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Dholpur News: 48 साल पहले कैसी होती थी पढ़ाई? किताबें खरीदते थे बच्चे, ट्यूशन का भी नहीं था ज्यादा चलन

धौलपुर: आज शिक्षा का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है. मोबाइल फोन, इंटरनेट और ऑनलाइन क्लास के जरिए विद्यार्थी घर बैठे पढ़ाई कर सकते हैं. लेकिन करीब 48 साल पहले शिक्षा का ऐसा स्वरूप नहीं था. उस समय विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाना पड़ता था. सरकारी स्कूलों में भी किताबें खरीदनी पड़ती थीं और ट्यूशन का चलन भी बहुत कम था. धौलपुर के पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी अरविंद शर्मा ने अपने पुराने दिनों को याद करते हुए शिक्षा के उस दौर से लेकर आज की डिजिटल शिक्षा तक का सफर बताया.

अरविंद शर्मा बताते हैं कि उन्होंने वर्ष 1978 में 10वीं कक्षा उत्तीर्ण की थी. आज करीब 48 साल बाद जब वे अपने शिक्षा के सफर को याद करते हैं, तो उन्हें पुराने और आज के शिक्षा तंत्र में जमीन-आसमान का अंतर नजर आता है. आजादी से पहले धौलपुर रियासत में केवल 7 विद्यालय हुआ करते थे. उस समय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की जगह राजपूताना बोर्ड था. धौलपुर में माध्यमिक स्तर पर महाराणा सीनियर सेकेंडरी स्कूल प्रमुख विद्यालय था, जहां पूरी धौलपुर रियासत से विद्यार्थी पढ़ने आते थे. तत्कालीन महाराजा राणा राम सिंह ने विद्यार्थियों की सुविधा के लिए छात्रावास की स्थापना भी करवाई थी.

स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या काफी अधिक होतीअरविंद शर्मा बताते हैं कि उनके समय में स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या काफी अधिक होती थी. उनकी 10वीं कक्षा में ही 2 हजार से अधिक विद्यार्थी पढ़ते थे. विद्यार्थियों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि कक्षा में A से लेकर I तक सेक्शन बनाए जाते थे. उस समय स्कूल में दाखिला मिलना भी आसान नहीं था. विद्यार्थियों को प्रवेश के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती थी. उनके अनुसार, उस दौर में विद्यार्थी और शिक्षक पढ़ाई के प्रति समर्पित रहते थे और शिक्षा को गंभीरता से लेते थे.

9वीं कक्षा पास करने के बाद कॉमर्स विषय चुनाअरविंद शर्मा बताते हैं कि उनके समय में 9वीं कक्षा से ही विद्यार्थी अपनी रुचि के अनुसार संकाय का चयन करते थे. आज सामान्य तौर पर 10वीं के बाद विद्यार्थी आर्ट्स, कॉमर्स, मैथ्स और बायोलॉजी जैसे विषय चुनते हैं, लेकिन उस समय यह प्रक्रिया 9वीं कक्षा से ही शुरू हो जाती थी. महाराणा सीनियर सेकेंडरी स्कूल में अलग-अलग संकाय उपलब्ध थे. उन्होंने भी 9वीं कक्षा पास करने के बाद कॉमर्स विषय चुना था.

48 साल पहले पढ़ाई का खर्च आज की तुलना में कमअरविंद शर्मा बताते है करीब 48 साल पहले पढ़ाई का खर्च आज की तुलना में कम था, लेकिन सरकारी स्कूलों में भी विद्यार्थियों को किताबें खरीदनी पड़ती थीं. उस समय निशुल्क पुस्तकों की सुविधा उपलब्ध नहीं थी. विद्यार्थियों को बोर्ड परीक्षा की फीस भी जमा करनी पड़ती थी. आज सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों को निशुल्क किताबें उपलब्ध कराई जाती हैं. उन्होंने बताया कि उनके समय में ट्यूशन का प्रचलन भी बहुत कम था. विद्यार्थी स्कूल में पढ़ने के बाद घर पर ही दोबारा पढ़ाई करते थे और अपनी तैयारी पूरी करते थे.

बदलाव को वे समाज के लिए महत्वपूर्ण मानते अरविंद शर्मा बताते हैं कि उनके समय में बालिका शिक्षा के अवसर तो थे, लेकिन खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों को पढ़ाने के प्रति लोगों का रुझान काफी कम था. जब वे 10वीं कक्षा में पढ़ते थे, तब उनकी कक्षा में 2 हजार से अधिक विद्यार्थियों के बीच केवल 2 से 3 छात्राएं ही पढ़ती थीं. पूरे धौलपुर क्षेत्र में बालिका शिक्षा की स्थिति संतोषजनक नहीं थी. हालांकि, आज ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में लड़कियां शिक्षा हासिल कर रही हैं. बालिका शिक्षा में आए बदलाव को वे समाज के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं.

शिक्षा जगत में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को दर्शाता अरविंद शर्मा बताते हैं कि उनके समय में शिक्षा व्यवस्था में पुरुष शिक्षकों की संख्या अधिक होती थी. यहां तक कि राजकीय बालिका विद्यालयों में भी पुरुष शिक्षक बड़ी संख्या में पढ़ाते थे. महिला शिक्षकों की संख्या काफी कम थी. लेकिन आज शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है और कई सरकारी स्कूलों में महिला शिक्षक भी बड़ी संख्या में अपनी सेवाएं दे रही हैं. उनके अनुसार, यह बदलाव शिक्षा जगत में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को दर्शाता है.

पहले की तरह लंबी दूरी तय नहीं करनीअरविंद शर्मा बताते हैं कि करीब 48 साल पहले गांवों में विद्यालयों की संख्या सीमित थी. इस वजह से विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए दूसरे गांवों में जाना पड़ता था. कई बच्चे रोजाना करीब 5 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल पहुंचते थे और वापसी में भी इतनी ही दूरी तय करते थे. इस तरह उनका रोजाना लगभग 10 किलोमीटर का सफर होता था. कई बार करीब 200 विद्यार्थियों का समूह एक साथ दूसरे गांव में पढ़ने जाता था. आज स्थिति बदल चुकी है. कई ग्राम पंचायतों में सीनियर सेकेंडरी स्कूल खुल चुके हैं और तहसील स्तर पर राजकीय कॉलेज भी स्थापित हुए हैं. इससे विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए पहले की तरह लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ती.

कंप्यूटर के माध्यम से घर बैठे भी पढ़ाई कर सकते उनके समय में शिक्षा पूरी तरह ऑफलाइन होती थी. विद्यार्थियों के पास मोबाइल फोन और इंटरनेट जैसी सुविधाएं नहीं थीं. पढ़ाई के लिए स्कूल जाना, कक्षा में बैठना और शिक्षक से सीधे सीखना ही मुख्य माध्यम था. आज इंटरनेट के जरिए पढ़ाई की सामग्री आसानी से उपलब्ध हो जाती है. विद्यार्थी मोबाइल और कंप्यूटर के माध्यम से घर बैठे भी पढ़ाई कर सकते हैं. इससे उन्हें काफी सुविधा मिली है.

शिक्षा के फायदों के साथ उसके नुकसान की ओर भी ध्यानहालांकि, अरविंद शर्मा डिजिटल शिक्षा के फायदों के साथ उसके नुकसान की ओर भी ध्यान दिलाते हैं. उनका कहना है कि ऑनलाइन शिक्षा ने विद्यार्थियों के लिए ज्ञान हासिल करना आसान बनाया है, लेकिन छोटे बच्चों का मोबाइल फोन की ओर बढ़ता आकर्षण चिंता का विषय है. उनके अनुसार, मोबाइल का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल बच्चों की मानसिक स्थिति और पढ़ाई पर प्रतिकूल असर डाल सकता है.

स्कूल में पढ़ाई के साथ अनुशासन पर भी जोर दिया जाताअरविंद शर्मा बताते हैं कि उनके समय में स्कूल में पढ़ाई के साथ अनुशासन पर भी जोर दिया जाता था. विद्यार्थी सुबह स्कूल पहुंचकर प्रार्थना करते थे और फिर कक्षाओं में पढ़ाई शुरू होती थी. स्कूल का वातावरण, शिक्षकों से सीधा संवाद और कक्षा में बैठकर पढ़ने का अनुभव उनके लिए खास था. उस समय मोबाइल फोन नहीं होने से विद्यार्थी पढ़ाई पर अधिक ध्यान केंद्रित कर पाते थे. वे मानते हैं कि डिजिटल शिक्षा जरूरी है, लेकिन स्कूल में बैठकर शिक्षक से सीधे सीखने और अनुशासित वातावरण में पढ़ने का महत्व आज भी बना हुआ है.

जिला परिषद और प्रधान शिक्षकों की भूमिका भी रहतीअरविंद शर्मा बताते हैं कि उनके समय में शिक्षक बनने के लिए आज जैसी कई परीक्षाओं की प्रक्रिया नहीं थी, लेकिन धौलपुर में शिक्षक प्रशिक्षण की पर्याप्त सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं थीं. विद्यार्थियों को प्रशिक्षण के लिए भरतपुर या आगरा जाना पड़ता था. उस समय शिक्षक बनने के लिए लाइसेंस ऑफ टीचिंग का एक वर्षीय कोर्स करना होता था, जिसे आज की बीएड जैसी शिक्षक प्रशिक्षण व्यवस्था से जोड़कर देखा जा सकता है. उन्होंने बताया कि वर्ष 1964 में भी शिक्षक बनने के लिए इस तरह के प्रशिक्षण कोर्स की व्यवस्था थी. ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए जिला परिषद और प्रधान शिक्षकों की भूमिका भी रहती थी.

लाइसेंस ऑफ टीचिंग का एक वर्षीय कोर्स पूरा कियाअरविंद शर्मा बताते हैं कि उन्होंने अंग्रेजी विषय में बीए किया. इसके बाद लाइसेंस ऑफ टीचिंग का एक वर्षीय कोर्स पूरा किया और फिर शिक्षक बने. अपने सेवाकाल के दौरान उन्होंने शिक्षा विभाग में काम किया और जिला शिक्षा अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए. वे कहते हैं कि उनके समय की शिक्षा व्यवस्था में सुविधाएं सीमित थीं और विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता था. वहीं, आज तकनीक और संसाधनों ने शिक्षा को पहले से अधिक सुलभ बना दिया है. उनके अनुसार, शिक्षा के इस बदलाव में सुविधाओं के साथ-साथ पढ़ाई के तरीकों में भी बड़ा परिवर्तन आया है.

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