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200 किलो आमरस का भोग लगा, फिर ‘बीमार’ हुए भगवान! जानिए कोटा के जगदीश मंदिर की अनोखी परंपरा

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दर्शन बंद, घंटियां खामोश… कोटा के जगदीश मंदिर में क्यों बदला पूरा माहौल?

Last Updated:July 05, 2026, 14:40 IST

Kota Jagdish Temple Rituals: कोटा के रामपुरा स्थित ऐतिहासिक भगवान जगदीश मंदिर में इन दिनों कपाट बंद हैं और घंटियों को भी सफेद कपड़े से बांध दिया गया है. आषाढ़ पूर्णिमा पर 108 कलशों के जल से महाअभिषेक और 200 किलो आमरस का भोग लगाने के बाद मान्यता के अनुसार भगवान अस्वस्थ हो गए हैं. इसलिए 15 दिनों तक उन्हें पूर्ण विश्राम और औषधीय उपचार दिया जाएगा. इस दौरान आम श्रद्धालुओं के दर्शन भी बंद रहेंगे. उपचार पूरा होने के बाद 15 जुलाई को भगवान नवयौवन रूप में दर्शन देंगे, जबकि 16 जुलाई को भव्य रथ यात्रा निकाली जाएगी.

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कोटा. रामपुरा स्थित ऐतिहासिक भगवान जगदीश मंदिर का नजारा इन दिनों पूरी तरह बदला हुआ और श्रद्धालुओं को हैरान करने वाला है. आमतौर पर हर सुबह जहां शंखनाद, मंत्रोच्चार और घंटियों की मधुर ध्वनि से भगवान को जागृत किया जाता है, वहीं इन दिनों मंदिर में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ है. मंदिर के कपाट बंद हैं और परिसर में लगी पीतल की सभी घंटियों को सफेद कपड़े से लपेटकर बांध दिया गया है, ताकि कोई भी श्रद्धालु अनजाने में उन्हें न बजा सके.

इसके पीछे सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा और गहरी आस्था जुड़ी हुई है. आषाढ़ पूर्णिमा के अवसर पर भगवान जगदीश, उनकी बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलदेव का 108 पवित्र कलशों के जल और पंचामृत से महाअभिषेक किया गया. इसके बाद भगवान को 200 किलो शुद्ध आमरस का महाभोग अर्पित किया गया. मान्यता है कि अत्यधिक जलाभिषेक और आमरस का भोग ग्रहण करने के बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं.

बीमार होने पर भगवान को दिया जाता है पूरा विश्राम

सनातन परंपरा में भगवान को परिवार के जीवंत सदस्य की तरह माना जाता है. मान्यता के अनुसार, ऋतु परिवर्तन और विशेष भोग के बाद भगवान को विश्राम की आवश्यकता होती है. इसी कारण मंदिर के कपाट बंद कर दिए गए हैं और घंटियों को भी बांध दिया गया है, ताकि किसी प्रकार का शोर उनके विश्राम में बाधा न बने. यह परंपरा ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर की प्रसिद्ध ‘अनसारा परंपरा’ की तर्ज पर वर्षों से निभाई जा रही है.

15 दिन तक चलेगा उपचार, मिलेगा औषधीय काढ़ा

अगले 15 दिनों तक भगवान का उपचार एक सामान्य मरीज की तरह किया जाएगा. मंदिर के मुख्य पुजारी और वैद्य प्रतिदिन गर्भगृह में जाकर भगवान की सेवा करेंगे. इस दौरान छप्पन भोग या भारी प्रसाद नहीं चढ़ाया जाएगा. भगवान को औषधीय काढ़ा, फल, मिश्री, किशमिश, काजू, बादाम और सुपाच्य दूध जैसी हल्की सामग्री अर्पित की जाएगी. उपचार अवधि में मुख्य पुजारी के अलावा किसी अन्य व्यक्ति को गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति नहीं होगी.

15 जुलाई को होंगे नवयौवन दर्शन, 16 जुलाई को निकलेगी रथ यात्रा

श्रद्धालुओं को भगवान के दर्शन के लिए 15 दिन तक इंतजार करना होगा. उपचार अवधि पूरी होने के बाद 15 जुलाई 2026 को मंदिर के कपाट दोबारा खोले जाएंगे. इस दिन भगवान जगदीश अपने दिव्य ‘नवयौवन रूप’ में भक्तों को दर्शन देंगे. इसके अगले दिन, 16 जुलाई 2026 को भगवान जगदीश, बहन सुभद्रा और भाई बलदेव भव्य रथों पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलेंगे. इस ऐतिहासिक रथ यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने की उम्मीद है. तब तक पूरा कोटा और दूर-दराज से जुड़े श्रद्धालु अपने आराध्य के शीघ्र स्वस्थ होने की प्रार्थना कर रहे हैं.About the Authordeep ranjan

दीप रंजन सिंह 2016 से मीडिया में जुड़े हुए हैं. हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, ईटीवी भारत और डेलीहंट में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 2022 से हिंदी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. एजुकेशन, कृषि, राजनीति, खेल, लाइफस्ट…और पढ़ें

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी, राशि-धर्म और शास्त्रों के आधार पर ज्योतिषाचार्य और आचार्यों से बात करके लिखी गई है. किसी भी घटना-दुर्घटना या लाभ-हानि महज संयोग है. ज्योतिषाचार्यों की जानकारी सर्वहित में है. बताई गई किसी भी बात का Local-18 व्यक्तिगत समर्थन नहीं करता है.

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