Krishna Padalu Janmashtami | कान्हा के पदचिह्न और कृष्णा पादालु परंपरा

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चावल के आटे से बनते हैं कान्हा के पदचिह्न, मान्यता है खुद घर आते हैं कृष्ण
Last Updated:August 29, 2026, 11:21 IST
Krishna Padalu Tradition: श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर तेलंगाना में सदियों पुरानी ‘कृष्णा पादालु’ परंपरा उत्साह के साथ निभाई जाती है. इसमें चावल के शुद्ध आटे से घर के मुख्य द्वार से पूजा कक्ष तक बाल-कृष्ण के नन्हे पदचिह्न बनाए जाते हैं. मान्यता है कि मध्यरात्रि में कान्हा स्वयं माखन की तलाश में घर आकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं. इस परंपरा में कृत्रिम रंगों का प्रयोग नहीं होता. यह न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि चींटियों और कीट-पतंगों को भोजन देकर ‘भूत दया’ का पर्यावरणीय संदेश भी देती है.
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Telangana: श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर तेलंगाना के पारंपरिक घरों में आस्था, संस्कृति और लोक-कला का एक अनोखा संगम देखने को मिलता है. राज्य भर के ग्रामीण और शहरी इलाकों में लोग अपने आराध्य बाल-कृष्ण के स्वागत के लिए सदियों पुरानी ‘कृष्णा पादालु’ परंपरा को पूरे विधि-विधान और उत्साह के साथ निभाते हैं.
इस विशेष परंपरा के तहत घर के मुख्य प्रवेश द्वार से लेकर पूजा कक्ष और रसोई घर तक छोटे-छोटे बाल-कृष्ण के पैरों के निशान बनाए जाते हैं. ऐसी मान्यता है कि मध्यरात्रि में कान्हा स्वयं माखन की तलाश में अपने नन्हे कदमों से घर के भीतर प्रवेश करते हैं और पूरे परिवार को सुख, शांति व समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं.
चावल के आटे का लेप और पदचिह्न बनाने की पारंपरिक विधिकृष्णा पादालु बनाने के लिए किसी भी तरह के आर्टिफिशल रंग का उपयोग नहीं किया जाता, बल्कि केवल चावल के शुद्ध आटे का गाढ़ा घोल तैयार किया जाता है.
पारंपरिक तैयारी: कई घरों में चावल को भिगोकर सिलबट्टे पर बारीक पीसा जाता है.
हस्तकला का रूप: परिवार की बुजुर्ग महिलाएं अपनी बंद मुट्ठी या हथेली के किनारे को इस लेप में डुबोकर फर्श पर रखती हैं, जिससे तलवे का सुंदर आकार बन जाता है.
उंगलियों की रचना: इसके बाद उंगलियों के पोरों से नन्हे पैरों की पांच उंगलियां बनाई जाती हैं.
बच्चों की सहभागिता: जिन घरों में छोटे बच्चे होते हैं, उनके पैरों को सीधे इस लेप में डुबोकर फर्श पर चलाया जाता है, जिससे घर का पूरा माहौल उत्सवमय और आनंदित हो उठता है.
पदचिह्नों की दिशा का महत्व और नटखट कान्हा का आगमनधार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन पदचिह्नों को बनाने की दिशा हमेशा बाहर से भीतर की ओर रखी जाती है. अर्थात ये निशान मुख्य द्वार से शुरू होकर पूजा स्थल या माखन की मटकी की ओर जाते हैं. यह इस बात का स्पष्ट प्रतीक माना जाता है कि नटखट बाल-कृष्ण बाहर से घर के अंदर आ रहे हैं. इस दृश्य को देखकर भक्तों के मन में भाव जागृत होता है कि भगवान श्री कृष्ण स्वयं उनके घर में पधार चुके हैं.
पर्यावरण संरक्षण और ‘भूत दया’ का अनूठा संदेशइस प्राचीन परंपरा का एक व्यावहारिक और पर्यावरणीय पहलू भी है. सनातन परंपरा के अनुसार चावल के आटे का इस्तेमाल करने का उद्देश्य केवल सजावट नहीं, बल्कि चींटियों और छोटे कीट-पतंगों को सहज रूप से भोजन उपलब्ध कराना भी होता है. भारतीय दर्शन में इसे ‘भूत दया’ यानी समस्त जीवों के प्रति करुणा और दया का भाव माना गया है. आधुनिकता के इस दौर में भी तेलंगाना के लोग अपनी इस प्राचीन सांस्कृतिक और पर्यावरणीय धरोहर को पूरी श्रद्धा के साथ संजोए हुए हैं.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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August 29, 2026, 11:21 IST



