Agriculture News I गाजर घास बनी मुसीबत, फसल और जैव विविधता पर मंडरा रहा खतरा

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बीकानेर में गाजर घास को लेकर जागरूकता, किसानों को दिए नियंत्रण के टिप्स
Last Updated:August 21, 2026, 18:03 IST
Agriculture News: बीकानेर में तेजी से फैल रही गाजर घास किसानों के साथ पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए भी चिंता का कारण बन रही है. कृषि अनुसंधान केन्द्र में आयोजित जागरूकता कार्यक्रम में वैज्ञानिकों ने किसानों और विद्यार्थियों को इसके नुकसान व नियंत्रण के उपाय बताए. विशेषज्ञों ने फूल और बीज बनने से पहले गाजर घास को नियंत्रित करने की सलाह दी.
बीकानेर. खेतों, खाली जमीन, सड़क किनारे और चरागाहों में उगने वाली गाजर घास किसानों के लिए बड़ी परेशानी बन सकती है. पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस नाम की यह आक्रामक खरपतवार तेजी से फैलती है. एक बार किसी क्षेत्र में फैलने के बाद इसका नियंत्रण मुश्किल हो सकता है. इसका असर केवल खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय वनस्पति, पशुओं और इंसानों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है. इसके दुष्प्रभाव और नियंत्रण को लेकर कृषि अनुसंधान केन्द्र बीकानेर में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया. इसमें किसानों और विद्यार्थियों को गाजर घास की पहचान, उससे होने वाले नुकसान और नियंत्रण के तरीकों की जानकारी दी गई.
केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ. शीश पाल सिंह ने बताया कि पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस, जिसे सामान्य रूप से गाजर घास कहा जाता है, एक आक्रामक खरपतवार है. इसका तेजी से फैलाव फसलों और स्थानीय जैव विविधता को प्रभावित करता है. साथ ही यह मानव और पशु स्वास्थ्य के लिए भी परेशानी पैदा कर सकता है. डॉ. रूपेश मीना ने गाजर घास में पाए जाने वाले विषाक्त पदार्थों और उनके प्रभावों की जानकारी दी. वहीं डॉ. बी.डी.एस. नाथावत ने बताया कि गाजर घास विभिन्न बीमारियों से जुड़े रोगाणुओं और कीट-पतंगों के लिए आश्रय स्थल भी बन सकती है. उन्होंने इसके समय रहते नियंत्रण पर जोर दिया. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, गाजर घास को कई स्थानों पर कांग्रेस घास के नाम से भी जाना जाता है. यह कम समय में तेजी से बढ़ती और आसपास के क्षेत्र में फैलती है. खेतों में इसकी मौजूदगी फसलों के लिए उपलब्ध पानी, पोषक तत्व और जगह को प्रभावित कर सकती है. यही वजह है कि किसानों को खेत में इसके पौधे दिखाई देते ही नियंत्रण की सलाह दी जाती है.
फूल और बीज बनने से पहले करें नियंत्रणगाजर घास की सबसे बड़ी समस्या इसका तेजी से प्रसार है. पौधे में फूल और उसके बाद बीज बनने पर यह आसपास के क्षेत्र में फैल सकती है, इसलिए विशेषज्ञों का जोर इस बात पर रहता है कि फूल और बीज बनने से पहले ही गाजर घास को नियंत्रित किया जाए. इसके नियंत्रण के लिए परिस्थितियों के अनुसार यांत्रिक, जैविक और रासायनिक तरीके अपनाए जा सकते हैं. छोटे क्षेत्र में इसे समय रहते जड़ सहित हटाना इसके प्रसार को रोकने में मददगार हो सकता है. बड़े स्तर पर इसके लिए समेकित खरपतवार प्रबंधन की आवश्यकता पड़ सकती है.
इंसानों के लिए भी बन सकती है परेशानीगाजर घास केवल फसलों को ही प्रभावित नहीं करती. इसके सीधे संपर्क या पराग के कारण संवेदनशील लोगों में त्वचा पर खुजली, एलर्जी, आंखों में जलन और सांस संबंधी परेशानी हो सकती है. इसी कारण इसे हटाते समय सावधानी बरतना जरूरी है. पौधे को सीधे नंगे हाथों से पकड़ने के बजाय दस्ताने और शरीर को ढकने वाले कपड़ों का इस्तेमाल करना बेहतर माना जाता है. गाजर घास स्थानीय वनस्पतियों के लिए भी चुनौती बन सकती है. तेजी से फैलने के कारण यह आसपास उगने वाली दूसरी वनस्पतियों को प्रभावित कर जैव विविधता पर असर डाल सकती है. विशेषज्ञों के मुताबिक समय पर इसकी पहचान और नियंत्रण ही इसे बड़े क्षेत्र में फैलने से रोकने का सबसे प्रभावी तरीका है.
About the AuthorMonali Paul
नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…
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Bikaner,Rajasthan
First Published :
August 21, 2026, 18:03 IST



