Health

छोटी परेशानी को गंभीर करने की बीमारी, कैसे मेंटल हेल्थ इश्यूज से जूझ रहा हर 10 में से एक भारतीय?

आमतौर पर भारतीय लोग एक काम करते हैं. अगर उन्हें कोई छोटा सा तनाव है तो वे उससे उबरने या बचने की कोशिश नहीं करते, बल्कि उसे और गंभीर बना लेते हैं. ऐसा वे उस पुरानी आदत के चलते करते हैं जिससे ज्यादातर भारतीय जूझ रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि अक्सर देखा जाता है कि जिस स्थिति या बात से भारतीयों को तनाव या अवसाद होता है, वे उससे बचते नहीं हैं बल्कि उसी परिस्थिति में लंबे समय तक काम करते रहते हैं, जब तक कि यह मेटल हेल्थ पर भारी न पड़ने लग जाए और गंभीर हो जाए.

विशेषज्ञों का कहना है कि डेडलाइन, ट्रैफिक, डिजिटल ओवरलोड, आर्थिक दबाव और लगातार बढ़ती अपेक्षाओं से घिरी शहरी जिंदगी में मानसिक स्वास्थ्य तेजी से प्रभावित हो रहा है. उनक कहना है कि भारत को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति अपने दृष्टिकोण में बदलाव लाने की जरूरत है. समस्याओं के गंभीर होने का इंतजार करने की बजाय मानसिक परेशानी की समय रहते पहचान, शुरुआती जांच, सही सलाह और जरूरत पड़ने पर उपचार को स्वास्थ्य व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए. यह बात “Freedom from Silent Suffering – Mental Health in Urban India” विषय पर आयोजित एक पैनल चर्चा के दौरान डॉक्टरों ने कही.

डॉ निमेश जी देसाई, डायरेक्टर, साइकियाट्री एवं मेंटल हेल्थ, पैसिफिक वनहेल्थ ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य एक व्यापक स्पेक्ट्रम है, जिसमें रोजमर्रा के तनाव और मानसिक परेशानी से लेकर इलाज किए जाने के लायक मानसिक विकार तक शामिल हैं. उन्होंने कहा, “देश में मानसिक विकार लगभग 10–12% लोगों को प्रभावित करते हैं. लेकिन इससे कहीं बड़ी आबादी ऐसी है जो मानसिक परेशानी का अनुभव कर रही है और एक अन्य वर्ग ऐसा भी है जो अपनी मानसिक सेहत को बेहतर बनाना चाहता है.”

उन्होंने जोर दिया कि स्वास्थ्य व्यवस्था को मानसिक स्वास्थ्य की इन अलग-अलग जरूरतों को समझना होगा और केवल तब हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब समस्या एक गंभीर चिकित्सकीय स्थिति बन जाए.

चर्चा में यह भी सामने आया कि कई लोग तनाव, चिंता या भावनात्मक परेशानी के महत्वपूर्ण स्तर से गुजरने के बावजूद अपनी रोजमर्रा की जिंदगी जारी रखते हैं. मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने में झिझक के कारण वे अक्सर मदद लेने में देरी करते हैं. विशेषज्ञों ने कहा कि निवारक मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को स्वास्थ्य सेवाओं का सामान्य हिस्सा बनाने की जरूरत है, जिसमें जागरूकता, शुरुआती जांच, समय पर सहायता और आवश्यकता पड़ने पर उचित उपचार पर अधिक जोर दिया जाए. उन्होंने कहा कि निवारक मनोचिकित्सा इस दृष्टिकोण को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.

डॉ. दीपक राजेहा, डायरेक्टर, Hope Care India एवं प्रेसिडेंट, Indian Association of Private Psychiatry (Delhi Chapter), ने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बातचीत को सामान्य बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया, खासकर ऐसे समय में जब समाज बढ़ते डिजिटल जुड़ाव और सामाजिक अलगाव के बीच आगे बढ़ रहा है. उन्होंने कहा कि भविष्य में मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था को केवल मानसिक विकारों के उपचार पर नहीं, बल्कि रोकथाम और शुरुआती हस्तक्षेप पर भी ध्यान देना होगा. “अगर हम केवल उपचार की बात करेंगे, तो हम हमेशा समस्या के पीछे रहेंगे.

P-SAD (Prevention of Stress, Anxiety & Depression) जैसी पहल जरूरी हैं, क्योंकि बढ़ते मानसिक स्वास्थ्य बोझ से निपटने के लिए रोकथाम और शुरुआती हस्तक्षेप समय की जरूरत हैं,” उन्होंने कहा.

इसके लिए पैसिफिक वनहेल्थ ने P-SAD (Prevention of Stress, Anxiety and Depression) की शुरुआत की है. यह पहल मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता, जांच और जरूरत के अनुसार उचित सहायता को मुख्यधारा की स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा बनाने के उद्देश्य से तैयार की गई है. यह कार्यक्रम रोजमर्रा के तनाव और मानसिक परेशानी से लेकर ऐसी स्थितियों तक के पूरे स्पेक्ट्रम को संबोधित करने का प्रयास करता है, जिनमें पेशेवर देखभाल की आवश्यकता होती है. इसका उद्देश्य इस सोच को मजबूत करना है कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल तभी शुरू नहीं होनी चाहिए जब व्यक्ति की परेशानी गंभीर हो जाए.

डॉ. स्वदीप श्रीवास्तव, को-फाउंडर और प्रेसिडेंट ने कहा, “स्वास्थ्य सेवाओं को ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ना होगा जहां समस्याओं के गंभीर होने के बाद उनका इलाज करने की बजाय जोखिमों की पहले पहचान की जाए और लोगों को स्वस्थ रहने में मदद की जाए. मानसिक स्वास्थ्य, समग्र स्वास्थ्य का अभिन्न हिस्सा है. P-SAD के माध्यम से हमारा प्रयास है कि तनाव, चिंता और अवसाद से जुड़ी बातचीत को लोगों के लिए अधिक सहज बनाया जाए और निवारक देखभाल को लोगों तथा समुदायों के लिए अधिक सुलभ बनाया जाए.”

किस उम्र में मानसिक समस्याएं ज्यादा? विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियां किसी एक आयु वर्ग या जीवन के किसी एक चरण तक सीमित नहीं हैं. लगातार तनाव से जूझ रहे कामकाजी पेशेवरों से लेकर उम्र बढ़ने की चुनौतियों का सामना कर रहे बुजुर्गों और व्यक्तिगत तथा सामाजिक जिम्मेदारियों का बोझ उठाने वाली महिलाओं तक, जागरूकता और समय पर सहायता की आवश्यकता सभी के लिए है.

विशेषज्ञों का कहना था कि ‘चुपचाप सहने’ से आजादी तब शुरू होती है, जब लोग अपनी बात कहने, मदद मांगने और मानसिक परेशानी के गंभीर होने से पहले सही सहायता प्राप्त करने में सहज महसूस करें.

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