गजब का स्कूल! 21 बच्चे पढ़ते हैं, लेकिन राजस्थान का एक भी नहीं, दिलचस्प है कहानी

Last Updated:August 10, 2026, 13:11 IST
Nagaur Unique School: नागौर-जोधपुर सीमा के सोयला क्षेत्र का राजकीय प्राथमिक विद्यालय तिनकी नाडी अनेकता में एकता की मिसाल बन गया है. स्कूल में पढ़ने वाले सभी 21 विद्यार्थी राजस्थान के नहीं, बल्कि बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ से आए प्रवासी मजदूर परिवारों के बच्चे हैं. अलग-अलग मातृभाषाओं और संस्कृतियों के बावजूद ये बच्चे हिंदी माध्यम से एक साथ पढ़ाई कर रहे हैं. शुरुआत में भाषा की परेशानी आई, लेकिन शिक्षकों के प्रयास से अब बच्चे हिंदी में कविताएं और पहाड़े सुनाते हैं. स्कूल परिवार ने बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए अभिभावकों से संपर्क कर किताबों और ड्रेस जैसी जरूरतों में भी मदद की.
नागौर-जोधपुर सीमा से एक अनोखी तस्वीर सामने आई है. सोयला क्षेत्र की बासनी हरीसिंह ग्राम पंचायत के राजकीय प्राथमिक विद्यालय तिनकी नाडी में शिक्षा की अनोखी कहानी लिखी जा रही है. यह स्कूल अनेकता में एकता की मिसाल बन गई है. स्कूल में कुल 21 विद्यार्थी पढ़ते हैं, लेकिन इनमें से एक भी बच्चा राजस्थान का नहीं है. ये सभी बच्चे बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ से आए प्रवासी मजदूर परिवारों के हैं. मजदूर परिवार रोजगार की तलाश में यहां पहुंचे और लाइम उद्योगों सहित दूसरे मजदूरी कार्यों में जुट गए.
सुबह माता-पिता काम के लिए निकलते हैं और बच्चे बस्ता लेकर स्कूल पहुंच जाते हैं. किसी के पिता लाइम उद्योग में मजदूरी करते हैं तो कोई परिवार दूसरे मेहनत-मजदूरी के काम से जुड़ा है. इन बच्चों की दुनिया में गांव और प्रदेश की सीमाएं मायने नहीं रखती. किसी की मातृभाषा भोजपुरी है, कोई छत्तीसगढ़ी बोलता है तो किसी के घर में दूसरी स्थानीय भाषा सुनाई देती है. स्कूल में पढ़ाई हिंदी माध्यम से होती है. ऐसे में एक ही कक्षा में अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों का मेल देखने को मिलता है.
शुरुआती दौर में भाषा शिक्षकों के सामने बड़ी चुनौती थी. बच्चों को हिंदी समझने में परेशानी होती थी और शिक्षक भी उनकी मातृभाषा से पूरी तरह परिचित नहीं थे. कई बार एक सामान्य शब्द का अर्थ समझाने में भी अधिक समय लग जाता था. लेकिन शिक्षकों ने इसे कमजोरी मानने के बजाय सीखने का माध्यम बनाया. धीरे-धीरे इशारों, उदाहरणों, स्थानीय शब्दों और लगातार संवाद के जरिए बच्चों और शिक्षकों के बीच भाषा की दूरी कम होती गई. आज यही बच्चे हिंदी में कविताएं सुनाते हैं, पहाड़े बोलते हैं.
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प्रधानाध्यापक प्रेमप्रकाश शर्मा के मुताबिक, बच्चों में अब काफी बदलाव दिखाई देता है. शुरुआत में जहां भाषा के कारण बच्चे झिझकते थे, वहीं अब वे स्कूल की क्लास में खुलकर हिस्सा लेते हैं. पढ़ाई के साथ कविता, पहाड़े और दूसरी शैक्षणिक कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी बढ़ी है. शिक्षक बच्चों की भाषा और पारिवारिक पृष्ठभूमि को समझते हुए उन्हें सहज माहौल देने का प्रयास करते हैं. इसका असर यह हुआ कि अलग-अलग राज्यों से आए बच्चे अब खुद को स्कूल का हिस्सा मानते हैं और नियमित रूप से पढ़ाई के लिए पहुंचते हैं.
स्कूल परिवार ने सिर्फ कक्षा तक सीमित रहकर जिम्मेदारी नहीं निभाई. पीईईओ कैलाश सांगवा के अनुसार, कई बार विद्यालय परिवार ने बच्चों के घर जाकर उनके अभिभावकों से संपर्क किया और उन्हें नियमित रूप से स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया. आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों की जरूरतों को देखते हुए किताबें, ड्रेस और अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने के प्रयास भी किए गए. मकसद यही रहा कि परिवार की आर्थिक स्थिति या प्रवासी जीवन की मजबूरी बच्चों की पढ़ाई के रास्ते में दीवार न बने.
प्रवासी बच्चों की मौजूदगी ने गांव के स्कूल को भी नई जिंदगी दे दी है. ग्रामीणों के अनुसार, गांव के ज्यादातर बच्चे अब शहरों में पढ़ने चले गए हैं. ऐसे में अगर बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ से आए मजदूरों के बच्चे यहां पढ़ने नहीं आते तो विद्यालय में विद्यार्थियों की संख्या बेहद कम रह जाती. इन बच्चों के कारण स्कूल में कक्षाएं नियमित चल रही हैं और परिसर में बच्चों की आवाजें गूंजती हैं. ग्रामीण इसे स्कूल के अस्तित्व से जोड़कर देखते हैं और कहते हैं कि इन बच्चों ने इस सरकारी स्कूल को जीवंत बनाए रखा है.
तिनकी नाडी का यह स्कूल सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं, बल्कि भारत की विविधता की छोटी-सी तस्वीर बन गया है. यहां अलग-अलग राज्यों से आए बच्चे एक साथ बैठते हैं, एक-दूसरे की भाषाएं सुनते हैं और हिंदी के जरिए ज्ञान की दुनिया से जुड़ते हैं. न जाति का सवाल है, न प्रदेश की पहचान का और न ही भाषा की दीवार. यहां हर बच्चे के लिए शिक्षा का रास्ता बराबर है. शायद इसी भावना को सबसे सरल शब्दों में यूं कहा जा सकता है यहां बच्चे अलग-अलग राज्यों से आए हैं, लेकिन उनकी मंजिल एक है कि पढ़-लिखकर आगे बढ़ना.
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August 10, 2026, 13:11 IST



