15 की उम्र में शुरू किया सफर, गायकी से विदेशों में भी बनाई पहचान, जानें कौन थे ‘ध्रुपद सम्राट’ राम चतुर मलिक

Last Updated:October 05, 2026, 04:01 IST
भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में पंडित राम चतुर मलिक का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है. महज 15 साल की उम्र में पहली बार मंच पर अपनी गायकी पेश करने वाले राम चतुर मलिक ने आगे चलकर ध्रुपद-धमार गायन में ऐसी पहचान बनाई कि उनकी आवाज दरभंगा के राजदरबार से निकलकर इंग्लैंड और फ्रांस तक पहुंची. उनकी प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें आकाशवाणी का सर्वोच्च ‘टॉप ग्रेड’ बिना किसी ऑडिशन के ही दे दिया गया था.
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भारत में ही नहीं, विदेशों में भी पहचान मिली. (फोटो साभार: IANS)
नई दिल्ली. 5 अक्टूबर 1902 को जन्मे राम चतुर मलिक का पूरा जीवन भारतीय शास्त्रीय संगीत की उस परंपरा को आगे बढ़ाने में बीता, जिसमें राग, लय और बंदिश का खास महत्व होता है. संगीत उनके परिवार में पहले से ही रचा-बसा था. उनके पिता पंडित राजित राम मलिक दरभंगा महाराज के दरबार के मशहूर संगीतज्ञ थे. वह ध्रुपद गायक होने के साथ संस्कृत के विद्वान और कवि भी थे.
राम चतुर मलिक को संगीत की शुरुआती शिक्षा अपने घर के माहौल में ही मिली. बचपन से ही उनकी प्रतिभा दिखाई देने लगी थी. यही वजह थी कि सिर्फ 15 साल की उम्र में उन्होंने पहली सार्वजनिक संगीत प्रस्तुति दी. इसके बाद उनकी गायकी लगातार निखरती चली गई.
ध्रुपद-धमार गायन में बनाई खास पहचान
साल 1924 में उनके करियर में एक बड़ा बदलाव आया. दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह ने उन्हें अपने दरबार का राजगायक नियुक्त कर दिया. उस समय दरभंगा दरबार शास्त्रीय संगीत के बड़े केंद्रों में गिना जाता था. यहां उन्हें अपनी कला को और बेहतर बनाने का शानदार मौका मिला.राम चतुर मलिक की सबसे बड़ी पहचान ध्रुपद और धमार गायन को लेकर थी. ध्रुपद की चार प्रमुख वाणियों- गौहर, डागर, खंडार और नौहर पर उनकी मजबूत पकड़ थी. उनका गायकी का अंदाज अपने दौर के दूसरे ध्रुपद गायकों से काफी अलग माना जाता था. खास बात यह थी कि वह सिर्फ ध्रुपद और धमार तक ही सीमित नहीं थे. उन्हें ख्याल, ठुमरी और मैथिली लोकगीतों की भी अच्छी समझ थी. यही वजह थी कि उनकी गायकी का दायरा काफी बड़ा था.
इंग्लैंड और फ्रांस तक पहुंची आवाज
राम चतुर मलिक की प्रतिभा को सिर्फ भारत में ही पहचान नहीं मिली, बल्कि विदेशों में भी उनके संगीत की खूब सराहना हुई. साल 1937 में वह दरभंगा महाराज के छोटे भाई विश्वेश्वर सिंह के साथ इंग्लैंड और फ्रांस गए थे. वहां उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति दी. उस समय किसी भारतीय शास्त्रीय गायक का विदेश जाकर अपनी कला का प्रदर्शन करना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी. राम चतुर मलिक ने अपनी गायकी के जरिए विदेशी श्रोताओं को भी भारतीय शास्त्रीय संगीत से परिचित कराया.
बिना ऑडिशन मिला आकाशवाणी का टॉप ग्रेड
राम चतुर मलिक के करियर से जुड़ा एक किस्सा आकाशवाणी से भी जुड़ा है. उन्हें आकाशवाणी का सर्वोच्च ‘टॉप ग्रेड’ बिना ऑडिशन के ही दे दिया गया था. यह उनकी संगीत की दुनिया में बनी मजबूत पहचान को दिखाता है. साल 1976 में फ्रांस सरकार ने उनकी ध्रुपद-धमार की रिकॉर्डिंग को यूनेस्को के प्रसारण के लिए भी चुना था. इससे उनकी कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक और बड़ी पहचान मिली. भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें कई बड़े सम्मान भी मिले. साल 1964 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके बाद 1974 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से नवाजा. राम चतुर मलिक को ‘ध्रुपद सम्राट’ के नाम से भी जाना जाता था. साल 1990 में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी संगीत रिकॉर्डिंग आज भी ध्रुपद-धमार के चाहने वालों के बीच सुनी जाती हैं. उनकी गायकी भारतीय शास्त्रीय संगीत की उस समृद्ध परंपरा की याद दिलाती है, जिसे उन्होंने अपने जीवनभर आगे बढ़ाया.
About the AuthorMunish KumarSenior sub editor
न्यूज 18 हिंदी में एंटरटेनमेंट सेक्शन में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे मुनीष कुमार दिल्ली के रहने वाले हैं. डिजिटल मीडिया में उन्हें 10 साल का अनुभव है.राजधानी कॉलेज (DU) से पॉलिटिकल साइंस (ऑनर्स) की पढ…
New Delhi,New Delhi,Delhi
First Published :
October 05, 2026, 04:01 IST



