दिल्ली के सेंट्रल रिज से हटेंगे 13 हजार पेड़, सुप्रीम कोर्ट ने क्यों दी मंजूरी, CJI सूर्यकांत तक ने लगाई मुहर

दिल्ली की सेंट्रल रिज को राजधानी के फेफड़े कहा जाता है. अब इसी हरित इलाके में बड़े पैमाने पर पेड़ों की छंटाई और पौधरोपण होने जा रहा है. करीब 13 हजार पेड़ अभी हटाए जाने हैं. सुनने में यह बात चौंकाने वाली लग सकती है. आखिर पेड़ बचाने की बात के बीच पेड़ हटाने की मंजूरी क्यों? मामला विलायती कीकर, बबूल और यूकेलिप्टस जैसी आक्रामक प्रजातियों से जुड़ा है. दिल्ली वन विभाग इन्हें हटाकर उनकी जगह स्थानीय प्रजातियों के पेड़ लगाना चाहता है. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस योजना को हरी झंडी दे दी. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यह काम सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहना चाहिए. जमीन पर इसका असर भी दिखना चाहिए.
कहानी यहीं खत्म नहीं होती. सेंट्रल रिज में पहले ही हजारों आक्रामक पेड़ हटाए जा चुके हैं और उनकी जगह लाखों पेड़-पौधे लगाए गए हैं. बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार अब करीब 13,161 पेड़ हटाने का काम बाकी है. इसके बाद स्थानीय प्रजातियों का बड़े पैमाने पर पौधरोपण होना है. लेकिन इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल भी उठे हैं. आपत्ति यह है कि पुराने पेड़ हटाते समय जमीन की ऊपरी उपजाऊ मिट्टी और पर्यावरण को नुकसान हो सकता है. यही विवाद दिल्ली हाईकोर्ट तक पहुंचा था. अब सुप्रीम कोर्ट ने पूरी प्रक्रिया को तय योजना और विशेषज्ञों की निगरानी में आगे बढ़ाने की अनुमति दी है. तो आखिर कोर्ट ने यह फैसला क्यों लिया और सेंट्रल रिज में क्या बदलने वाला है? आइए समझते हैं.
13 हजार पेड़ अभी हटाए जाने बाकी
दिल्ली वन विभाग की योजना के मुताबिक सेंट्रल रिज के करीब 191 हेक्टेयर क्षेत्र से कुल 22,188 आक्रामक प्रजातियों के पेड़ हटाए जाने हैं. इनमें विलायती कीकर, बबूल और सफेदा यानी यूकेलिप्टस शामिल हैं. इनमें से करीब 9,000 पेड़ पहले ही हटाए जा चुके हैं. अब लगभग 13,161 पेड़ करीब 70 हेक्टेयर क्षेत्र में हटाए जाने बाकी हैं. इन पेड़ों को हटाने के साथ स्थानीय प्रजातियों को बढ़ावा देने की योजना है. इनमें नीम, बरगद, पीपल, जामुन और अमलतास जैसे पेड़ शामिल हैं. पूरी योजना के तहत करीब 7.29 लाख पेड़ और झाड़ियां लगाने का लक्ष्य रखा गया है.
7.29 लाख पेड़-पौधे लगाने की तैयारी
वन विभाग की ओर से अदालत में बताया गया कि करीब 120 हेक्टेयर क्षेत्र में अब तक 5.31 लाख पेड़ और झाड़ियां लगाई जा चुकी हैं. इनमें करीब 2.23 लाख पेड़ और 3.07 लाख झाड़ियां शामिल हैं. विभाग का कहना है कि पहले आक्रामक प्रजातियों को हटाया गया और उसके बाद वहां स्थानीय प्रजातियों का पौधरोपण किया गया. वन विभाग के मुताबिक अगर आक्रामक पेड़ों को हटाया नहीं गया तो नए लगाए गए स्थानीय पौधों के टिकने में परेशानी होगी. इसी आधार पर बाकी क्षेत्र में भी पेड़ हटाने और पौधरोपण का काम आगे बढ़ाने की अनुमति मांगी गई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों दी मंजूरी?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने दिल्ली रिज के वन बहाली अभियान को मंजूरी दी. अदालत ने कहा कि आक्रामक प्रजातियों को हटाने के साथ स्थानीय प्रजातियों का बड़े पैमाने पर पौधरोपण किया जाए. हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि पूरी प्रक्रिया तय योजना के मुताबिक होनी चाहिए. कोर्ट के आदेश के अनुसार काम दिल्ली इको-रिस्टोरेशन प्लान 2026-30 के तहत होगा. यह योजना देहरादून स्थित वन अनुसंधान संस्थान ने तैयार की है. पूरे काम की निगरानी रिज प्रबंधन बोर्ड करेगा. वन विभाग को काम पूरा होने के बाद अंतरिम अनुपालन रिपोर्ट भी देनी होगी.
CJI सूर्यकांत ने भी दी नसीहत
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने योजना की सराहना की. उन्होंने कहा कि यह अच्छी पहल हो सकती है, लेकिन इसका असर सिर्फ कागजों पर नहीं दिखना चाहिए. उन्होंने आक्रामक प्रजातियों को लेकर कहा कि यूकेलिप्टस और विलायती कीकर जैसी प्रजातियां भूजल स्तर और जमीन की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती हैं. CJI ने यह भी कहा कि कई जगह किसान इनके नुकसान से अनजान रहते हुए यूकेलिप्टस लगाते रहे. अब उन्हें इसके विकल्प के तौर पर पोपलर जैसे पेड़ मिल रहे हैं. अदालत ने यह बात भी कही कि स्थानीय प्रजातियों का पौधरोपण करने के लिए कई जगह पहले आक्रामक प्रजातियों को हटाना जरूरी हो सकता है.
पुराने पेड़ हटाने पर क्या था विवाद?
इस पूरी प्रक्रिया को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में आपत्ति भी दर्ज कराई गई थी. अरावली बचाओ सिटिजंस मूवमेंट के प्रबंध न्यासी लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत्त) सरवदमन सिंह ओबेरॉय ने अवमानना याचिका दाखिल की थी. इसमें सेंट्रल रिज में निर्माण, सफाई, खुदाई और पेड़-पौधे हटाने से जुड़े आदेशों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था. 20 अगस्त को दिल्ली हाईकोर्ट ने सेंट्रल रिज में निर्माण, सफाई, खुदाई या पेड़-पौधों को हटाने पर रोक लगाने का निर्देश दिया था. सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने कहा कि उन्हें नए पेड़ लगाने पर आपत्ति नहीं है. उनकी चिंता पुराने पेड़ों को हटाने के तरीके और इससे ऊपरी मिट्टी को होने वाले संभावित नुकसान को लेकर थी.
सितंबर के बाद पौधरोपण पर असर का तर्क
वन विभाग की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि पेड़ हटाने और पौधरोपण का काम स्वीकृत योजना के अनुसार किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि मानसून सितंबर में खत्म हो जाएगा. अगर पौधरोपण सितंबर के बाद किया गया तो अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सकते. उन्होंने यह भी बताया कि करीब 9,000 आक्रामक पेड़ हटाने के बाद संबंधित क्षेत्र में बड़ी संख्या में स्थानीय पेड़ और झाड़ियां लगाई जा चुकी हैं. अब बाकी आक्रामक पेड़ों को हटाना जरूरी है, ताकि अगले चरण का पौधरोपण किया जा सके.
विशेषज्ञों की टीम करेगी निगरानी
सुप्रीम कोर्ट ने केवल मंजूरी देकर मामला खत्म नहीं किया है. अदालत ने वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून से विशेषज्ञों की टीम गठित करने को कहा है. यह टीम वन विभाग की ओर से किए जा रहे काम का निरीक्षण करेगी और अदालत को अपनी रिपोर्ट देगी. यानी सेंट्रल रिज में अब पेड़ हटाने और नए पेड़ लगाने का काम एक तय योजना के तहत आगे बढ़ेगा. एक तरफ आक्रामक प्रजातियों को हटाने का अभियान है. दूसरी तरफ स्थानीय पेड़ों को बढ़ाने की कोशिश है. अब असली नजर इस बात पर रहेगी कि यह योजना जमीन पर कितनी प्रभावी तरीके से लागू होती है.



