न मानदेय, न पारिश्रमिक, फिर भी 100 कलाकार मंच पर क्यों निभाते हैं राम-रावण के किरदार? रोचक है कहानी

बाड़मेर. रामलीला के मंच पर कोई राजा बनता है, कोई मंत्री तो कोई वनवासी. किरदार अलग-अलग हैं, लेकिन मकसद एक ही है “प्रभु श्रीराम की लीला का मंचन”. बाड़मेर की ऐतिहासिक रामलीला की खासियत यह है कि यहां करीब 80 से 100 कलाकार बिना किसी मानदेय या पारिश्रमिक के अपनी सेवाएं देते हैं. दिनभर कोई दुकान संभालता है, कोई स्कूल में पढ़ाता है तो कोई नौकरी करता है. शाम ढलते ही सभी अपनी जिम्मेदारियों से समय निकालकर रामलीला की तैयारियों में जुट जाते हैं. दिन में कोई सरकारी दफ्तर में नौकरी करता है कोई अपनी दुकान संभालता है.
कोई संविदाकर्मी के तौर पर जिम्मेदारी निभाता है, लेकिन शाम होते ही इनकी पहचान बदल जाती है. कोई राम बनता है तो कोई रावण तो कोई रामलीला का दूसरा किरदार. बाड़मेर में करीब 100 लोगों का यह ऐसा कुनबा है जो रामलीला के मंचन के लिए न कोई मानदेय लेता है और न ही पारिश्रमिक. कलाकारों के लिए मंच पर बिताया हर पल करोड़ों की कमाई से बढ़कर है, क्योंकि यहां मेहनत का मोल रुपयों में नहीं भक्ति से मिलने वाली आत्मिक संतुष्टि में चुकाया जाता है. कलाकारों के लिए रामलीला में भाग लेना ही सौभाग्य है. यही निःस्वार्थ भाव इस आयोजन को खास बनाता है. झामन शर्मा जैसे कलाकारों का मानना है कि प्रभु श्रीराम की गाथा का गुणगान करने के लिए पारिश्रमिक की जरूरत नहीं बल्कि मन में श्रद्धा और सेवा का भाव होना चाहिए.
1979 में हुई शुरुआत, 100 कलाकर देते हैं प्रस्तुतियां
बाड़मेर में रामलीला की शुरुआत 1979 में हुई थी. उस समय रामलीला कमेटी के पहले अध्यक्ष लेहर चंद जैन बने थे, जिनके मार्गदर्शन में रामलीला का आयोजन शुरू हुआ था. वर्तमान में अध्यक्ष की कमान प्रदीप कुमार जोशी के पास है जो कि प्रिंसिपल हैं. अध्यक्ष प्रदीप कुमार जोशी बताते है कि यहां करीब 100 कलाकर अपने किरदार को बखूबी दर्शकों के सामने रखते है. पात्रों के अनुरूप वेशभूषा पहनना, मेकअप करवाना, संवाद दोहराना और मंच पर अपनी भूमिका का मंचन करते हैं.
बिना मानदेय 100 कलाकर निभा रहे किरदार
प्रदीप कुमार जोशी बताते हैं कि बाड़मेर की इस रामलीला की सबसे पावन विशेषता इसका नि:स्वार्थ भाव है. मंच पर करीब 80 से 100 कलाकार विभिन्न पात्रों को साकार करते हैं, लेकिन कोई भी एक रुपया तक मानदेय या शुल्क नहीं लेता है. व्यापारी, शिक्षक, कर्मचारी और युवा दिन भर अपने-अपने दायित्व निभाते हैं और रात को मर्यादा पुरुषोत्तम राम के सेवक बनाकर मंच पर उपस्थित होते हैं.
प्रभु श्रीराम की सेवा करना ही सौभाग्य की बात है
लक्ष्मण के किरदार में शामिल नाथूसिंह सोलंकी बताते हैं कि मेकअप के रंग से लेकर वेशभूषा धारण करने तक हर काम में श्रद्धा और सेवा का भाव रहता है. प्रभु श्री राम की गाथा का गुणगान करने के लिए किसी मेहताने की आवश्यकता नहीं होती है बल्कि प्रभु की सेवा करने का अवसर मिलना ही अपने आप में बड़े सौभाग्य की बात है.



