रियासतकालीन विरासत से औद्योगिक पहचान तक; 87 साल पुरानी पाली की ‘उम्मेद मिल’ की ऐतिहासिक कहानी

पाली. यह कहानी शुरू होती है वर्ष 1939 में. मारवाड़ के तत्कालीन महाराजा उम्मेद सिंह और उद्योगपति रामकुंवर-मुगनीराम बांगड़ के प्रयासों से इस मिल की स्थापना हुई. उस दौर में जब राजस्थान में उद्योगों का नामो-निशान नहीं था, तब पाली में इस सूती वस्त्र मिल का बनना किसी चमत्कार से कम नहीं था.
यह राजस्थान की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी कम्पोजिट सूती कपड़ा मिलों में से एक है. यहां का तैयार धागा और लिली व रूपमती जैसे सूती कपड़े न केवल भारत, बल्कि विदेशों तक निर्यात होते रहे हैं. आज यह मिल पाली के गौरवशाली इतिहास का एक ऐसा पन्ना है, जिसकी चिमनी से निकलता धुआं पाली के औद्योगिक विकास की गाथा सुनाता है.
उम्मेद मिल की प्रमुख खासियतें
87 साल पुरानी ऐतिहासिक विरासत: यह राजस्थान की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी कम्पोजिट सूती कपड़ा मिलों में से एक मानी जाती है, जहां कच्चे कपास से लेकर धागा और तैयार कपड़ा एक ही परिसर में बनता आया है.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धाक: मिल में तैयार होने वाला सूती धागा और यहां के प्रसिद्ध ब्रांड लिली और रूपमती जैसे सूती कपड़े न केवल भारत के कोने-कोने में पसंद किए गए, बल्कि विदेशों तक इनका भारी मात्रा में निर्यात हुआ.
पाली के टेक्सटाइल हब बनने का आधार: उम्मेद मिल की सफलता के बाद ही पाली में रंगाई-छपाई और टेक्सटाइल प्रोसेसिंग की सैकड़ों छोटी-बड़ी इकाइयां स्थापित हुईं, जिससे पाली कपड़ा उद्योग का गढ़ बना.
आधुनिकता और पर्यावरण के साथ नया सफरदशकों तक मारवाड़ की आर्थिक धड़कन रही यह मिल समय-समय पर कई आर्थिक उतार-चढ़ावों और औद्योगिक चुनौतियों की गवाह भी बनी. बदलते तकनीकी दौर और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच मिल ने खुद को नए सिरे से ढाला है. वर्तमान में एलएन बांगड़ ग्रुप के प्रबंधन में मिल में आधुनिक स्पिनिंग और वीविंग तकनीकों का समावेश किया गया है. इसके साथ ही पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए आधुनिक ‘जीरो लिक्विड डिस्चार्ज’ प्लांट जैसी व्यवस्थाएं भी लागू की गई हैं.
चिमनी से निकलता धुआं देता है संदेश
आज भी महाराजा श्री उम्मेद मिल पाली के गौरवशाली और समृद्ध इतिहास का वह सुनहरा पन्ना है, जिसकी चिमनी से निकलता धुआं यह संदेश देता है कि मारवाड़ का यह औद्योगिक स्तंभ कल भी प्रासंगिक था और आज भी पाली की पहचान का मुख्य आधार है.
फैक्ट फाइल: महाराजा उम्मेद मिल्स
1942 में पाली में महाराजा उम्मेद मिल्स लिमिटेड की स्थापना की गई थी.
वर्तमान में मिल में 2100-2200 श्रमिक तीन शिफ्ट में काम करते हैं.
पहले 3500 से ज्यादा कार्मिक मिल में काम करते थे.
बढ़ती महंगाई के बीच मिल में सैलरी नहीं बढ़ने से धीरे-धीरे श्रमिकों की संख्या कम हो गई.
मिल में आधुनिक मशीनों की संख्या बढ़ने से भी श्रमिकों की संख्या कम हुई.
जब जोधपुर को पीछे छोड़ पाली बना टेक्सटाइल का गढ़
बात वर्ष 1939-1942 के दौर की है, जब मारवाड़ के तत्कालीन महाराजा उम्मेद सिंह ने राजस्थान की सबसे बड़ी सूती वस्त्र मिल, महाराजा श्री उम्मेद मिल्स (बांगड़ मिल) की स्थापना के लिए पाली का चयन किया. उस समय जोधपुर में औद्योगिक मूलभूत सुविधाओं का अभाव था और पानी की आपूर्ति के लिए जवाई बांध की व्यवस्था पाली के पास थी. उम्मेद मिल की सफलता को देखकर स्थानीय लोगों में प्रेरणा जगी और पाली के घर-घर में कपड़ा रंगाई व छपाई का काम शुरू हो गया.
मुंबई और सूरत को दी टक्कर
शुरुआती दौर में मलमल और साफे: शुरुआत में पाली में केवल पारंपरिक राजस्थानी साफे (पगड़ियां) और मलमल का कपड़ा तैयार होता था, जो आज बदलते समय के साथ सलवार-सूट, कॉटन फैब्रिक और डिजाइनर गारमेंट्स तक पहुंच चुका है. स्वदेशी रंग तकनीक, 80 फीसदी कलर लोकल बनाए: जब पाली में पक्के रंगों का काम शुरू हुआ, तब मुंबई की बड़ी पावर प्रोसेस मिलों से कड़ी प्रतिस्पर्धा थी. मुंबई के कपड़ा उद्योग का केंद्रीय राजनीति में प्रभाव होने से पाली के व्यापार में कई बाधाएं आईं. लेकिन पाली के उद्यमियों ने रंगरेजों के साथ मिलकर 80 फीसदी रंग स्थानीय स्तर पर ही तैयार कर लिए. इससे लागत में भारी कमी आई और पाली बाजार में डट गया. सूरत को टक्कर देने की तैयारी: आज पाली के उद्यमी सूरत में बनने वाली वैरायटी और डिजाइनों को स्थानीय स्तर पर तैयार कर रहे हैं, जिससे जल्द ही पाली कपड़ा बाजार में सूरत को भी सीधी चुनौती देने की स्थिति में है.
पाली में टेक्सटाइल क्रांति का कालक्रम
1947 में प्यारा चौक से टेबल प्रिंटिंग: देश की आजादी के समय प्यारा चौक में छीपा अल्लाबख्श थुली वाला ने 5 मीटर की टेबलों पर घाघरापाट की छपाई शुरू की. इसके बाद 15 और 42 मीटर की विशाल टेबलें लगाई गईं. उस समय ढोल में कांजी और कच्चे रंगों से रंगाई होती थी. स्वर्गीय समीरमल लोढ़ा ने अहमदाबाद और मुंबई की तकनीक को देखकर पाली में पहली ‘जीगर’ (Jigger Machine) स्थापित की. उनके साथ मदनलाल धोका, बाबूलाल कोठारी, मदनभाई रंगरेज, नियामत भाई, रुपचंद बलाई, भंवरलाल संचेती और अमरचंद गादिया जैसे उद्यमियों ने अपनी फैक्ट्रियां लगाईं. पाली के उद्यमियों की रग-रग में बसा टेक्सटाइल व्यापार आज भी पूरे देश में अपनी साख बनाए हुए है.



