Rajasthan

Dholpur Regional Language | धौलपुर की क्षेत्रीय भाषा भूल रही पीढ़ी

Last Updated:September 30, 2026, 09:55 IST

Dholpur Regional Language: राजस्थान के धौलपुर में हजारों सालों से बोली जाने वाली पारंपरिक क्षेत्रीय भाषा विलुप्त होने की कगार पर है. अंग्रेजी माध्यम और आधुनिकता की दौड़ में नई पीढ़ी अपने पुराने शब्दों को भूल रही है. गडुआ, तिवारो, बट्टा और लेजु जैसे पारंपरिक शब्द अब केवल बुजुर्गों की जुबां तक ही सीमित रह गए हैं. स्थानीय निवासी विशंभर दयाल शर्मा का कहना है कि बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ अपनी मातृभाषा से भी जोड़ना जरूरी है. यदि समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो बुजुर्गों के साथ यह अनमोल विरासत भी खत्म हो जाएगी.

ख़बरें फटाफट

धौलपुर. राजस्थान का धौलपुर जिला अपने समृद्ध इतिहास, अद्भुत कला और शौर्य के लिए पूरे देश में जाना जाता है. लेकिन इस ऐतिहासिक पहचान के साथ-साथ यहां की एक और सबसे बड़ी खूबी यहां की पारंपरिक और क्षेत्रीय भाषा रही है. हजारों सालों से धौलपुर के गांवों और हर घर-आंगन में गूंजने वाली यह मीठी बोली अब धीरे-धीरे खामोशी की चादर ओढ़ती जा रही है. समय के बदलाव और आधुनिकता की दौड़ में जिन पुराने शब्दों के साथ यहां की कई पीढ़ियां बड़ी हुईं, आज वही शब्द नई पीढ़ी के लिए पूरी तरह से अनजान बन चुके हैं. गांव के बुजुर्गों की जुबान पर तो ये अनमोल शब्द आज भी जिंदा हैं, लेकिन उनके जाने के बाद इस भाषाई विरासत को कौन संभालेगा, यह सवाल अब हर भाषा प्रेमी की चिंता बढ़ा रहा है.

वर्तमान समय में गांवों का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है. गांवों में भी अब अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई का चलन बढ़ गया है. बदलते दौर और शहरीकरण के प्रभाव के कारण युवा पीढ़ी अपनी जड़ों और स्थानीय बोली से लगातार दूर होती जा रही है. स्थानीय ग्रामीण विशंभर दयाल शर्मा इस स्थिति पर चिंता जताते हुए बताते हैं कि आज अगर गांवों में पारंपरिक और पुराने शब्द सुनने हों, तो आपको चौपाल पर बैठे बुजुर्गों के पास जाकर ही बैठना पड़ता है. उनका मानना है कि हमारी युवा पीढ़ी अंग्रेजी और अन्य विदेशी भाषाएं सीख रही है, जो आज के समय की मांग है और अच्छी बात है. लेकिन इसी आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम अपनी सबसे अनमोल विरासत यानी अपनी मातृभाषा को बहुत पीछे छोड़ते जा रहे हैं.

पूरी तरह अनजान बन गए हैं आम बोलचाल के ये शब्दधौलपुर के बुजुर्ग आज भी अपनी रोजमर्रा की बातचीत में कई ऐसे पुराने शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें सुनकर नई पीढ़ी के बच्चे हैरान रह जाते हैं और अक्सर उनका अर्थ पूछने लगते हैं. उदाहरण के तौर पर, पहले पानी पीने वाले बर्तन को ‘गडुआ’ कहा जाता था. इसी तरह गर्मियों में चलने वाली गर्म हवा या लू को ‘ताती ब्यार’ और सर्दियों की कंपकंपाने वाली ठंडी हवा को ‘चिरी ब्यार’ कहा जाता था. थोड़े से हिस्से को ‘नेक’ और कपड़ों को ‘ओढ़ना’ कहकर पुकारा जाता था. घर के आगे बने खुले बरामदे को ‘तिवारो’, चेहरा देखने वाले दर्पण को ‘बट्टा’, कुएं से पानी खींचने वाली रस्सी को ‘लेजु’ और छोटी कटोरी को ‘बिलिया’ कहा जाता था. इसके अलावा पानी भरने वाले मटके के लिए ‘मथना’, घर की दीवार के लिए ‘भीत’ और छोटे बच्चों को ‘मोडा-मोड़ी’ जैसे शब्दों का प्रयोग आम प्रचलन में था.

परिवारों को निभानी होगी अपनी अहम जिम्मेदारीआज ये सारे शब्द आधुनिक किताबों या सोशल मीडिया पर नहीं, बल्कि केवल गांव के बुजुर्गों की यादों और उनकी आपसी बातचीत में ही बचे हैं. सबसे बड़ा डर इस बात का है कि जिस दिन गांव के ये बुजुर्ग खामोश हो जाएंगे, कहीं उनके साथ हमारे ये पारंपरिक शब्द भी हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दफन न हो जाएं. विशंभर दयाल शर्मा जैसे कई ग्रामीणों का कहना है कि बच्चों को आधुनिक शिक्षा, तकनीक और अंग्रेजी जरूर हासिल करनी चाहिए, लेकिन उन्हें अपनी जड़ों, मातृभाषा और पारंपरिक बोली को कभी नहीं भूलना चाहिए. यह जिम्मेदारी कहीं न कहीं सीधे तौर पर परिवारों की भी है.

संरक्षण की है सख्त दरकारअगर घर के बड़े-बुजुर्ग और माता-पिता बच्चों को बचपन से ही इन पारंपरिक शब्दों और अपनी भाषा के महत्व से जोड़ेंगे, तभी यह सदियों पुरानी विरासत अगली पीढ़ी तक पहुंच पाएगी. धौलपुर के गांवों में आज भी यह भाषा बुजुर्गों की आवाज में अपनी सांस ले रही है. अब वक्त की सबसे बड़ी जरूरत सिर्फ इतनी है कि हमारी नई पीढ़ी उन आवाजों को करीब से सुने, उनके भावों को समझे और अपनी इस खोती जा रही अनमोल विरासत को सहेज कर आगे बढ़ाए.

About the Authorvicky Rathore

Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…

और पढ़ेंLocation :

Dhaulpur,Dhaulpur,Rajasthan

First Published :

September 30, 2026, 09:55 IST

Source link

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

Uh oh. Looks like you're using an ad blocker.

We charge advertisers instead of our audience. Please whitelist our site to show your support for Nirala Samaj