Donald Trump Hormuz Alternative Route : अफ्रीका का वो देश जो बनेगा होर्मुज का बड़ा भाई, ट्रंप ने जिस पर ढाए थे सितम, अब उसे ही बनाया सनम

दुनिया भर में इस समय एनर्जी संकट गहराता जा रहा है और क्रूड ऑयल यानी कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर बड़ा तनाव पैदा हो गया है. लाल सागर और होर्मुज जैसे दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों पर जहाजों की आवाजाही खतरे में पड़ चुकी है. इस वजह से न केवल पेट्रोल और डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर इसका बुरा असर पड़ रहा है. ऐसे मुश्किल दौर में अमेरिका ने एक नया जुगाड़ निकाला है. जिसे होर्मुज का बड़ा भाई बनाने की तैयारी की जा रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तुरंत इस देश की तिमारदारी भी शुरू कर दी है.
ट्रंप ने क्यों बढ़ाई इरिट्रिया से नजदीकियां?
होर्मुज का बड़ा भाई अफ्रीका के छोटे से देश इरिट्रिया बनने वाला है. जिसे एक वक्त पर अमेरिका ने तमाम प्रतिबंधों से दबाकर रखा हुआ था. इसे लिए मानवाधिकार उल्लंघनों का बहाना बनाया गया था. अब अचानक से डोनाल्ड ट्रंप सारे मानवाधिकार उल्लंघन भूल गए हैं. और इरिट्रिया से नजदीकियां बढ़ानी शुरू कर दी हैं.
अमेरिका असल में इरिट्रिया की खास लोकेशन का फायदा उठाना चाहता है. उसका मकसद लाल सागर में तेल के जहाजों के लिए एक नया और सुरक्षित रास्ता बनाना है, ताकि होर्मुज की जगह एक मजबूत विकल्प तैयार किया जा सके.
मानवाधिकार की बात किनारे, अमेरिका को याद आया तेल
अमेरिका को अपनी इस बड़ी समस्या का समाधान अब इरिट्रिया में नजर आ रहा है. इरिट्रिया पूर्वी अफ्रीका के ‘हॉर्न ऑफ अफ्रीका’ इलाके में बसा एक छोटा सा देश है, लेकिन दुनिया के नक्शे पर इसकी जगह बहुत ही खास है. अमेरिका का मानना है कि इरिट्रिया की मदद से एक ऐसा समुद्री रास्ता खोला जा सकता है जो यूरोप को पश्चिम एशिया और बाकी एशिया से सुरक्षित तरीके से जोड़ सके. इससे सऊदी अरब की राजधानी रियाद से निकलने वाले तेल के जहाजों के लिए एक नया और सुरक्षित ऑयल रूट तैयार हो सकता है.
इरिट्रिया पर अमेरिका ने खूब ढाए सितम
हालांकि, इस पूरे मामले में एक बड़ी रुकावट ये थी कि अमेरिका और इरिट्रिया के रिश्ते कभी अच्छे नहीं रहे. इथियोपिया के टिग्रे युद्ध में इरिट्रिया की भूमिका और वहां हुए गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों को लेकर अमेरिका ने 2021 में उस पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे. लेकिन अब जब अमेरिका को तेल सप्लाई की सख्त जरूरत पड़ी तो मानवाधिकारों का मुद्दा किनारे हो गया. ट्रंप सरकार ने इरिट्रिया के साथ अपने रिश्तों को नए सिरे से शुरू करने का फैसला किया और उस पर लगे सारे प्रतिबंध हटा दिए. इस तरह सालों से अलग-थलग पड़ा इरिट्रिया अचानक अमेरिका का एक अहम साझेदार बन गया है.
रेड सी का ‘साउथ गेट’ और सुरक्षा की नई चाल
इरिट्रिया इतना जरूरी क्यों है, इसे समझने के लिए लाल सागर के नक्शे को देखना होगा. लाल सागर अफ्रीका और अरब प्रायद्वीप के बीच पानी की एक पतली और लंबी पट्टी जैसा है. इसके दक्षिणी छोर पर एक बहुत ही संकरा समुद्री रास्ता है, जिसे ‘बाब अल-मंडेब’ कहा जाता है. इसे आप लाल सागर का दक्षिणी दरवाजा मान सकते हैं. सऊदी अरब से तेल और दूसरा सामान लेकर आने-जाने वाले सभी जहाजों को इसी रास्ते से गुजरना पड़ता है.
इस संकरे रास्ते के एक तरफ यमन मौजूद है, जहां से हूती विद्रोही लगातार जहाजों पर हमले करते हैं. वहीं दूसरी तरफ अफ्रीका के किनारे पर इरिट्रिया बसा है. अमेरिका का नया प्लान ये है कि अगर जहाजों को यमन के किनारे से दूर हटाकर इरिट्रिया के समुद्र तट के करीब से चलाया जाए, तो हूती हमलों का खतरा काफी हद तक कम हो जाएगा.
ये ठीक वैसा ही है जैसे किसी संकरी सड़क पर चलते समय एक तरफ का फुटपाथ खतरनाक हो तो इंसान दूसरी तरफ वाले फुटपाथ पर चलने लगे. इरिट्रिया इन समुद्री रास्तों पर नजर रख सकता है और कोई खतरा दिखने पर जहाजों को पहले से चेतावनी दे सकता है.
5 अरब डॉलर का नया फंड और होर्मुज का विकल्प
अमेरिका केवल रास्ता बदलने तक ही सीमित नहीं है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप सरकार लगभग 41 हजार करोड़ रुपए का एक नया फंड बनाने की तैयारी कर रही है. इस भारी-भरकम राशि का इस्तेमाल जंग में तबाह हुए ऊर्जा ढांचे को दोबारा खड़ा करने में किया जाएगा. ये पैसा मुख्य रूप से सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे मित्र देशों को दिया जाएगा ताकि वो अपनी तेल पाइपलाइनों और रिफाइनरियों की मरम्मत कर सकें.
इस प्लानिंग के पीछे अमेरिका का सबसे बड़ा मकसद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अपनी निर्भरता को खत्म करना है. अमेरिका चाहता है कि तेल सप्लाई के लिए ऐसे वैकल्पिक रास्ते तैयार किए जाएं, जिससे किसी एक संकरे समुद्री रास्ते के बंद होने पर पूरी दुनिया में तेल का संकट न खड़ा हो. यही वजह है कि अमेरिका अब उन देशों की भी तिमारदारी कर रहा है, जिन्हें वो कल तक सजा दे रहा था.
क्या आसान होगा ये रास्ता? जानिए इतिहास और चुनौतियां
कागजों पर अमेरिका का ये प्लान भले ही बहुत मजबूत दिखता हो, लेकिन जमीनी हकीकत में इसके सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं.
सबसे पहली बात तो ये है कि समुद्र के सबसे संकरे हिस्से पर यमन और इरिट्रिया के बीच की दूरी 30 किलोमीटर से भी कम है. इतने कम फासले के कारण यमन से होने वाले हमलों का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं होता, केवल थोड़ा कम होता है.
दूसरी बड़ी चुनौती इरिट्रिया की अपनी अंदरूनी राजनीति और उसका इतिहास है. 1993 में इथियोपिया से 30 साल की लंबी आजादी की लड़ाई लड़ने के बाद इरिट्रिया एक अलग देश बना था. तब से लेकर आज तक वहां केवल एक ही नेता इसायस अफवर्की का शासन है, जिन्हें दुनिया के सबसे खौफनाक तानाशाहों में गिना जाता है.
क्या है इरिट्रिया-इथियोपिया का बवाल?
इरिट्रिया और उसके पड़ोसी देश इथियोपिया के बीच रिश्ते हमेशा से तनावपूर्ण रहे हैं. 1998 में दोनों देशों के बीच सीमा को लेकर भयंकर युद्ध हुआ था. साल 2018 में इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद ने शांति समझौता किया, जिसके लिए उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार भी मिला. इसके बाद दोनों ने मिलकर 2020 से 2022 तक टिग्रे इलाके में लड़ाई लड़ी, जिसमें हजारों लोग मारे गए. लेकिन जब शांति समझौता हुआ तो इरिट्रिया को बाहर कर दिया गया, जिससे दोनों के रिश्ते फिर से खराब हो गए.
इथियोपिया एक ऐसा देश है जिसके पास अपना कोई समुद्री तट नहीं है. उसे दुनिया से व्यापार करने और तेल मंगाने के लिए लाल सागर की जरूरत है. इथियोपिया चाहता है कि इरिट्रिया उसे लाल सागर तक सुरक्षित रास्ता दे, लेकिन इरिट्रिया इसे अपनी आजादी और संप्रभुता पर हमला मानता है. अफ्रीका के इस हिस्से में जारी ये आपसी दुश्मनी किसी भी वक्त नया विवाद खड़ा कर सकती है.
अमेरिका के दांव पर आगे क्या?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ये नया इस बात का सबूत है कि ग्लोबल एनर्जी संकट ने वाशिंगटन को किस कदर मजबूर कर दिया है. अमेरिका भले ही इरिट्रिया को होर्मुज का विकल्प बनाकर लाल सागर से तेल की सुरक्षित सप्लाई बहाल करने का सपना देख रहा हो, लेकिन उस इलाके के उलझे हुए इतिहास, तानाशाही और क्षेत्रीय तनाव को देखते हुए ये दांव अमेरिका के लिए एक नई मुसीबत भी बन सकता है.



