गहलोत-पायलट की हंसी क्या मिटाएगी कांग्रेस की गुटबाजी? पंचायत चुनाव से पहले सियासी मिलन या दिखावा

जयपुर. राजनीति को लेकर मशहूर कहावत है कि सियासत में जो होता है वह दिखता नहीं और जो दिखता है वह होता नहीं. है राजस्थान कांग्रेस की मौजूदा सियासत में यह कहावत चरितार्थ नजर आ रही है. अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच लंबे समय तक चली सियासी खींचतान जग जाहिर है. अब गहलोत और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के बीच मतभेद भी पार्टी के लिए नई चुनौती साबित हो रहा है. राजस्थान में हाल ही में हुए नगरीय निकाय चुनाव में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन ने कई सवाल खड़ा किए. राजस्थान कांग्रेस में गुटबाजी और चुनावी रणनीति को लेकर पार्टी के भीतर सवाल उठे. अब पंचायत चुनाव सामने हैं और कांग्रेस आलाकमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ सही उम्मीदवार उतारने की नहीं, बल्कि पार्टी के अलग-अलग खेमों को एक मंच पर लाने की है.
इसी कोशिश के तहत जयपुर में कांग्रेस के करीब 20 वरिष्ठ नेताओं की अहम बैठक भी हुई. बैठक का घोषित एजेंडा पंचायत चुनाव की रणनीति था, लेकिन इससे निकला राजनीतिक संदेश बैठक से कहीं बड़ा था. अशोक गहलोत, सचिन पायलट, गोविंद सिंह डोटासरा, सुखजिंदर सिंह रंधावा और टीकाराम जूली जैसे नेताओं का एक साथ दिखाई देना पार्टी की एकजुटता दिखाने की कोशिश के तौर पर देखा गया. गहलोत और पायलट के बीच बैठक के दौरान हल्का-फुल्का मजाक भी कैमरों में कैद हुआ. गहलोत ने पायलट को ‘पंजाब प्रभारी’ को लेकर चुटकी ली तो पायलट ने भी मुस्कराते हुए जवाब दिया. बैठक खत्म होने के बाद गहलोत ने मीडिया के सामने सवाल उठाया कि जब सभी नेता साथ हैं तो गुटबाजी कहां है. लेकिन सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ कैमरों के सामने दिखने वाली एकजुटता है या कांग्रेस सच में अपनी पुरानी गुटबाजी से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है?
जयपुर में कांग्रेस के बैठक में अशोक गहलोत, सचिन पायलट, गोविंद सिंह डोटासरा, सुखजिंदर सिंह रंधावा और टीकाराम जूली एक साथ नजर आए
गहलोत-पायलट की मुलाकात में क्या था खास?
निकाय चुनाव के बाद क्यों बढ़ी तल्खी?
नगर निकाय निकाय चुनाव में कांग्रेस को मिली हार के बाद पार्टी के भीतर रणनीति को लेकर सवाल उठे. अशोक गहलोत ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा की चुनावी रणनीति पर भी सवाल उठाया था. उन्होंने कहा था कि अगर बेहतर रणनीति बनाई जाती और कांग्रेस के नेताओं को साथ लेकर रोड शो किए जाते तो नतीजे अलग हो सकते थे. गहलोत के इस बयान के बाद सचिन पायलट डोटासरा के बचाव में उतरे. पायलट ने कहा कि डोटासरा ने चुनाव को लेकर बेहतर रणनीति बनाई और सभी नेताओं को साथ लेकर चले. इस बयानबाजी ने राजस्थान कांग्रेस के भीतर चल रही खेमेबंदी को हवा देने का काम किया.
अशोक गहलोत और सचिन पायलट का साथ दिखाई देना राजीनितक हलकों में चर्चा का विषय बना
गहलोत और डोटासरा के बीच विवाद की वजह क्या है?
गहलोत और डोटासरा के बीच मतभेद का एक बड़ा कारण जयपुर में हुआ वह कार्यक्रम भी माना जाता है, जिसमें कांग्रेस नेता महेंद्र मालवीय की अगुवाई में कुछ नेताओं ने कांग्रेस की सदस्यता ली थी. इस दौरान गहलोत के चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के नारे लगे थे. इसके बाद डोटासरा ने गहलोत पर व्यक्तिगत ब्रांडिंग करने का आरोप लगाया था. डोटासरा ने कहा था कि गहलोत तीन बार सत्ता में रहे, लेकिन पार्टी हर बार चुनाव हार गई. इसके बाद दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक दूरी की चर्चा तेज हुई. कुछ दिन पहले गहलोत के करीबी माने जाने वाले पूर्व मंत्री विश्वेंद्र सिंह ने भी डोटासरा पर हमला बोला और निकाय चुनाव में कांग्रेस की हार के लिए उन्हें जिम्मेदार बताया. कांग्रेस ने इसके बाद विश्वेंद्र सिंह को अनुशासनहीनता का नोटिस दिया.
क्या गहलोत के खिलाफ बन रहा नया समीकरण?
जयपुर की बैठक से पहले और बैठक के दौरान सामने आई कुछ तस्वीरों ने राजस्थान कांग्रेस के नए राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चा तेज कर दी है. सबसे खास बात रही कि सचिन पायलट और सुखजिंदर सिंह रंधावा एक साथ जयपुर पहुंचे. एयरपोर्ट पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने दोनों नेताओं का स्वागत किया. इसके बाद चारों नेता एक साथ बैठक में पहुंचे. राजस्थान के सियासी गलियारों में इसे गहलोत के मुकाबले बनते एक नए समीकरण के तौर पर भी देखा जा रहा है. हालांकि, इसे किसी औपचारिक गठजोड़ के तौर पर देखना जल्दबाजी होगी, लेकिन इतना जरूर है कि कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में समीकरण पहले जैसे स्थिर नहीं हैं. गहलोत का पायलट को ‘पंजाब प्रभारी’ कहना भी इसी बदलती तस्वीर पर चुटकी के तौर पर देखा जा रहा है.
गहलोत की ‘डिनर डिप्लोमेसी’ का क्या मतलब?
राजस्थान में होने वाले पंचायत चुनाव की बैठक से ठीक एक दिन पहले अशोक गहलोत ने जयपुर के कांस्टीट्यूशन क्लब में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के लिए डिनर का आयोजन किया. इस डिनर को कांग्रेस की अंदरूनी खेमेबंदी को कम करने की कोशिश के तौर पर देखा गया. डिनर के बाद अगले दिन करीब 20 वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं की बैठक हुई. यानी पहले अनौपचारिक माहौल में नेताओं को साथ लाने की कोशिश और उसके बाद चुनावी रणनीति पर औपचारिक चर्चा. गहलोत की राजनीति को समझने वाले इसे उनकी पुरानी शैली से जोड़कर भी देखते हैं. वे कई बार अपने राजनीतिक विरोधियों पर तीखा हमला करते हैं, लेकिन मौका आने पर उन्हीं नेताओं के साथ सार्वजनिक मंच साझा कर पार्टी की एकजुटता का संदेश भी देते हैं.
क्या पायलट-गहलोत की ‘जय-वीरू’ वाली तस्वीर लौट रही है?
राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट की राजनीति में एक दिलचस्प विरोधाभास रहा है. एक दौर ऐसा भी आया कि दोनों के बीच बेहद तीखे बयान सामने आए, लेकिन इसके बाद कई मौकों पर दोनों को साथ खड़े होकर एकजुटता का संदेश देते भी देखा गया. गहलोत ने पहले भी पायलट का हाथ पकड़कर कैमरों के सामने कहा था कि लोग कांग्रेस में गुटबाजी की बात करते हैं, लेकिन दोनों साथ हैं तो गुटबाजी कहां है. यही वजह है कि इस बार भी दोनों के बीच हंसी-मजाक और साथ की तस्वीरों को सिर्फ सामान्य राजनीतिक शिष्टाचार मानने के बजाय बड़े संदेश के तौर पर देखा जा रहा है.
पंचायत चुनाव क्यों बना अग्निपरीक्षा?
राजस्थान कांग्रेस के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती और टेस्ट पंचायत चुनाव है. राजस्थान नगर निकाय चुनाव में बीजेपी की शानदार प्रदर्शन ने कांग्रेस को दवाब में ला खड़ा किया है. साथ ही आलाकमान का प्रेशर अलग से है. नगर निकाय चुनाव में शानदार प्रदर्शन के बाद बीजेपी का मनोबल हाई है और पंचायत चुनाव में भी अपनी बढ़त की लय कायम रखना चाहती है. वहीं कांग्रेस की बात की जाए तो वह संगठन की जमीन मजबूत करने के मौके के तौर पर देख रही है. कांग्रेस के लिए यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले पंचायत चुनाव जमीनी संगठन और नेताओं की पकड़ का बड़ा संकेत देंगे. कांग्रेस आलाकमान के लिए भी राजस्थान अहम है. ऐसे में पार्टी नहीं चाहेगी कि नेताओं की आपसी खींचतान का असर पंचायत चुनाव के नतीजों पर पड़े.
जयपुर में कांग्रेस के करीब 20 वरिष्ठ नेताओं की बैठक में हिस्सा लिया
असली परीक्षा तस्वीरों के बाद होगी
पिछले दिनों जयपुर में हुई बैठक के दौरान कांग्रेस नेताओं का साथ बैठना, गहलोत-पायलट का हंसी-मजाक और डिनर डिप्लोमेसी निश्चित तौर पर एकजुटता का संदेश देती है. लेकिन राजस्थान कांग्रेस का इतिहास बताता है कि सार्वजनिक मंच पर साथ दिखाई देना और संगठन के भीतर मतभेद खत्म होना दो अलग बातें हैं. कांग्रेस के सामने अब असली परीक्षा परीक्षा टिकट वितरण, सही उम्मीदवार चयन, चुनाव प्रचार और बूथ स्तर पर नेताओं के साथ काम करने की होगी. अगर गहलोत, पायलट और डोटासरा खेमे के नेता पंचायत चुनाव में वास्तव में एक-दूसरे के साथ खड़े नजर आते हैं, तभी माना जाएगा कि कांग्रेस की एकजुटता की यह कवायद महज तस्वीरों तक सीमित नहीं है. फिलहाल अशोक गहलोत की ‘परमानेंट प्रभारी’ वाली चुटकी और ‘गुटबाजी कहां है’ वाला बयान कांग्रेस के भीतर एक राजनीतिक संदेश जरूर छोड़ गया है कि पंचायत चुनाव से पहले पार्टी को कम से कम बाहर से एकजुट दिखना ही होगा.



