Animal Husbandry: बरसात और नमी में पशुपालक न करें ये 7 गलतियां, छोटी सी लापरवाही भी पड़ सकती है भारी

नागौर: बरसात और नमी का मौसम पशुपालकों के लिए जितना राहत लेकर आता है, उतनी ही परेशानिया भी बढ़ा देता है. इस मौसम में बाड़े में नमी, कीचड़, जलभराव और दूषित चारे के कारण पशुओं के बीमार होने का खतरा बढ़ जाता है. लगातार गीली जमीन पर खड़े रहने से खुरों में घाव और फुट रॉट की समस्या हो सकती है. इसके अलावा सीलन में बैठने से सांस संबंधी रोग और निमोनिया का खतरा बढ़ता है. इसलिए पशुओं के बैठने की जगह ऊंची, साफ और सूखी रखना बहुत जरूरी है.
पशु चिकित्सक विनोद चौधरी ने बताया कि बरसात में वातावरण में नमी अधिक होने के कारण खली, चोकर और दाने में फफूंद तेजी से लग सकती है. ऐसा चारा पशुओं के स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकता है. लंबे समय तक इसे खिलाने से उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है. वहीं, इससे गाभिन पशुओं में गर्भपात का खतरा भी बढ़ सकता है. ऐसे में पशुपालकों को दाने की बोरियां सीधे जमीन या दीवार से सटाकर नहीं रखनी चाहिए. इन्हें लकड़ी के फट्टों या ईंटों के ऊपर सूखी और हवादार जगह पर रखना चाहिए.
हरे के साथ सूखा चारा देना जरूरी
उन्होंने बताया कि बारिश में हरे चारे की उपलब्धता बढ़ जाती है, लेकिन पशुओं को अचानक बहुत अधिक हरा चारा खिलाने से पाचन संबंधी समस्या और दस्त हो सकते हैं. इससे दूध उत्पादन भी प्रभावित होता है. हरे चारे को संतुलित मात्रा में सूखे चारे या भूसे के साथ मिलाकर देना चाहिए. सुबह घास पर ओस या बारिश का पानी होने पर पशुओं को तुरंत चरने न भेजें. बाहर छोड़ने से पहले थोड़ा सूखा चारा खिलाना चाहिए इससे आफरा जैसी समस्या नहीं होती है.
नई घास के साथ पेट में पहुंच सकते हैं परजीवी
बरसात के बाद नई घास तेजी से उगती है, लेकिन इसके साथ कई तरह के परजीवी और उनके लार्वा भी पशुओं के शरीर में पहुंच सकते हैं. ऐसे में कई बार पशु भरपूर चारा खाने के बावजूद लगातार कमजोर होता जाता है और दूध उत्पादन में कमी आने लगती है. ऐसे में पशुपालक को समय-समय पर कृमिनाशक दवा देनी चाहिए. साथ ही गलघोटू, मुंहपका-खुरपका जैसी संक्रामक बीमारियों से बचाव के लिए पशुओं का समय पर टीकाकरण करवाना चाहिए.
फिसलन भरा फर्श गाभिन पशुओं के लिए भी खतरा
बारिश के दौरान गोबर और पानी जमा होने से पशुशाला का फर्श चिकना हो जाता है. भारी गाय या भैंस के फिसलने से चोट, हड्डी टूटने या गाभिन पशु को गंभीर नुकसान का खतरा रहता है. इसलिए फर्श पर पानी और गोबर जमा नहीं होने दें. जरूरत के अनुसार सूखी रेत डालते रहे. पक्के फर्श पर ऐसी हल्की धारियां बनवाना चाहिए. जिससे पशुओं के खुरों को पकड़ मिल सके और फिसलने की आशंका कम हो.
थनों की स्वच्छता से बचाएं पशुओं को थनैला रोग से
बरसात में पशु जब कीचड़ और गंदगी में बैठते हैं तो गोबर-मिट्टी थनों पर चिपक जाती है. यही गंदगी दूध निकालते समय संक्रमण का कारण बन सकती है और पशुओं में थनैला रोग का खतरा बढ़ा सकती है. दूध दुहने से पहले थनों को साफ पानी से धोए या कीटाणुनाशक घोल से साफ करें. इसके बाद साफ कपड़े से थनों को सुखाकर ही दूध निकालें. दूध दुहने वाले व्यक्ति के हाथ और बर्तन भी साफ होना जरूरी है.
जलभराव और बाहरी परजीवियों से करें बचाव
पशु चिकित्सक विनोद चौधरी के अनुसार, बाड़े के आसपास जलभराव रहने से मच्छर, मक्खियां और किलनियां तेजी से बढ़ सकती हैं. ये पशुओं में सर्रा और बबेसिया जैसी बीमारियों के संक्रमण का माध्यम बन सकते हैं. इसलिए बाड़े के आसपास पानी जमा न होने दें और नियमित सफाई रखें. इसके अलावा किसी पशु में बीमारी के लक्षण दिखें तो उसे तुरंत स्वस्थ पशुओं से अलग बांधें और उसके दाना-पानी के बर्तन भी अलग रखें.



