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तेल के बाजार में लगी आग से कब तक बचेगा भारत? अब UAE पर खतरा – Saudi arabia east west pipeline attack crude oil price skyrocket how far india insulate

सौ बात की एक बात ये कि एक पाइपलाइन पर हमले ने पूरी दुनिया को हिला दिया है. और कोई बोल भी नहीं रहा कि हमला उसने किया है, कोई जिम्मेदारी ही नहीं ले रहा. लेकिन इतना जरूर है कि हुआ ये उसी युद्ध की वजह से है जो अमेरिका ने ईरान पर छेड़ा था. ईरान की रणनीति ही यही थी कि दुनिया में तेल की मारामारी होगी तो दुनिया अमेरिका को रोकेगी. इसलिए उसने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को रोका था. लेकिन थोड़ी मारामारी के बाद तेल का मामला थोड़ा-बहुत कंट्रोल में आता लग रहा था सबको. तो ईरान को वो प्रेशर उतना कारगर नहीं हो पा रहा था. लेकिन अब जो हुआ है उससे दुनिया में कच्चे तेल के बाजार में फिर आग लग गई है. भारत में अभी पता नहीं चल रहा पब्लिक को क्योंकि यहां तो अभी पेट्रोल-डीजल के दाम वही बना कर रखे हैं तेल कंपनियों ने जितने पिछले कुछ दिनों से थे. लेकिन माहौल बदलता जा रहा है दुनिया भर में.

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में जो कच्चा तेल ईरान युद्ध के बाद भी 80-90 डॉलर प्रति बैरल के रेट पर चल रहा था, वो अब 100 डॉलर के ऊपर ही बना हुआ है और 108-110 डॉलर को भी छू चुका है. यानी कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं. और दुनिया भर में डीजल और पेट्रोल और महंगे होने का डर फिर से छा गया है. और ये जो अभी हुआ है वो क्यों हुआ है? ईरान युद्ध तो फिर भड़क ही रहा है. हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर हमले किए ही हुए हैं. लेकिन जो सबसी बड़ी घटना हुई है जिसपर सबको ध्यान देने की जरूरत है वो ये कि सऊदी अरब की अपनी वो पाइपलाइन बंद करनी पड़ गई है जो उसकी ही नहीं, एक तरह से दुनिया की लाइफलाइन बन गई थी.

ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन निया की लाइफलाइन

सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन. ये वो पाइपलाइन थी जिससे सऊदी अरब अपनी एक साइड से पूरा देश क्रॉस कर के दूसरे साइड तेल भेज रहा था और उसको लाल सागर की तरफ दुनिया में सप्लाई करने लग गया था, ताकि रास्ते में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज आए ही नहीं. उस पाइपलाइन पर ऐसा अटैक हो गया कि पाइपलाइन ही बंद हो गई. और अटैक हूती लड़ाकों ने नहीं किया. अटैक ईरान की तरफ से भी नहीं हुआ. अटैक लॉन्च हुआ इराक की तरफ से. और पूरी दुनिया इससे हिल गई है. कोई ग्रुप इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ले रहा, फिर भी हकीकत ये है कि युद्ध का रुख ईरान अब अपने हिसाब से मोड़ सकता है, जंग की दिशा तेहरान तय करता दिख रहा है. क्योंकि ईरान ने कई देशों में कई साल कई लड़ाकों को समर्थन दे रखा है. हूती लड़ाके यमन में ईरान के खड़े किये ही माने जाते हैं. लेबनान में हिज़्बुल्लाह को भी ईरान का समर्थन है. ऐसे ही कई छोट-बड़े लड़ाकों के गुटों को ईरान सीरिया में भी समर्थन देता है और इराक में भी कई गुट हैं लड़ाकों के जिनको ईरान का ही फ्रंट माना जाता है. और यही माना जा रहा था ऐसी ताकतें जिनको ईरान समर्थन देता है हर तरफ से दबाव बना रही हैं, और होर्मुज से लेकर लाल सागर तक तेल के रास्ते एक-एक करके संकरे होते जा रहे हैं.

होर्मुज स्‍ट्रेट पहले से बंद है और अब ऐसे में तेल पाइपलाइन पर अटैक ने एनर्जी सिक्‍योर‍िटी और खतरे में डाल दिया है. (फोटो: Reuters)

डर फिर जिंदा हो गया

फरवरी में जब ये युद्ध (ईरान जंग) शुरू हुआ था तब दुनिया में भारी घबराहट थी, तेल सप्लाई को लेकर बड़ा आतंक था, बाजार में दहशत छा गई थी कि खाड़ी का तेल रुक जाएगा. फिर पिछले महीनों में वो धीरे-धीरे उतना नहीं रह गया था जितना शुरू में था. कीमतें थोड़ी संभली थीं, सऊदी अरब और UAE की जो पाइपलाइनें थीं जिनके जरिये स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बायपास करके तेल दुनिया में भेजा जा रहा था उनकी वजह से भी झटका कुछ हद तक कम हो गया था. दुनिया को लग रहा था कि सबसे बुरा दौर निकल चुका है. अब ये हमला होने के बाद वही पुराना डर फिर जिंदा हो गया है, वही आशंका फिर सच होती दिख रही है, वही खौफ फिर खड़ा हो गया है.

सऊदी अरब की पाइपलाइन की क्षमता 70 लाख बैरल तेल रोज भेजने की है, और ईरान ने युद्ध के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को ब्लॉक किय तो इस पाइपलाइन से रोज 40 से 50 लाख बैरल तेल जा रहा था, यानी पूरी दुनिया की सप्लाई का करीब 4% हिस्सा यहां से जाने लग गया था. अब ये पाइपलाइन बंद हो गई है और ये रास्ता भी रुक गया है, तो यहां तेल का फ्लो थम गया है, यानी दुनिया की ये लाइफलाइन टूट गई है.

सैटेलाइट ने दिखाई भयावह तस्‍वीर

रेगिस्तान के बीच जला हुआ पाइपलाइन के एक पंपिंग स्टेशन पर बड़ा अटैक हो गया, मदीना के दक्षिण-पूर्व में अल-मसाबाह नाम की जगह के पास एक पंप हाउस पूरी तरह झुलस गया. सैटेलाइट तस्वीरों में दुनिया को दिखा कि चारों तरफ वहां तेल के जलने से जमीन तक काली पड़ चुकी है ऐसा भीषण हमला हुआ है. माना जा रहा है कि इराक की तरफ से आए कई ड्रोनों ने रियाद और मदीना इलाके में ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर हमला किया. पंपिंग स्टेशन जल गए, कुछ लोग घायल हुए, और सऊदी अरब को पूरी लाइन ही बंद करनी पड़ गई. ये पाइपलाइन सऊदी अरब के पूर्वी हिस्से में फारस की खाड़ी की तरफ अबकैक के तेल कुओं से निकलती है, और पूरे सऊदी अरब के रेगिस्तान को बीच से चीरती हुई उसके पश्चिम में लाल सागर के यानबू बंदरगाह तक 1200 km चलती है. क्योंकि सऊदी अरब के ज्‍यादातर तेल फारस की खाड़ी की साइड ही निकलता है. पश्चिम में ज्‍यादा तेल नहीं है. खाड़ी की साइड ही निकलता है और खाड़ी से ही दुनिया भर में जाता था होर्मुज गलियारे से होते हुए. लेकिन दूसरी साइड से भी यानी लाल सागर की साइड से भी तेल भेजने के लिए सऊदी अरब ने ये पाइपलाइन बिछाई हुई थी. और ईरान ने जब होर्मुज को ब्लॉक कर दिया तो सऊदी अरब दूसरी साइड यानी यानबू बंदरगाह से तेल भेजने लग गया था. इस पाइपलाइल के रास्ते में रियाद और मदीना के रेगिस्तानी इलाके आते हैं, जहां बीच-बीच में पाइपलाइन में पंपिंग स्टेशन बने हुए हैं जिनके पंप तेल को आगे धकेलते रहते हैं पश्चिम की तरफ.

हर दिन 70 लाख बैरल तेल भेजने की क्षमता

इस पाइपलाइन की क्षमता 70 लाख बैरल तेल रोज भेजने की है, और ईरान ने युद्ध के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को ब्लॉक किय तो इस पाइपलाइन से रोज 40 से 50 लाख बैरल तेल जा रहा था, यानी पूरी दुनिया की सप्लाई का करीब 4% हिस्सा यहां से जाने लग गया था. अब ये पाइपलाइन बंद हो गई है और ये रास्ता भी रुक गया है, तो यहां तेल का फ्लो थम गया है, यानी दुनिया की ये लाइफलाइन टूट गई है. अनुमान है कि यानबू में सिर्फ 5-7 दिन का स्टॉक बचा है. मिस्र के ऐन सुखना और सिदी करिर में भी कुछ भंडार हैं, लेकिन वो भी कुछ ही दिनों का सहारा दे सकते हैं. उसके बाद रोज दुनिया में 40 लाख बैरल की सप्लाई और कम हो जाएगी.

रेड सी के लिए गेटवे कहे जाने वाले बाब अल-मंदेब स्‍ट्रेट पर भी दबाव बढ़ गया है. वहीं, ईरान पश्चिम एशिया में तमाम देशों पर भारी पड़ रहा है. (फोटो: Reuters)

पाइपलाइन का रास्‍ता भी बंद

होर्मुज गलियारा तो अब भी लगभग बंद ही है. फारस की खाड़ी से अरब सागर को निकलने वाला वो संकरा मुहाना स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जहां से पहले रोज करीब 2 करोड़ बैरल तेल निकलता था, अब वहां से बहुत कम जहाज ही निकल पा रहे हैं. अमेरिका और ईरान के युद्ध को चलते हुए 7 महीने हेने वाले हैं. सऊदी अरब अपना ज्यादातर तेल इसी पाइपलाइन से लाल सागर भेज रहा था, ताकि खाड़ी की ब्लॉकेज से बच सके. और यानबू से तेल दो तरफ जाता है. एक रास्ता दक्षिण में बाब अल-मंदेब से होकर अदन की खाड़ी और फिर एशिया की ओर जाता है, दूसरा रास्ता उत्तर में लाल सागर से मिस्र की सुमेड पाइपलाइन होते हुए भूमध्य सागर और यूरोप की ओर जाता है. स्‍वेज नहर से भी जाता है. और अब यमन के हूती लड़ाके बाब अल-मंदेब पर शिकंजा कस रहे हैं, और वो वहां से जाने वाले सऊदी अरब के जहाजों पर हमले कर रहे हैं. यानी एक तरफ होर्मुज बंद है, दूसरी तरफ लाल सागर भी खतरे में आ गया है, और उस के ऊपर अब ये पाइपलाइन जो आखिरी बड़ा रास्ता थी वो भी बंद हो गई है.

UAE की भी हबशान से फुजैराह तक की पाइपलाइन है. जो अबू धाबी के अंदरूनी इलाकों के तेल कुओं से उसके फुजैराह बंदरगाह तक जाती है. ये पाइपलाइन ओमान की खाड़ी में खुलती है, यानी होर्मुज के रास्ते जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती. इससे भी तेल जा रहा है. इसकी क्षमता 10-15 लाख बैरल तेल रोज भेजने की है. अब इस पर भी खतरा मंडरा रहा है. ईरान खुद अटैक ना भी करे, उसके समर्थन वाले किसी लड़ाकों के गुट ने अगर हमला कर दिया तो इस रास्ते से भी तेल रुक सकता है. मिस्र की सुमेड पाइपलाइन लाल सागर के ऐन सुखना से भूमध्य सागर के सिदी करिर तक तेल पहुंचाती है. वो भी निशाने पर आ सकती है.

ईरान और हूती बढ़ा रहे दबाव

इराक की धरती से हमला हुआ तो इराक ने अपने दक्षिणी मयसान प्रांत के कमांडर को तो हटा दिया, जांच भी शुरू कर दी कि उसके यहां से सऊदी अरब की तरफ हमला कैसे हो गया. इराक ने कार्रवाई की तो फिलहाल तो सऊदी अरब ने इराक पर कोई जवाबी हमला नहीं किया है क्योंकि वो भी समझ रहा है कि इराक की सरकार ने तो ये करवाया नहीं है. ये वहां पर ईरान के समर्थन वाले लड़ाकों का किया-धरा लगता है. लेकिन सऊदी अरब भी कब तक अपने ऊपर हमले होते रहने देगा. दक्षिण से हूती लड़ाके हमले कर रहे हैं. वो रिफाइनरियों को भी निशाना बना रहे हैं. और उत्तर की तरफ से इराक की धरती से उसकी पाइपलाइन पर हमला हो गया. किसी ने ज़िम्मेदारी तो नहीं ली लेकिन ट्रंप भी कह रहे हैं लगता है कि ये ईरान के इशारे पर ही हुआ. कोई दावा नहीं कर रहा, फिर भी ईरान का साथ देने वाले लड़ाकों के ग्रुप हर मोर्चे पर दबाव बढ़ा रहे हैं. तेल को हथियार बनाकर दुनिया पर दबाव बना रहे हैं.

पाइपलाइन शुरू होने में कम से कम महीना-2 महीना

पाइपलाइन को दोबारा शुरू करने में महीना-दो महीना तो लगा ही जाएगा. सऊदी अरब का तेल उत्पादन पहले ही बहुत ही कम हो चुका है. यानी तेल की कीमतें ऊंची ही रहेंगी ये साफ दिख रहा है. और सबसे बड़ी बात ये कि मिलिट्री के अड्डों पर तो एयर डिफेंस सिस्टम भी लगा लो, लेकिन सैकड़ों किलोमीटर तक फैली हुई पाइपलाइन पर कहीं भी हमला ना हो इसको कैसे रोका जाए? कहां-कहां मिसाइलें लगा सकता है कोई देश पूरी पाइपलाइन के रास्ते में. यानी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते जाने की जरूरत ही ना पड़े ये जो पाइपलाइन के ज़रिये कोशिश की गई थी, अब उस रणनीति की भी कमजोर कड़ी सामने आ गई है इस अटैक के बाद.

UAE को भी सताने लगा डर

UAE की भी हबशान से फुजैराह तक की पाइपलाइन है. जो अबू धाबी के अंदरूनी इलाकों के तेल कुओं से उसके फुजैराह बंदरगाह तक जाती है. ये पाइपलाइन ओमान की खाड़ी में खुलती है, यानी होर्मुज के रास्ते जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती. इससे भी तेल जा रहा है. इसकी क्षमता 10-15 लाख बैरल तेल रोज भेजने की है. अब इस पर भी खतरा मंडरा रहा है. ईरान खुद अटैक ना भी करे, उसके समर्थन वाले किसी लड़ाकों के गुट ने अगर हमला कर दिया तो इस रास्ते से भी तेल रुक सकता है. मिस्र की सुमेड पाइपलाइन लाल सागर के ऐन सुखना से भूमध्य सागर के सिदी करिर तक तेल पहुंचाती है. वो भी निशाने पर आ सकती है. इराक और तुर्की की किरकुक-ज़ेहान पाइपलाइन भी है. वो उत्तरी इराक से तुर्की के भूमध्यसागर के बंदरगाह तक जाती है, हालांकि उसकी क्षमता बहुत कम है. एक पुरानी IPSA पाइपलाइन भी है जो बंद पड़ी है. वो इराक के ज़ुबैर से सऊदी अरब होते हुए यानबू के पास मुअज़्ज़िज तक जाती थी. वो बहुत साल से बंद पड़ी है, उसको भी शुरू करने की बात चल रही थी.

पाइपलाइन पर अटैक होते ही पूरी रणनीति फेल

मतलब ईरान ने होर्मुज को बंद किया तो ये रणनीति बन रही थी कि होर्मुज जाना ही ना पड़े ऐसे रास्ते निकाले जाएं, ताकि ईरान ब्लैकमेल ना कर सके. ये सब ईरान को जंग में कमजोर कर रहा था. लेकिन पाइपलाइन पर अटैक हो जाने के बाद इस पूरी रणनीति पर ही सवाल खड़े हो गए हैं. यानी दुनिया को चलाने वाले तेल का बहुत बड़ा हिस्सा दो फंदों में फंस गया है. एक होर्मुज, दूसरा बाब अल-मंदीब. पाइपलाइन टूटी तो पुराना डर वापस आ गया है. और तेल के खेल में ईरान का पलड़ा भारी होता जा रहा है. उसको पता है अमेरिका में मिडटर्म चुनाव वाले हैं. ट्रंप पर दबाव है कि वो तेल और महंगा ना होने दें. महंगा तेल ट्रंप की पूरी रणनीति ही नहीं, उनकी पूरी राजनीति भी बिगाड़ सकता है. अगर पाइपलाइन जल्दी नहीं खुली और लाल सागर और खतरनाक हुआ तो कीमतें और चढ़ सकती हैं. कुछ अनुमान हैं कि कच्चे तेल की क़ीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक भी जा सकती हैं. यानी ये युद्ध अब छोटा झटका नहीं रहा, लंबी परीक्षा बन गया है. तेल देखो और तेल की धार देखो. सौ बात की एक बात.

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