Emotional Story: जिस घर में गूंजती थी मां की आवाज, वहां अब पसरा सन्नाटा, 5 बच्चों से छिना मां-बाप का साया

सीकर. जिस घर में कभी मां की आवाज से बच्चों की सुबह होती थी और पिता की मौजूदगी उन्हें सुरक्षा का एहसास कराती थी, आज उसी घर में सन्नाटा पसरा है. आंगन में पांच बच्चे हैं, लेकिन उनके सिर पर अब न मां का आंचल है और न पिता का साया. चार बेटियां और एक मासूम बेटा उम्र ऐसी, जब बच्चों को मां की गोद और पिता की उंगली की जरूरत होती है, लेकिन इन मासूमों से जिंदगी ने दोनों ही छीन लिए.
अब इन पांच बच्चों के बचपन का सहारा उनकी बुजुर्ग दादी हैं. खंडेला के कोटड़ी लुहारवास का यह परिवार पिछले एक साल में दो ऐसे दुख झेल चुका है, जिनसे उबरना किसी के लिए भी आसान नहीं. करीब एक साल पहले बीमारी के चलते बच्चों के पिता शैतान सिंह की मौत हो गई. परिवार इस सदमे से संभल भी नहीं पाया था कि पांच दिन पहले बच्चों की मां विला देवी ने भी बीमारी के चलते दम तोड़ दिया. मां के जाने के बाद पांचों बच्चे पूरी तरह दादी के सहारे हो गए हैं. जिस उम्र में दादी को आराम और परिवार के सहारे की जरूरत थी, उसी उम्र में अब उनके कंधों पर पांच बच्चों का भविष्य आ गया है.
इलाज में जमा पूंजी खत्म,अब राशन की चिंता
परिवार के मुताबिक बीमारी के इलाज में जो भी जमा पूंजी थी, वह धीरे-धीरे खत्म हो गई. हालात ऐसे बने कि घर की जरूरी चीजें तक बेचनी पड़ी. अब सबसे बड़ी चिंता दो वक्त के भोजन की है. पांच बच्चों के लिए राशन, कपड़े, पढ़ाई और इलाज जैसी जरूरतें पूरी करना बुजुर्ग दादी के लिए मुश्किल होता जा रहा है. घर में कोई ऐसा मजबूत और नियमित आय का साधन नहीं है, जिससे बच्चों की जरूरतें पूरी हो सकें. दादी की अपनी उम्र और शारीरिक परेशानी भी उनके सामने बड़ी चुनौती है.
बच्चों की आंखों में मां-पिता की याद
मां को गए अभी कुछ ही दिन हुए हैं, बच्चों के लिए यह दुख शब्दों में बयां करना आसान नहीं है. घर में मां की मौजूदगी अचानक खत्म हो गई. जिस आवाज को सुनकर बच्चे रोज उठते थे, वह अब हमेशा के लिए खामोश हो चुकी है. पिता को पहले ही खो चुके इन बच्चों ने अब मां को भी खो दिया. ऐसे में उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि अब उनकी जिंदगी कैसे चलेगी? कौन खाना बनाएगा, कौन स्कूल भेजेगा और बीमार पड़ने पर दवा कौन दिलाएगा?
जर्जर कमरे में बीत रहा पांच बच्चों का बचपन
परिवार के पास रहने के लिए एक जर्जर कमरा है, मौसम की मार से बचने के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं. इसी कमरे में पांचों बच्चों का बचपन गुजर रहा है. उनके लिए सुरक्षित घर, पढ़ाई की सुविधा, पौष्टिक भोजन और रोजमर्रा की जरूरतें सबसे बड़ी जरूरत बन गई हैं. दादी खुद पैरों के दर्द से परेशान हैं, लेकिन बच्चों को देखकर अपनी तकलीफ भूल जाती हैं. उनकी चिंता अब सिर्फ यही है कि उनके बाद इन बच्चों का क्या होगा.
समाज और प्रशासन से मदद की उम्मीद
इस परिवार को अब समाज, भामाशाह और प्रशासन से मदद की जरूरत है. पांचों बच्चों को सुरक्षित आवास, नियमित भोजन, शिक्षा, कपड़े और स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत है. सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के साथ-साथ बच्चों की पढ़ाई और भविष्य के लिए स्थायी मदद भी जरूरी है. इन बच्चों ने बहुत कम उम्र में जिंदगी के सबसे बड़े दुख देख लिए हैं. अब जरूरत है कि उनके हिस्से का बचपन उनसे पूरी तरह न छिने.



