Karauli News: रावण के नाम से जुड़ा राजस्थान का अनोखा वाद्य, जिसकी धुन सुनकर ठहर जाते हैं कदम

Last Updated:October 18, 2026, 19:13 IST
Karauli News: राजस्थान का रावण हत्था एक अनोखा पारंपरिक वाद्य यंत्र है, जिसकी मधुर धुनें आज भी लोकसंस्कृति को जीवंत बनाए हुए हैं. भोपा समुदाय के कलाकार पीढ़ियों से इस कला को सहेजते हुए पाबूजी और देव महाराज की लोकगाथाएं सुनाते आ रहे हैं. जानिए रावण हत्था की खासियत और राजस्थान की इस अनमोल सांस्कृतिक विरासत की कहानी.
दशहरा आते ही देशभर में रावण के पुतले दहन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं.कहीं रावण के पुतले बनाए जाते हैं, तो कहीं उसकी लंका और जीवन से जुड़ी कहानियां सुनाई जाती हैं. लेकिन राजस्थान में रावण के नाम से जुड़ी एक ऐसी प्राचीन धरोहर भी है, जिसकी मधुर धुनें आज भी गलियों में सुनाई देती हैं. यह कोई कहानी का पात्र नहीं, बल्कि राजस्थान का एक अनोखा प्राचीन काल का वाद्य यंत्र है, जिसे रावण हत्था कहा जाता है.
लोकमान्यताओं में इसे रामायण काल से जोड़कर देखा जाता है. इसके प्राचीन इतिहास को लेकर भले ही ठोस प्रमाण उपलब्ध न हों, लेकिन राजस्थान की लोकसंस्कृति में इसका विशेष स्थान है.रावण हत्था राजस्थान के पारंपरिक लोकवाद्यों में शामिल है.इसकी खासियत है कि इसे बजाने के लिए तारों पर गज चलाया जाता है, जिससे एक अलग ही तरह की मधुर ध्वनि निकलती है.
इसकी बनावट और बजाने का अंदाज इसे दूसरे वाद्य यंत्रों से अलग पहचान देता है. इसकी धुन सुनकर लोग कुछ पल ठहरने और लोकसंगीत का आनंद लेने लगते हैं.लोकमान्यताओं में इस वाद्य यंत्र को रावण से जोड़कर देखा जाता है. इसे बजाने वाले कलाकार इसे दुनिया के सबसे पुराने वाद्य यंत्रों में से एक मानते हैं.
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राजस्थान में रावण हत्था बजाने की परंपरा को पीढ़ियों से आगे बढ़ाने में भोपा समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. इस समुदाय के कई कलाकार अपनी आजीविका के साथ-साथ लोककथाओं, भजनों और धार्मिक गाथाओं को भी इसी वाद्य यंत्र के माध्यम से जीवंत रखते हैं. रावण हत्था बजाने वाले कलाकार बजरंग लाल बताते हैं कि यह वाद्य यंत्र उनके समुदाय की पहचान है. भोपा समाज के लोगों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस कला को सीखा है और आज भी इसे अपनी परंपरा के रूप में संजोए हुए हैं.
बजरंग लाल के मुताबिक, उनके समाज के लोग रावण हत्था बजाकर गलियों में भजन प्रस्तुत करते हैं. इसके साथ ही पाबूजी और देव महाराज की फड़ से जुड़ी लोकगाथाओं का गायन भी करते हैं. इस तरह यह वाद्य यंत्र केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि लोकदेवताओं की गाथाओं और राजस्थान की मौखिक परंपरा को जीवित रखने का माध्यम भी है.
दिखने में साधारण लगने वाले इस वाद्य यंत्र को बजाना इतना आसान नहीं है. इसके सुरों पर पकड़ बनाने के लिए अभ्यास, अनुभव और पारंपरिक ज्ञान की आवश्यकता होती है. बजरंग लाल बताते हैं कि इसे बजाने की कला उन्होंने अपने बुजुर्गों से सीखी है. पीढ़ियों से मिले इसी ज्ञान के आधार पर कलाकार इसके सुरों को साधते हैं. राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में रावण हत्था का विशेष महत्व माना जाता है. यहां लोकसंगीत और लोकदेवताओं की गाथाओं से जुड़ी परंपराओं में इस वाद्य यंत्र की अहम भूमिका रही है.
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October 18, 2026, 19:13 IST



