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पिता घर-घर बांटते हैं अखबार, बेटी ने स्टेट में जीत लिया ब्रॉन्ज… अब नेशनल का सपना, बीकानेर की रेशमा की कहानी करेगी प्रेरित

Last Updated:June 27, 2026, 06:13 IST

Bikaner Girl Reshma Wins Bronze in Basketball Tournament: बीकानेर के अखबार वितरक मोहम्मद सलीम की बेटी रेशमा ने सीकर में आयोजित जूनियर स्टेट बास्केटबॉल प्रतियोगिता में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर जिले का नाम रोशन किया है. शुरुआत में परिवार में खेल के प्रति जागरूकता न होने के कारण उन्हें खेलने की अनुमति नहीं थी, लेकिन कोच नरेंद्र कसवा के समझाने पर परिवार ने उनका पूरा साथ दिया. महारानी स्कूल से कोचिंग प्राप्त करने वाली 12वीं की छात्रा रेशमा अब पढ़ाई के साथ-साथ कड़ी मेहनत कर रही हैं ताकि नेशनल बास्केटबॉल प्रतियोगिता में खेलकर देश और अपने माता-पिता का नाम रोशन कर सकें.

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Bikaner: राजस्थान के बीकानेर की रहने वाली रेशमा आज उन सभी युवाओं के लिए एक मिसाल बन चुकी हैं, जो संसाधनों की कमी को अपनी सफलता के आड़े आने देते हैं. सुबह और शाम के वक्त घर-घर जाकर अखबार बांटकर अपने परिवार का गुजर-बसर करने वाले एक मेहनतकश पिता की बेटी रेशमा आज बास्केटबॉल कोर्ट पर अपनी अद्भुत खेल प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं. हाल ही में सीकर जिले में आयोजित हुई जूनियर स्टेट बास्केटबॉल प्रतियोगिता में रेशमा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए ब्रॉन्ज मेडल (कांस्य पदक) अपने नाम किया है. इस बड़ी सफलता के बाद अब रेशमा का मुख्य सपना नेशनल प्रतियोगिता में खेलकर अपने माता-पिता, बीकानेर और पूरे राजस्थान राज्य का नाम देश स्तर पर रोशन करना है.

रेशमा की यह ऐतिहासिक सफलता इस बात का जीवंत प्रमाण है कि यदि किसी खिलाड़ी की प्रतिभा को सही समय पर सटीक मार्गदर्शन और परिवार का भावनात्मक सहयोग मिल जाए, तो सीमित संसाधन भी बड़े सपनों के बीच कभी दीवार नहीं बन सकते. परिवार की बेहद कमजोर आर्थिक स्थिति होने के बावजूद रेशमा ने कभी हार नहीं मानी. उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत, अटूट लगन और अपने खेल कोच के कुशल मार्गदर्शन की बदौलत अपनी खेल यात्रा को आज एक नई ऊंचाई तक पहुंचाया है. स्टेट स्तर पर पदक जीतने के बाद अब उनकी पैनी नजर आगामी नेशनल चैंपियनशिप पर टिकी है. रेशमा को पूरा विश्वास है कि निरंतर अभ्यास, कड़े अनुशासन और कोच के सहयोग से वह अपने इस राष्ट्रीय सपने को भी जल्द ही हकीकत में बदल देंगी.

महारानी स्कूल के बास्केटबॉल कोर्ट और माहौल ने बदली रेशमा की जिंदगीअपनी इस खेल यात्रा की शुरुआत के बारे में बात करते हुए रेशमा बताती हैं कि जब उन्होंने बीकानेर के प्रसिद्ध महारानी स्कूल में प्रवेश लिया था, तब वहां का माहौल उनके लिए बिल्कुल नया था. स्कूल परिसर में बना बेहतरीन और उत्कृष्ट बास्केटबॉल कोर्ट और वहां खिलाड़ियों को मिलने वाली स्तरीय कोचिंग ने उन्हें इस खेल की तरफ तेजी से आकर्षित किया. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. नियमित रूप से किए गए कठिन अभ्यास और अनुभवी प्रशिक्षकों के रोजाना के मार्गदर्शन ने उनके खेल कौशल को लगातार निखारने का काम किया. रेशमा का स्पष्ट कहना है कि स्कूल में खेल और अभ्यास का जो सकारात्मक माहौल मिला और कोचों का जो निरंतर सहयोग रहा, वही आज उनकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा है.

शुरुआत में खेल के खिलाफ था परिवार, कोच नरेंद्र कसवा ने निभाई बड़ी भूमिकारेशमा के लिए खेल की दुनिया में कदम रखना और इस मुकाम तक पहुंचना बिल्कुल भी आसान नहीं था. उनके परिवार में पहले खेलों को लेकर किसी भी प्रकार की कोई जागरूकता या समझ नहीं थी. यही वजह थी कि शुरुआत के दिनों में उन्हें घर से बाहर जाकर बास्केटबॉल खेलने की अनुमति तक नहीं मिल रही थी. ऐसे कठिन और संवेदनशील समय में उनके खेल कोच नरेंद्र कसवा ने एक बेहद महत्वपूर्ण और मार्गदर्शक की भूमिका निभाई. कोच नरेंद्र कसवा ने रेशमा के माता-पिता से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात की और उनसे लंबी बातचीत कर खेलों के आधुनिक महत्व और उनकी बेटी के भीतर छिपी बास्केटबॉल की अद्भुत प्रतिभा के बारे में विस्तार से समझाया. कोच की समझाइश के बाद ही परिवार ने अपनी रूढ़िवादिता को पीछे छोड़कर रेशमा को खेलने की अनुमति दी, और आज वही परिवार उनकी सबसे बड़ी ताकत और प्रेरणा बन चुका है.

मेहनतकश परिवार का पूरा सहयोग, पढ़ाई के साथ जारी है नेशनल की तैयारीरेशमा का परिवार बेहद सादगीपूर्ण और मेहनतकश है. उनके पिता मोहम्मद सलीम बीकानेर शहर में अखबार वितरित करने का कठिन कार्य करते हैं, जबकि उनकी माता नसीम अख्तर एक गृहिणी हैं. परिवार की वित्तीय स्थिति भले ही बहुत मजबूत न हो, लेकिन इसके बावजूद माता-पिता अपनी होनहार बेटी के सपनों को पंख देने के लिए हरसंभव प्रयास और सहयोग कर रहे हैं. रेशमा की दो बड़ी बहनें भी कदम-कदम पर उनका हौसला और उत्साह बढ़ाती हैं. वर्तमान में रेशमा 12वीं कक्षा की छात्रा हैं. वह अपनी बोर्ड परीक्षा की पढ़ाई के साथ-साथ रोजाना खेल के मैदान पर घंटों पसीना बहाकर नियमित अभ्यास कर रही हैं, ताकि आगामी नेशनल प्रतियोगिता में देश के लिए खेलकर मेडल जीत सकें. उनकी यह संघर्षपूर्ण यात्रा आज उन तमाम बेटियों के लिए एक बड़ी प्रेरणा है जो कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने सपनों को साकार करने का अटूट साहस रखती हैं.

About the Authorvicky Rathore

Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें

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