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PM मोदी हार न मानने वाले नेता, हर कठिन परिस्थितियों को अवसर में बदल देते हैं | – News in Hindi

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज 76 वर्ष के हो गए हैं. उनका यह जन्मदिन ऐसे मोड़ पर आया है, जब भाजपा और उनकी सरकार कई चुनौतियों से जूझ रही है. हालांकि मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता बनी हुई है, लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी के उभार के बाद से युवाओं से संबंधित सवालों ने सत्तारूढ़ खेमे में बेचैनी पैदा कर दी है. प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी स्वयं को और अपनी सरकार को इन उलझनों से कैसे बाहर निकालते हैं, इसका जवाब अगले कुछ माह में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और गोवा विधानसभा चुनावों के नतीजों से मिलने की उम्मीद है. ये नतीजे न केवल देश की भावी राजनीति की दिशा तय करेंगे, बल्कि इस बात की ओर इशारा भी करेंगे कि मोदी 2029 में चौथी बार सरकार बनाने के लिए स्वयं को आगे करेंगे या अपना कोई नया वारिस चुनेंगे. इस समय तक वे 80 से सिर्फ एक साल कम, 79 साल के हो जाएंगे.

वैसे ऐसी ही कठिन और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियां 2024 के लोकसभा चुनावों के समय भी पैदा हुई थीं, जब भाजपा पूर्ण बहुमत से थोड़े से नंबरों से चूक गई थी. यह उसके ‘अबकी बार चार सौ पार’ के चुनावी नारे के लिए एक बड़ा झटका था. हालांकि इसके बाद पार्टी ने शानदार वापसी की. पहले हरियाणा के मुश्किल चुनावों में भाजपा को जीत मिली. फिर एक के बाद एक महाराष्ट्र, बिहार और बंगाल जैसे बड़े राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी ने प्रचंड विजय हासिल कर दक्षिण के अलावा देश की अन्य तीनों दिशाओं में भगवा परचम फहरा दिया.

बंगाल विजय को नरेंद्र मोदी के राजनीतिक कॅरियर की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा सकता है. उन्होंने भाजपा को एक ऐसे राज्य में जीत दिलवाई है, जो कभी वामपंथ का मजबूत गढ़ रहा और उसके बाद वहां ममता बैनर्जी का सिक्का चलता रहा. लेकिन इस जीत ने माहौल एकदम से बदल दिया. देश 2024 की भाजना की कठिन मशक्कत को एक तरह से भूल गया. हाल के दिनों तक तो ऐसा लगने लगा था कि ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ और परिसीमन जैसे बड़े फैसलों के साथ महिला आरक्षण का दांव खेलकर देश में विपक्ष को पूरी तरह से अप्रासंगिक बना दिया जाएगा. खासकर क्षेत्रीय दलों की कमर टूटती दिख रही थी. पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, ओडिशा में बीजद, बिहार में राजद, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना और शरद पवार की एनसीपी जैसे बड़े क्षेत्रीय क्षत्रप बिखरते नजर आ रहे थे. ऐसा लगने लगा था कि कांग्रेस और दक्षिण की द्रविड़ पार्टियों को छोड़कर मानो पूरा देश लगभग विपक्ष विहीन हो जाएगा.

BJP UCC Plan PM मोदी के समर्थक ही नहीं, बल्कि विरोधी भी काम करने को लेकर उनके उत्साह और असीम ऊर्जा के मुरीद रहे हैं.फिर अचानक से क्या बदल गया?

जुलाई माह में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के रूप में एक गैर राजनीतिक ग्रुप के उभार ने देश की राजनीति में नया भूचाल ला दिया. केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के रूप में सरकार पहली बार बाहरी दबाव के आगे झुकती नजर आई. पहली बार हिंदुत्व और राष्ट्रवाद जैसे भाजपा के पारंपरिक मुद्दे युवाओं और जेन जी के बीच अचानक से बेअसर प्रतीत होने लगे. प्रधानमंत्री का युवाओं को सीधे ‘फ्रेंड्स’ संबोधन चर्चा का विषय बन गया, इसलिए भी कि 75 साल की उम्र में मोदी संभवत: पहली बार मोबाइल की स्क्रीन को इस तरह से टटोलने की मशक्कत कर रहे थे. युवा आकांक्षाओं के इस आकस्मिक उभार के बीच मोदी के सामने एक चुनौती यह भी आ पड़ी है कि वे अब तक जिस नेता को ‘शहजादा’ कहकर भारत की जमीनी राजनीति से कटा हुआ ठहराने का प्रयास करते आ रहे थे, अब वही छात्रों के साथ संवाद कार्यक्रमों से ज्यादा अच्छे से कनेक्ट हो रहा है और मुख्यधारा के मीडिया में उसे तवज्जो भी दी जाने लगी है.

यूसीसी पर सहयोगी दल असहज…

समान नागरिक संहिता (UCC) भाजपा का एक कोर इश्यू रहा है. लेकिन अब इसको लेकर भी सरकार की रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं. केंद्रीय गृहमंत्री अतिम शाह के इस बयान कि 2029 तक एनडीए शासित 21 राज्यों में इसे लागू किया जाएगा, ने सहयोगी दलों को सतर्क और असहज कर दिया है. आंध्र प्रदेश में मुख्य सहयोगी दल तेलुगू देशम पार्टी (TDP) ने स्पष्ट कहा है कि इस मसले पर उससे अब तक कोई चर्चा नहीं हुई है. बिहार में नीतीश कुमार की जेडीयू और चिराग पासवान की एलजेपी तथा जयंत चौधरी की RLD जैसे सहयोगी भी इस मुद्दे पर भाजपा के साथ पूरे उत्साह से खड़े नजर नहीं आ रहे.

मगर मोदी हार न मानने वाले नेता…मोदी के समर्थक ही नहीं, बल्कि विरोधी भी काम करने को लेकर उनके उत्साह और असीम ऊर्जा के मुरीद रहे हैं. मोदी क्रिकेट मैच के उस खिलाड़ी की तरह की सोच रखते हैं कि आखिरी गेंद फेंके जाने से पहले तक हार नहीं मानी जानी चाहिए.मोदी एक बेहतरीन एवं आक्रमक वक्ता रहे हैं. उनमें विषम परिस्थितियों को भी अपने फायदे में बदलने की कुव्वत रही है. गुजरात दंगों ने भले ही दुनिया के अन्य हिस्सों में देश की छवि को नुकसान पहुंचाया, लेकिन मोदी के लिए तो ये दंगे उन्हें हिंदुत्ववादी नेता के रूप में उभारने में परोक्ष रूप से मददगार बन गए.मोदी की राजनीति चौंकाने वाली रही है. पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद उनका सबसे चौंकाने वाला फैसला 2016 की नोटबंदी थी. इससे अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान पहुंचा, लेकिन इसके बावजूद भाजपा की उत्तर प्रदेश में हुई अभूतपूर्व जीत का श्रेय इसी नोटबंदी को दिया गया. वे लोगों के जेहन में यह बात बैठाने में सफल रहे कि इससे काले धन पर अंकुश और आतंकवाद पर लगाम लगेगी.5 अगस्त 2019 को जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाना मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का और भी चौंकाने वाला फैसला था, लेकिन इससे वे प्रखर राष्ट्रवादी नेता के रूप में उभरे. अयोध्या में गर्भगृह का निर्माण पूरा होने के बाद 22 जनवरी 2024 को श्रीराम के बाल रूप (रामलला) की मूर्ति स्थापित की गई जिसमें मोदी मुख्य यजमान के तौर पर शामिल हुए. इससे उनकी हिंदुत्ववादी नेता की छवि और मजबूत हुई. बंगाल विजय को नरेंद्र मोदी के राजनीतिक कॅरियर की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा सकता है.अन्य उपलब्धियां भी महत्वपूर्ण…

यह कहना उनके प्रति अन्यायपूर्ण होगा कि वे सिर्फ हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के सहारे ही राजनीति कर रहे हैं. प्रधानमंत्री के रूप में उनके 12 साल के कार्यकाल की और भी कई उपलब्धियां रही हैं. खासकर, बीते एक दशक में बुनियादी ढांचे को लेकर जो काम किया गया, वह अभूतपूर्व रहा है. ‘स्वच्छता अभियान’ एक ऐसा अभियान है, जिसके बारे में कम से कम हमारे देश में कोई कल्पना नहीं कर सकता था. हालांकि अब भी भले ही पूरा देश साफ-स्वच्छ नजर न आता हो, मगर साफ-सफाई के प्रति देश की साइकी में बदलाव लाने का श्रेय तो इस अभियान या प्रकारांतर में मोदी को दिया जा सकता है. ग्रीन एनर्जी में उल्लेखनीय प्रगति भी उनकी सरकार की महती उपलब्धि है.

मोदी सरकार ने सामाजिक कल्याण के भी अनेक कार्य किए हैं, जैसे जन-धन योजना के तहत उन लोगों के भी खाते खोले गए, जो इससे पहले कभी बैंक के दरवाजे तक भी नहीं पहुंच पाए थे. जीरो बैलेंस के ऐसे करीब 31 करोड़ से ज्यादा खाते खोले गए. प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गरीब बेघरों के लिए घरों के निर्माण की योजना शुरू की गई. करीब एक करोड़ घरों के निर्माण का लक्ष्य रखा गया. उज्जवला योजना के तहत गरीबों की स्वच्छ ईंधन तक पहुंच सुनिश्चित की गई.

ब्लॉगर के बारे मेंरशीद किदवईरशीद किदवई

रशीद किदवई देश के जाने माने पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं. वह ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के विजिटिंग फेलो भी हैं. राजनीति से लेकर हिंदी सिनेमा पर उनकी खास पकड़ है. ‘सोनिया: ए बायोग्राफी’, ‘बैलट: टेन एपिसोड्स दैट हैव शेप्ड इंडियाज डेमोक्रेसी’, ‘नेता-अभिनेता: बॉलीवुड स्टार पावर इन इंडियन पॉलिटिक्स’, ‘द हाउस ऑफ़ सिंधियाज: ए सागा ऑफ पावर, पॉलिटिक्स एंड इंट्रीग’ और ‘भारत के प्रधानमंत्री’ उनकी चर्चित किताबें हैं. रशीद किदवई से – rasheedkidwai@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

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