Hair Care Tips : शिकाकाई से बालों को क्यों धोती हैं पहाड़ी औरतें? फायदे जान भूल जाओगे शैंपू, ये रहा तरीका

Last Updated:September 16, 2026, 14:56 IST
Shikakai Benefits : उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में शिकाकाई और रीठा का उपयोग बालों की देखभाल के लिए किया जाता है. ये प्राकृतिक उत्पाद रसायन-मुक्त विकल्प देते हैं. शिकाकाई एक फलदार झाड़ी या छोटे पेड़ पर लगने वाला प्राकृतिक फल है. इसके सूखे फल को पानी में भिगोकर या उबालकर बाल धोए जाते हैं. शिकाकाई की फलियां पकने के बाद सुखाकर सुरक्षित रखी जाती हैं. शिकाकाई में सैपोनिन नामक यौगिक पाया जाता है, जो पानी के संपर्क में आने पर हल्का झाग बनाते हैं. इसका नियमित रूप से सही इस्तेमाल करने पर बाल मुलायम और साफ हो जाते हैं. पहाड़ों पर शिकाकाई और रीठे का इस्तेमाल अक्सर एक साथ किया जाता है. रीठे में भी प्राकृतिक सैपोनिन पाए जाते हैं.
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में शिकाकाई का इस्तेमाल लंबे समय से बालों की सफाई और देखभाल के लिए किया जाता रहा है. बाजार में मिलने वाले आधुनिक शैंपू से पहले ग्रामीण इलाकों में लोग प्राकृतिक चीजों से बाल धोते थे. शिकाकाई और रीठा इसी पारंपरिक व्यवस्था का हिस्सा हैं. शिकाकाई एक फलदार झाड़ी या छोटे पेड़ पर लगने वाला प्राकृतिक फल है. इसके सूखे फल को पानी में भिगोकर या उबालकर बाल धोने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
बागेश्वर के रमेश पर्वतीय लोकल 18 से बताते हैं कि शिकाकाई एक कांटेदार झाड़ी या छोटे आकार के पेड़ पर लगने वाला फल है, जिसका वैज्ञानिक नाम एकेशिया कॉन्सिना है. यह गर्म और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है. उत्तराखंड के कई ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों में इसके पौधे जंगलों, खेतों की मेड़ों और घरों के आसपास देखने को मिल सकते हैं. शिकाकाई की फलियां पकने के बाद सुखाकर सुरक्षित रखी जाती हैं. सूखी फलियों को पानी में डालने पर प्राकृतिक झाग बनता है.
उत्तराखंड के अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय बोलियों के अनुसार शिकाकाई के नाम में थोड़ा अंतर देखने को मिल सकता है. आमतौर पर इसे शिकाकाई या सिकाकाई कहा जाता है. कई ग्रामीण परिवार इसे सीधे इसके प्रचलित नाम से ही पहचानते हैं. जबकि रीठा को पहाड़ी क्षेत्रों में सामान्यतः रीठा नाम से जाना जाता है. स्थानीय लोगों के लिए ये दोनों प्राकृतिक वनस्पतियां केवल पेड़-पौधे नहीं, बल्कि पारंपरिक जीवनशैली का हिस्सा रही हैं.
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शिकाकाई में प्राकृतिक सैपोनिन नामक यौगिक पाए जाते हैं, जो पानी के संपर्क में आने पर हल्का झाग बनाते हैं. यह झाग बालों और सिर की त्वचा से धूल, अतिरिक्त तेल और गंदगी हटाने में मदद कर सकता है. शिकाकाई को आमतौर पर बालों की प्राकृतिक नमी बनाए रखने में सहायक माना जाता है. नियमित रूप से सही तरीके से इस्तेमाल करने पर बाल मुलायम और साफ महसूस हो सकते हैं. हालांकि, इसके प्रभाव हर व्यक्ति के बालों और त्वचा के प्रकार के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं. इसे किसी चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए.
पहाड़ी क्षेत्रों में शिकाकाई और रीठे का इस्तेमाल अक्सर एक साथ किया जाता है. रीठे में भी प्राकृतिक सैपोनिन पाए जाते हैं, जिसके कारण यह सफाई करने में मददगार माना जाता है. रीठा बालों से अतिरिक्त तेल और गंदगी हटाने में उपयोगी हो सकता है, जबकि शिकाकाई बालों को मुलायम बनाए रखने में सहायक मानी जाती है. दोनों को मिलाकर प्राकृतिक हेयर क्लीनर तैयार किया जाता है. कई ग्रामीण परिवार आंवला भी इसमें मिलाते हैं. यह मिश्रण पारंपरिक रूप से बालों की सफाई और मजबूती के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है.
शिकाकाई की सूखी फलियों को साफ पानी में कुछ घंटों के लिए भिगोया जाता है. इसके बाद इन्हें हल्की आंच पर उबालकर ठंडा किया जाता है. पानी छानने के बाद तैयार मिश्रण को बालों में लगाया जा सकता है. कुछ लोग शिकाकाई को पीसकर पाउडर के रूप में भी इस्तेमाल करते हैं. बालों में लगाने के बाद हल्के हाथों से मालिश की जाती है, फिर साफ पानी से धो लिया जाता है. प्राकृतिक चीजों का उपयोग करते समय मात्रा और त्वचा की संवेदनशीलता का ध्यान रखना जरूरी है.
शिकाकाई को बालों के लिए लाभकारी माना जाता है, लेकिन इसे हर समस्या का इलाज नहीं कहा जा सकता है. बाल झड़ने, डैंड्रफ या सिर की त्वचा में संक्रमण जैसी समस्याओं के कई कारण हो सकते हैं. शिकाकाई सफाई में मदद कर सकती है, लेकिन गंभीर समस्या होने पर विशेषज्ञ की सलाह जरूरी है. वैज्ञानिक प्रमाण सीमित होने के कारण इसके सभी दावों को निश्चित उपचार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. संवेदनशील त्वचा या एलर्जी वाले लोगों को पहली बार इस्तेमाल से पहले थोड़ी मात्रा में पैच टेस्ट करना चाहिए.
आज के समय में रसायनयुक्त उत्पादों के बीच शिकाकाई और रीठा जैसे प्राकृतिक विकल्पों में लोगों की रुचि फिर बढ़ रही है. उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में इनका उपयोग पुरानी पीढ़ियों से चला आ रहा है. स्थानीय जंगलों और खेतों में मिलने वाली वनस्पतियां आत्मनिर्भर जीवनशैली की पहचान भी रही हैं. हालांकि, जंगलों से किसी भी पौधे या फल का संग्रह स्थानीय नियमों के अनुसार ही किया जाना चाहिए. शिकाकाई का पारंपरिक ज्ञान हमारी पहाड़ी संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जुड़ी विरासत है.
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September 16, 2026, 14:56 IST



