झुंझुनूं विजय की याद में बनी परसरामपुरा की छतरी, दीवारों पर दर्ज है 18वीं सदी का इतिहास

Last Updated:October 30, 2026, 09:21 IST
Maharao Shardul Singh Chhatri Parasrampura Jhunjhunu: शेखावाटी के परसरामपुरा गांव में स्थित महाराव शार्दुल सिंह की छतरी यहाँ के शौर्य और कला का जीवंत दस्तावेज है. झुंझुनूं पर आक्रमण करने से पहले शार्दुल सिंह ने यहीं विजय ध्वज फहराया था, जिनके निधन के बाद उनके पांचों पुत्रों ने 18वीं शताब्दी में इस भव्य छतरी का निर्माण करवाया था. प्राकृतिक रंगों से तैयार इसके दुर्लभ भित्तिचित्रों में शार्दुल सिंह को अपने पांचों पुत्रों के साथ दरबार में बैठे दर्शाया गया है. वर्तमान में संरक्षण के अभाव और ताले में बंद होने के बावजूद यह धरोहर ऐतिहासिक महत्व रखती है.
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Jhunjhunu: शेखावाटी की ऐतिहासिक और खूबसूरत धरती पर बिखरी प्राचीन धरोहरें यहाँ के शौर्य, वैभव और समृद्ध कला की कहानी बयां करती हैं. इन्हीं अनमोल विरासतों में झुंझुनूं जिले के परसरामपुरा गाँव में स्थित महाराव शार्दुल सिंह की छतरी भी शामिल है. यह स्मारक केवल एक साधारण ऐतिहासिक इमारत नहीं है, बल्कि शेखावत वंश की वीरता और उस दौर की बेजोड़ चित्रकला एवं स्थापत्य कला का एक जीवंत दस्तावेज है. बाहर से सामान्य सी दिखाई देने वाली इस छतरी के भीतर 18वीं शताब्दी के ऐसे दुर्लभ भित्तिचित्र मौजूद हैं, जो इतिहास के कई अनछुए और गौरवशाली पहलुओं को आज भी जीवंत रखते हैं.
ऐतिहासिक और प्रामाणिक जानकारियों के अनुसार, झुंझुनूं पर आक्रमण करने से पहले महाराव शार्दुल सिंह ने परसरामपुरा पर अपना विजय प्राप्त कर विजय ध्वज फहराया था. उनके निधन के बाद उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाने के उद्देश्य से उनके पांचों पुत्रों ने 18वीं शताब्दी में यहाँ इस भव्य छतरी का निर्माण करवाया था. भव्य गुंबदों और आकर्षक मेहराबों से सजी इस इमारत में राजस्थानी और मुगल स्थापत्य शैली का बेहद सुंदर समन्वय देखने को मिलता है, जो उस समय की इंजीनियरिंग और कलाप्रेम की मिसाल पेश करता है.
दरबार में बैठे शार्दुल सिंह और पांचों पुत्रों के चित्र हैं इसकी सबसे बड़ी खासियतइस ऐतिहासिक छतरी की सबसे बड़ी विशेषता इसकी दीवारों और छतों पर उकेरे गए 18वीं सदी के दुर्लभ भित्तिचित्र हैं. प्राकृतिक रंगों और पारंपरिक पद्धतियों से तैयार इन चित्रों में ठाकुर शार्दुल सिंह को अपने पांचों पुत्रों के साथ राजसी दरबार में बैठे हुए दर्शाया गया है. इसके अलावा धार्मिक प्रसंगों, भगवान श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं तथा रामायण से जुड़े कई पौराणिक दृश्यों को भी दीवारों पर खूबसूरती से उकेरा गया है. इन चित्रों में तत्कालीन राजपरिवार की जीवनशैली, उनकी गहरी धार्मिक आस्था और उस समय की चित्रकला की उच्च परंपरा की स्पष्ट झलक दिखाई देती है. चित्रों की बारीकियां और रंगों का बेहतरीन संयोजन उस दौर के कलाकारों की दक्षता को बयां करता है.
संरक्षण की दरकार और आगामी विजय दिवस के आयोजनइतिहास और कला की इतनी महत्वपूर्ण धरोहर होने के बावजूद परसरामपुरा की यह छतरी वर्तमान में संरक्षण के अभाव और चुनौतियों से जूझ रही है. वर्षों से मौसम की मार और उपेक्षा का सामना कर रहे इन भित्तिचित्रों के धीरे-धीरे खराब होने की आशंका बनी हुई है. इसके अलावा छतरी पर ताला लगे रहने के कारण आम पर्यटक भी इसके अंदर मौजूद कलात्मक खजाने का दीदार नहीं कर पाते हैं. दूसरी ओर, आगामी 8 दिसंबर को महाराव शार्दुल सिंह का विजय दिवस मनाया जाएगा, जिसके तहत परसरामपुरा और नवलगढ़ में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा. शार्दुल ट्रस्ट के पदाधिकारियों के अनुसार इस अवसर पर गोपीनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद छतरी पर पहुंचकर पुष्पांजलि अर्पित की जाएगी, जिससे इस ऐतिहासिक धरोहर की चर्चा एक बार फिर से सुर्खियों में आ गई है.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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Jhunjhunu,Jhunjhunu,Rajasthan
First Published :
October 30, 2026, 09:21 IST



