Health Tips : न सुन पाएगा, न बोल सकेगा…प्री-मैच्योर बच्चों की जन्म के बाद स्क्रीनिंग जरूरी, क्या होता है ये?

Last Updated:September 30, 2026, 17:36 IST
Screening Benefits for Premature Babies : पश्चिमी देशों में बच्चे के जन्म के तुरंत बाद कई तरह की स्क्रीनिंग की जाती है. इससे कुछ ही मिनट में यह पता लगा जाता है कि बच्चे के शरीर में कोई जन्मजात समस्या तो नहीं है. भारत में भी बच्चा समय से पहले पैदा हुआ है या जन्म के बाद उसे एनआईसीयू में रखना पड़ा है, तो ऐसा करना जरूरी है. गोरखपुर के ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. राजेश यादव बताते हैं कि भारत में भी इस तरह की स्क्रीनिंग को सभी अस्पतालों में गंभीरता से लागू करने की जरूरत है. ऐसे बच्चों के सुनने की क्षमता की जांच समय पर होनी चाहिए. अगर बच्चा सुन नहीं पा रहा है तो इसका असर उसकी बोलने और सीखने की क्षमता पर भी पड़ेगा.
कानपुर. बच्चा समय से पहले पैदा हुआ है या जन्म के बाद उसे एनआईसीयू में रखना पड़ा है, तो उसके स्वास्थ्य पर शुरुआत से ही नजर रखना जरूरी है. ऐसे बच्चों की जन्म के तुरंत बाद होने वाली स्क्रीनिंग कई ऐसी बीमारियों और समस्याओं का पता लगा सकती है, जो आगे चलकर उसके विकास में बड़ी परेशानी बन सकती हैं. कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के ईएनटी विभाग की ओर से आयोजित कार्यक्रम में गोरखपुर के ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. राजेश यादव ने बताया कि पश्चिमी देशों में बच्चे के जन्म के तुरंत बाद कई तरह की स्क्रीनिंग की जाती है. मशीनों की मदद से कुछ ही मिनट में यह पता लगाने की कोशिश की जाती है कि बच्चे के शरीर में कोई जन्मजात समस्या तो नहीं है. अगर जांच में कोई परेशानी सामने आती है तो उसका इलाज भी शुरुआती दौर में शुरू कर दिया जाता है. भारत में भी इस तरह की स्क्रीनिंग को सभी अस्पतालों में गंभीरता से लागू करने की जरूरत है.
इनको इतनी ज्यादा दिक्कत क्यों
डॉ. राजेश के मुताबिक जो बच्चे समय से पहले पैदा होते हैं या लंबे समय तक एनआईसीयू में रहते हैं, उनमें कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का खतरा सामान्य बच्चों की तुलना में अधिक हो सकता है. ऐसे बच्चों की नियमित जांच और फॉलोअप बेहद जरूरी है. खासकर सुनने की क्षमता की जांच समय पर होनी चाहिए, क्योंकि बच्चा सुन नहीं पा रहा है तो इसका असर उसकी बोलने और सीखने की क्षमता पर भी पड़ सकता है. अगर जन्म के बाद से ही बच्चे को सुनने में दिक्कत है तो माता-पिता को इंतजार नहीं करना चाहिए. बच्चे को जल्द से जल्द ईएनटी विशेषज्ञ को दिखाना चाहिए. जांच में अगर यह पता चलता है कि बच्चा सुन नहीं सकता और सामान्य इलाज से फायदा नहीं हो रहा है, तो कॉक्लियर इंप्लांट एक विकल्प हो सकता है.
न करें इंतजार
कॉक्लियर इंप्लांट ऐसी तकनीक है, जिसकी मदद से गंभीर सुनने की समस्या वाले बच्चों को आवाज सुनने में मदद मिल सकती है. एक साल की उम्र के आसपास कॉक्लियर इंप्लांट कराने पर बच्चे को आवाजों की पहचान और बोलने की प्रक्रिया सीखने के लिए ज्यादा समय मिल जाता है. डॉ. राजेश यादव बताते हैं कि अगर दो से तीन साल तक बच्चे को सुनने की समस्या का इलाज नहीं मिलता है तो आगे चलकर उसकी बोलने और भाषा सीखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है. इसलिए माता-पिता को बच्चे के बोलने की उम्र का इंतजार करने के बजाय उसकी सुनने की क्षमता की समय पर जांच करानी चाहिए.
छह लाख तक की मदद
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से जरूरतमंद बच्चों के कॉक्लियर इंप्लांट के लिए छह लाख रुपये तक की आर्थिक मदद भी दी जा रही है. इसमें सर्जरी के साथ स्पीच थेरेपी समेत इलाज से जुड़ी कई जरूरतों में सहायता मिल सकती है. डॉक्टर कहते हैं कि तकनीक और सरकारी मदद उपलब्ध होने के बावजूद सबसे जरूरी बात यही है कि बच्चे की समस्या की पहचान समय पर हो. जन्म के बाद शुरुआती जांच और नियमित फॉलोअप से बच्चे को सही समय पर इलाज मिल सकता है और उसकी आगे की जिंदगी काफी बेहतर हो सकती है.
About the AuthorPriyanshu Gupta
प्रियांशु को एक दशक से ज्यादा हो गए पत्रकारिता में. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी कर अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. यहां लंबे समय तक हरिया…
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Kanpur Nagar,Uttar Pradesh
First Published :
September 30, 2026, 17:36 IST



