न फिल्मी परिवार, न कोई बड़ा सहारा, गैराज में काम करने वाले गुलजार ऐसे बने बॉलीवुड के महान गीतकार

Last Updated:August 18, 2026, 04:01 IST
गुलजार का नाम सामने आते ही खूबसूरत शायरी, दिल को छू लेने वाले गाने और भावनाओं से भरी कहानियां याद आती हैं. आज वह हिंदी सिनेमा और साहित्य की दुनिया का जाना-माना नाम हैं. लेकिन यहां तक पहुंचने का उनका सफर बिल्कुल आसान नहीं था. गुलजार ने अपनी जिंदगी का एक दौर मुंबई के गैराज में काम करते हुए भी बिताया है. वहां वह कारों पर पेंट किया करते थे. बाद में उनकी मुलाकात फिल्ममेकर बिमल रॉय से हुई और यहीं से उनकी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया.
नई दिल्ली. गुलजार का जन्म 18 अगस्त 1934 को ब्रिटिश भारत के पंजाब के दीना इलाके में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है. उनका असली नाम संपूरण सिंह कालरा है. भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के बाद उन्हें परिवार से अलग होकर काफी मुश्किल हालात का सामना करना पड़ा.
बाद में वह मुंबई पहुंचे. यहां अपना गुजारा चलाने के लिए उन्होंने एक मोटर गैराज में काम करना शुरू किया. वह वहां कारों पर पेंट किया करते थे. उस समय उनके पास ज्यादा पैसे नहीं थे, लेकिन पढ़ने और लिखने का शौक उन्होंने कभी नहीं छोड़ा.
गुलजार की मुलाकात गीतकार शैलेंद्र के जरिए फिल्ममेकर बिमल रॉय से हुई. उस समय बिमल रॉय फिल्म ‘बंदिनी’ पर काम कर रहे थे. उन्होंने गुलजार की लिखने की क्षमता और उनकी सोच को पहचान लिया. बिमल रॉय ने उन्हें गैराज की नौकरी छोड़कर लिखने पर ध्यान देने की सलाह दी. गुलजार ने बाद में एक इंटरव्यू में बताया था कि बिमल रॉय ने उनसे कहा था कि गैराज में वापस मत जाना और अपनी जिंदगी बर्बाद मत करना. गुलजार के लिए यह पल बेहद खास था, क्योंकि पहली बार किसी बड़े फिल्ममेकर ने उनके अंदर छिपे लेखक को पहचाना था.
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इसके बाद गुलजार ने बिमल रॉय के साथ काम करना शुरू किया. साल 1963 में रिलीज हुई ‘बंदिनी’ से उन्होंने बतौर गीतकार अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की. फिल्म का संगीत एस.डी. बर्मन ने दिया था और गुलजार ने इसके लिए ‘मोरा गोरा अंग लई ले’ गीत लिखा था. इस गाने को लता मंगेशकर ने अपनी आवाज दी थी. इसके बाद गुलजार ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने गीत लिखने के साथ-साथ पटकथा और संवाद लेखन में भी अपनी पहचान बनाई.
साल 1971 में गुलजार ने ‘मेरे अपने’ से निर्देशन की शुरुआत की. इसके बाद उन्होंने ‘कोशिश’, ‘अचानक’, ‘मौसम’, ‘आंधी’, ‘खुशबू’, ‘किताब’ और ‘नमकीन’ जैसी कई शानदार फिल्में बनाईं. उनकी फिल्मों की खास बात यह रही कि उन्होंने रिश्तों, अकेलेपन और आम जिंदगी की छोटी-छोटी भावनाओं को बेहद सादगी के साथ पर्दे पर उतारा. यही वजह है कि उनकी फिल्मों और कहानियों से लोग आसानी से जुड़ते रहे.
गुलजार ने हिंदी सिनेमा को कई यादगार गाने दिए. उन्होंने अलग-अलग दौर के संगीतकारों के साथ काम किया. बाद में ए.आर. रहमान के साथ उनकी जोड़ी भी खूब पसंद की गई.फिल्म ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ के गाने ‘जय हो’ ने गुलजार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई. इस गाने के लिए गुलजार और ए.आर. रहमान को साल 2009 में ऑस्कर अवॉर्ड मिला. इसके अगले साल ‘जय हो’ को ग्रैमी अवॉर्ड भी मिला.
गुलजार की उपलब्धियां सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं हैं. उन्हें साल 2002 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 2004 में पद्म भूषण और 2013 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. साल 2024 में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला. इसके अलावा उन्हें कई राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिल चुके हैं.
गुलजार की निजी जिंदगी भी काफी चर्चा में रही है. उन्होंने अभिनेत्री राखी से शादी की थी. दोनों की बेटी मेघना गुलजार हैं, जो खुद एक सफल फिल्म निर्देशक हैं. मेघना ने ‘राजी’, ‘छपाक’ और ‘सैम बहादुर’ जैसी फिल्मों का निर्देशन किया है.गुलजार का सफर इस बात की मिसाल है कि अगर हुनर और मेहनत हो तो बिना किसी फिल्मी बैकग्राउंड के भी इंसान अपनी अलग पहचान बना सकता है. गैराज में कारों पर पेंट करने से लेकर हिंदी सिनेमा और साहित्य के सबसे बड़े नामों में शामिल होने तक, गुलजार की कहानी बेहद प्रेरणादायक है.
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August 18, 2026, 04:01 IST



