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कार पूलिंग, बसों का इस्तेमाल और हाइब्रिड वर्क कल्चर भारत में हो जाए लागू, तो कितना होगा फायदा? बचेंगे डॉलर?

अगर आप दिल्ली-एनसीआर में रहते हैं तो कारपूलिंग के बारे में तो जानते होंगे. यानि एक ही कार को सामूहिक रूप से उपयोग करना. आमतौर पर यह शब्द भी सर्दियों की शुरुआत में ही सुनाई देता है क्योंकि जब प्रदूषण दिल्ली को घेर चुका होता है तो सरकार और विशेषज्ञों की ओर से लोगों को कारपूलिंग करने की सलाह दी जाती है. ताकि सड़क पर वाहनों से निकलने वाले धुएं का उत्सर्जन कम से कम हो, लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि कार पूल करने से कितना कार्बन उत्सर्जन कम होता है? और इससे कितने तेल की बचत हो सकती है?

इस बारे में काउंसिल ऑन एनर्जी एनवायरनमेंट एंड वॉटर की हालिया स्टडी में बड़ी जानकारी सामने आई है. सीईईडब्ल्यू की मानें तो जैसे-जैसे सरकारें इलेक्ट्रिक वाहनों की दिशा में बदलाव को तेज कर रही हैं, अगर जी20 (G20) देशों के यात्री कारपूलिंग और बसों का अधिकाधिक उपयोग करें और सप्ताह के कुछ दिन घर से काम करने के उपाय लागू करें, तो 2050 तक सालाना यात्री परिवहन से होने वाला 408-538 मिलियन टन तक कार्बन डाइ ऑक्साइड (MtCO₂) उत्सर्जन घट सकता है. यह 2024 में दक्षिण अफ्रीका के पूरे साल भर के कार्बन उत्सर्जन के लगभग बराबर है.

सीईईडब्ल्यू का यह अध्ययन, ‘अ ग्लोबल मिशन लाइफ: मिटिगेशन पोटैंशियल ऑफ विहेवियरल चेंजेज इन पैसेंजर ट्रांसपोर्ट इन जी20 कंट्रीज’, भारत के मिशन लाइफ पर आधारित है. इस फ्रेमवर्क को कॉप-26 में इस उद्देश्य से जारी किया गया था कि लगातार चलने वाली और कम कार्बन उत्सर्जन वाली आदतें रोजमर्रा के फैसलों के केंद्र में आ जाएं. अध्ययन इस बात का मॉडल तैयार करता है कि अगर ऐसे ही बदलाव जी20 देशों में अपनाए जाएं तो इसका क्या असर होगा. लेकिन खास बात है कि कारपूलिंग, हाइब्रिड वर्क (hybrid work) और बसों के उपयोग से मिलने वाले लाभ सभी जगहों एक समान नहीं होते हैं. विकसित देश और चीन में, जहां कारें बहुत ज्यादा और यात्रा की औसत दूरी सबसे अधिक है, इस संपूर्ण बचत का 80-88 प्रतिशत हिस्सा आएगा, जबकि अकेले अमेरिका और यूरोपीय यूनियन (ईयू-15) का हिस्सा 61-63 प्रतिशत होगा. प्रति व्यक्ति के स्तर पर यह अंतर और भी सख्त है. इन सभी बदलावों से एक औसत अमेरिकी की प्रति व्यक्ति उत्सर्जन बचत की संभावना एक भारतीय की तुलना में 56 गुना तक अधिक है.यानि भारत उत्सर्जन के मामले अभी भी काफी कम है.

कारपूलिंग, बसों का उपयोग और घर व ऑफिस से काम करने (हाइब्रिड वर्क) जैसे उपाय जी20 देशों के सालाना परिवहन उत्सर्जन को 20 प्रतिशत तक घटा सकते हैं;(फाइल फोटो)

डॉ. वैभव चतुर्वेदी, सीनियर फेलो, सीईईडब्ल्यू, ने कहा, “मिशन लाइफ के जरिए भारत की यह अपील थी कि जलवायु कार्रवाई (climate action) को उत्पादन से आगे ले जाकर जिम्मेदारीपूर्ण उपभोग से जोड़ा जाए. सीईईडब्ल्यू का यह अध्ययन उसी दृष्टि को एक वैश्विक साक्ष्य का आधार देता है. परिवहन व्यवहार में बदलाव का सबसे बड़ा फायदा उन अर्थव्यवस्थाओं को मिल सकता है, जहां पर उत्सर्जन सबसे ज्यादा है और जहां पर आवागमन सबसे ज्यादा कारों से ही हो रहा है. यह स्मार्ट शहरों, बेहतर कार्यस्थलों, स्वच्छ आवागमन पर अधिक ध्यान देने और तेल पर निर्भरता घटाने की अपील है, ताकि जीवन गुणवत्ता बेहतर हो सके.”

तेल में किसे होगी सबसे ज्यादा बचत यही बदलाव ऊर्जा सुरक्षा भी सुनिश्चित कर सकता है और इसका सबसे ज्यादा फायदा उन्हीं देशों को होगा जो तेल के सबसे बड़े उपयोगकर्ता हैं. इसकी वजह यह है कि कारों की अधिक संख्या और यात्रा की लंबी दूरियां उन्हें परिवहन के लिए तेल का सबसे बड़ा उपभोक्ता भी बनाती हैं. व्यवहार परिवर्तन से 2025 से 2050 के बीच परिवहन में लगभग 2,715 मिलियन टन तेल की खपत कम की जा सकती है, जो 2024 की वैश्विक तेल मांग के करीब 59 प्रतिशत के बराबर है, और अप्रैल 2026 की तेल कीमतों के आधार पर इसका कुल मूल्य लगभग 2.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर होता है.

ये हैं खास बातें

. कार पूल करके जी20 देश 2050 तक सालाना तेल खर्च में लगभग 90 बिलियन अमेरिकी डॉलर बचा सकते हैं.
. सिर्फ कारपूलिंग 2050 में जी20 देशों का यात्री परिवहन उत्सर्जन सालाना 20 प्रतिशत तक घटा सकती है.
.कार पूल, बसों के इस्तेमाल और हाइब्रिड वर्क कल्चर से इस बचत का 80-88 प्रतिशत हिस्सा विकसित देशों और चीन के खाते में आएगा.
. 2050 तक मिशन लाइफ जैसे व्यवहार परिवर्तन से संपूर्ण रूप से 2024 की वैश्विक तेल मांग के 59 प्रतिशत के बराबर बचत हो सकती है.

फिलहाल चल रहे संघर्षों को देखते हुए तेल कीमतों में बढ़ोतरी के प्रति जो देश सबसे अधिक संवेदनशील हैं, उनके लिए यह एक जरूरी क्लाइमेट एक्शन होने के साथ-साथ बचाव का एक उपाय भी है.

क्या भारत को कारपूलिंग से है बड़ा फायदा?

प्रदूषण बढ़ने पर एनसीआर में कार पूल करने की सलाह दी जाती है. (फोटो- सोशल मीडिया)

सीईईडब्ल्यू का अध्ययन कहता है कि कारपूलिंग अकेला ऐसा सबसे बड़ा उपाय है, जिससे प्रतिवर्ष 236 से 411 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड (MtCO₂) के उत्सर्जन को कम किया जा सकता है. हालांकि, इससे होने वाली 92 प्रतिशत तक की बचत विकसित देशों और चीन तक ही सीमित है, क्योंकि यहां कारें भी सबसे ज्यादा हैं और कारों पर निर्भरता भी सबसे ज्यादा है. यही वे देश हैं जहां प्रति कार में सबसे कम व्यक्ति सफर करते हैं. जबकि भारत में इसका फायदा सीमित है, क्योंकि यहां पहले ही कारों में एक साथ परिवार या ज्यादा लोग सफर करते हैं. इसके अलावा भारत में कारों पर निर्भरता भी कम है.

भारत को लेकर स्पष्ट है स्थिति

रोहिणी दीक्षित, प्रोग्राम एसोसिएट, सीईईडब्ल्यू कहती हैं कि हमारा अध्ययन दिखाता है कि उत्सर्जन बचत (emission savings) का भूगोल मायने रखता है. विकसित देशों और चीन में कुल बचत की संभावना सबसे अधिक है, क्योंकि उनकी आवागमन व्यवस्था कारों पर अधिक निर्भर है, जबकि भारत की प्रति व्यक्ति उत्सर्जन बचत संभावना बहुत कम है. भारत और अन्य विकासशील देशों के लिए यह अवसर है कि वे भविष्य को निजी वाहनों पर निर्भर बनाने से बचें. संपन्न और कारों पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के लिए व्यवहार परिवर्तन निकट अवधि में निश्चित तौर पर जलवायु शमन (climate mitigation) का उपाय बन जाना चाहिए.”

भारत के लिए ये चीज है फायदेमंद भले ही भारत में कारों से उत्सर्जन कम हो और इसका फायदा बहुत ज्यादा न हो, लेकिन सबसे फायदेमंद चीज ये है कि जब भी भारत में जलवायु परिवर्तन के उपाय लागू किए जाएं तो इन देशों के व्यवहारों का भी आकलन हो. इसके अलावा सबसे बड़ा फायदा है कि भारत अपनी अर्थव्यवस्था को निजी वाहनों पर निर्भर न बनाएं. इससे कार्बन उत्सर्जन की संभावना तो घटेगी ही डॉलर और तेल पर निर्भरता भी कम होगी.

विकसित और विकासशील देश करें ये काम

विकसित देशों और चीन में, जहां उत्सर्जन बचत के लिए सबसे अधिक संभावना है, कारपूलिंग प्लेटफॉर्म, हाइब्रिड वर्क के मानक, और भीड़भाड़ व पार्किंग पर शुल्क के जरिए सबसे तेजी से कदम उठाए जाने चाहिए.
विकासशील देशों को निजी वाहनों के उपयोग को सीमित करने वाले कदमों से पहले बसों के बेड़ों के विस्तार और उनके इलेक्ट्रिफिकेशन के साथ-साथ साझा परिवहन (shared mobility) के प्रोत्साहन को तैयार करने को प्राथमिकता देनी चाहिए.

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