Rajasthan

16 दिन की सांझी, भक्ति और विरासत की अनोखी कहानी, मदन मोहन जी की सेवा से जुड़ी परंपरा जानकर रह जाएंगे हैरान

Last Updated:October 12, 2026, 13:23 IST

Karauli Hindi News: इस बार लोकल 18 ने खासतौर से सांझी के पुश्तैनी कलाकारों से बात की है. जो पितृपक्ष के 16 दिन करौली के प्रसिद्ध मदन मोहन जी मंदिर में कृष्ण भक्ति में लीन रहकर सांझी का चित्रण करते हैं. क्या आपको मालूम है कि इस सांझी को बनाने में कितनी मेहनत लगती है. करौली में सांझी के पुश्तैनी कलाकार इस परंपरा के भविष्य को लेकर क्या कहते हैं.

ख़बरें फटाफट

Amazon Prime DayTop Deals Inside

करौली. राजस्थान के करौली में पितृपक्ष के दौरान निभाई जाने वाली सांझी परंपरा यहां की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर है. एक प्रकार से सांझी चित्रकला है जिसमें ब्रजमंडल को चित्रों के रूप में उकेरा जाता है. धर्मनगरी करौली में सांझी का चित्रण सैकड़ो साल से किया जा रहा है. इतिहासकार इस परंपरा को लगभग 250 साल से पुरानी परंपरा बताते हैं. सांझी करौली में पितृपक्ष के 16 दिन जन-जन के आराध्य देव श्री राधा मदन मोहन जी मंदिर के प्रांगण में बनाई जाती है. सांझी के लिए करौली के मदन मोहन जी मंदिर में एक खास प्राचीन चबूतरा भी है जिस पर वर्षो से सांझी को कुछ पुश्तैनी और चुनिंदा कारीगर उकेर रहे हैं.

करौली के इतिहासकार वेणुगोपाल शर्मा के मुताबिक सांझी करौली की सबसे अनूठी परंपराओं में से एक है. जिसकी शुरुआत यहां मदन मोहन जी के आगमन से हुई थी. वह बताते हैं कि सांझी एक तरह से पूरे ब्रजमंडल का दर्शन है इसमें 16 दिन भगवान कृष्ण की लीलाओं को रंगों से आकर दिया जाता है.

सांझी के पुश्तैनी कलाकारों से बात कीइस बार लोकल 18 ने खासतौर से सांझी के पुश्तैनी कलाकारों से बात की है. जो पितृपक्ष के 16 दिन करौली के प्रसिद्ध मदन मोहन जी मंदिर में कृष्ण भक्ति में लीन रहकर सांझी का चित्रण करते हैं. आपने करौली की सांझी के दर्शन तो खूब किये है. लेकिन क्या आपको मालूम है कि इस सांझी को बनाने में कितनी मेहनत लगती है. करौली में सांझी के कुछ चुनिंदा 5 से 6 पुश्तैनी कलाकार इस परंपरा की भविष्य को लेकर क्या कहते हैं.

कला को सीखने के प्रति युवाओं में रुझान बहुत कमसभी कलाकारों की मानें तो यह सभी कलाकार अपने परिवार के लगभग आखिरी सांझी बनाने वाले कलाकार है. जो आज भी निष्ठा से इस परंपरा को निभा रहे हैं. लेकिन उनके मन में पीड़ा है कि आगे सांझी को कौन इस तरह बना पाएगा क्योंकि वर्तमान में इस कला को सीखने के प्रति युवाओं में रुझान बहुत कम है.

मदन मोहन जी की सेवा के तौर पर निष्ठा से 16 दिन बनाते कुछ कलाकार कहते हैं कि एक तरह से करौली में सांझी परंपरा लुप्त होने की कगार पर पहुंच गई है. उनका मानना है की सांझी का वर्तमान अच्छा है लेकिन भविष्य अंधकार में है. क्योंकि अब कलाकारों के परिवार में भी सांझी को सीखने के लिए युवाओं में वह दिलचस्पी नहीं है जो होनी चाहिए. कलाकार बताते हैं कि पहले घर-घर में सांची बनाई जाती थी लेकिन अब मदन मोहन जी मंदिर में ही सांझी सिमटकर रह गई है. खास बात यह है कि करौली में मदन मोहन जी मंदिर में बनने वाली सांझी आज भी किसी नायाव चित्रकारी से कम नहीं है. सांझी के पुश्तैनी कलाकार आज भी इसे मदन मोहन जी की सेवा के तौर पर निष्ठा से 16 दिन बनाते हैं.

परंपरा आगे और भी अच्छी तरह से निभाई इस सांझी को बनाने में सबसे बड़ी भूमिका चतेरा परिवार है. स्थानीय चतेरा परिवार के लोग सांझी को मदन मोहन जी की सेवा के रूप में बनाते हैं. चातिरा परिवार के चौथी पीढ़ी के सांझी बनाने वाले दिनेश शर्मा बताती है कि उन्हें यह सेवा का कार्य अपने पूर्वजों से विरासत में मिला है. वह चौथी पीढ़ी के कलाकार हैं जो आज सांझी को अपनी ब्रश से गढ़ रहे हैं. वह कहते हैं कि सांझी के भविष्य को लेकर हमारे मन में केवल एक पीड़ा है हम सांझी को मदन मोहन जी की सेवा के रूप में 16 दिन बनाते हैं. यह हमारे लिए हमारे पूर्वजों का एक कड़ा नियम है. जो हम निभाते रहेंगे. और अपनी अगली पीढ़ियों को भी इस नियम और सेवा को निभाने के लिए इस कला को सीखा चुके हैं. लेकिन दिनेश कहते हैं कि हमारे मन में थोड़ी सी बेचैनी इतनी है की सांझी और सांझी के कुछ चुनिंदा कलाकारों को सम्मान मिले तो यह परंपरा आगे और भी अच्छी तरह से निभाई जा सकती है. अगर हमारी कला को सम्मान मिलेगा तो हमारी आने वाली पीढ़ी भी इससे प्रेरणा लेगी.

सांझी लगभग 5 से 6 घंटे की मेहनत के बाद तैयारकरौली में सांझी बनाने वाले कलाकारों में चतेरा परिवार के दिनेश शर्मा जो सांझी का मॉडल तैयार करते हैं. इसके बाद 4 से 5 पुश्तैनी कलाकार भी हैं जो सांझी में रंग भरते हैं. इन कलाकारों में विजय भट्ट, शैलू भट्ट, मनोज शर्मा, सहित दो-तीन पुश्तैनी कलाकार है. इन सभी कलाकारों के मुताबिक करौली में बनने वाली सांझी लगभग 5 से 6 घंटे की मेहनत के बाद तैयार होती है.

सांझी का चित्रण बखूबी कर सकेंगीसांझी के पुश्तैनी कलाकार शैलू भट्ट ने कहा कि उनके पूर्वज इस कार्य को मदन मोहन जी की सेवा के रूप में करते हैं. फिलहाल इनका ही पुत्र को इस कला को सिखने में रुचि ले रहा है. भट्ट का कहना है कि अगर इस कला को बढ़ावा और सम्मान मिले तो हमारे आगे आने वाली पीढ़ियां भी इससे प्रेरणा लेंगे और वह भी सांझी का चित्रण बखूबी कर सकेंगी.

About the AuthorJagriti Dubey

मेरा नाम जागृति दुबे है. मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में पिछले 6 वर्षों से सक्रिय हूं. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को मैंने वर्ष 2019 में GBN 24 न्यूज़ चैनल से इंटर्नशिप के साथ शुरुआत देकर एक पेशेव…

और पढ़ेंLocation :

Karauli,Rajasthan

First Published :

October 12, 2026, 13:23 IST

Source link

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

Uh oh. Looks like you're using an ad blocker.

We charge advertisers instead of our audience. Please whitelist our site to show your support for Nirala Samaj