमीटर है, लेकिन वहां से आगे पाइपलाइन बढ़ाने की प्रशासनिक स्वीकृति नहीं मिलती. टेंडर होने की बातें तो सामने आती हैं, लेकिन योजनाएं फलीभूत क्यों नहीं हो पा रहीं, इसका जवाब किसी के पास नहीं है.
पानी के लिहाज से पाली आज भी बदकिस्मत शहर
पाली वासी रतन सिंह और प्रमोद प्रजापत कहते हैं कि पूरे राजस्थान में पाली ही एक ऐसा बदकिस्मत शहर है, जिसे प्यास बुझाने के लिए ट्रेन पर निर्भर रहना पड़ता है. सालों से हम ट्रेन के भरोसे ही जी रहे हैं. आज भी स्थिति यही है कि जब जोधपुर से ट्रेन आएगी, तभी हमें पीने का पानी नसीब होगा. पहले पाली में रोज नल से पानी आते थे, अब 2 से 3 दिनों में एक बार पानी आ रहा है. लोग बहुत परेशान हैं.
जवाई पुनर्भरण परियोजना’ भी धरातल पर नहीं उतर सका
पाली को जल संकट से मुक्ति दिलाने के लिए समय-समय पर बड़ी योजनाओं के दावे तो किए गए, लेकिन वे प्रशासनिक फाइलों और बजट के फेर में उलझकर रह गई. जवाई बांध में पानी की आवक बढ़ाने के लिए उदयपुर के सेई और वाकल बेसिन (साबरमती बेसिन) से पानी डायवर्ट करने के लिए लगभग 2,250 करोड़ रुपये की ‘जवाई पुनर्भरण परियोजना’ तैयार की गई थी. यदि यह परियोजना समय पर पूरी हो जाती, तो पाली जिले को कभी किसी ट्रेन या टैंकर की ओर मुंह नहीं देखना पड़ता.
स्थायी ढांचे पर ध्यान देने की है जरूरत
हर बार जब जल संकट गहराता है, तो वॉटर ट्रेन और टैंकरों के नाम पर करोड़ों रुपये का आपातकालीन बजट मंजूर कर दिया जाता है. लेकिन जैसे ही अगली बारिश में संकट थोड़ा टलता है, स्थायी पाइपलाइन और जवाई पुनर्भरण की फाइलें ठंडे बस्ते में बंद हो जाती है. प्रतिदिन लाखों रुपये ट्रेन के भाड़े में देने के बजाय यदि सरकार इस राशि को 30 किलोमीटर की पाइपलाइन और जवाई पुनर्भरण योजना को पूरा करने में लगाए, तो पाली को हमेशा के लिए इस संकट से निजात मिल सकती है.



