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Opinion: एशियन गेम्स में भारत की ‘बेस्ट टीम’ भेजना क्यों जरूरी है? कमरों की चिंता से कहीं बड़ा है देश का सपना

Last Updated:September 07, 2026, 13:41 IST

best team in asia cup: भारत 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी करने वाला है और 2036 ओलंपिक खेलों की मेजबानी के लिए भी दावेदारी कर रहा है. ऐसे में अगर भारत एशियन गेम्स में अपनी सर्वश्रेष्ठ टीम नहीं भेजता है तो उसकी पूरी दावेदारी कमजोर पड़ सकती है. इससे दुनिया को यह संदेश जाएगा कि भारत बहु-खेल आयोजनों को लेकर उतना गंभीर नहीं है. कमरे और लॉजिस्टिक्स को लेकर होने वाली बहस दुनिया के सामने ज्यादा मायने नहीं रखती.एशियन गेम्स में भारत की ‘बेस्ट टीम’ भेजना क्यों जरूरी है?Zoomएशिया कप में बेस्ट टीम भेजना क्यों जरूरी

नई दिल्ली. एशियन गेम्स में भारतीय क्रिकेट टीम को भेजने को लेकर बहस छिड़ी हुई है. खिलाड़ियों के लिए बेहतर होटल और कमरे उपलब्ध न होने को लेकर सवाल उठ रहे हैं लेकिन क्या कुछ दिनों की असुविधा भारत के उस बड़े लक्ष्य से ज्यादा महत्वपूर्ण है, जिसमें देश खेलों के जरिए अपनी सॉफ्ट पावर बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है? एशियन गेम्स में भारत की सर्वश्रेष्ठ टीम भेजना सिर्फ क्रिकेट का फैसला नहीं, बल्कि दुनिया को दिया जाने वाला एक बड़ा संदेश भी है.

कुछ समय से यह सवाल चर्चा में है कि जब नागोया में लॉजिस्टिक्स की स्थिति फिलहाल बहुत अच्छी नहीं है, तो बीसीसीआई को एशियन गेम्स में अपनी सर्वश्रेष्ठ टीम क्यों भेजनी चाहिए? खिलाड़ियों को उनकी आदत के मुताबिक कमरे नहीं मिल रहे हैं. अगर अगले कुछ दिनों में हालात नहीं सुधरे तो उन्हें कमरे साझा करने की नौबत भी आ सकती है. यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि भारत में क्रिकेट को एक खास तरह की ताकत और सुविधा हासिल है. बीसीसीआई को नागोया में अपनी सर्वश्रेष्ठ टीम भेजनी चाहिए और भेजेगा भी.

बेस्ट टीम भेजने से जाएगा विश्व को संकेत

भारत खेलों को अपनी सॉफ्ट पावर के तौर पर इस्तेमाल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. भारत 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी करने वाला है और 2036 ओलंपिक खेलों की मेजबानी के लिए भी दावेदारी कर रहा है. ऐसे में अगर भारत एशियन गेम्स में अपनी सर्वश्रेष्ठ टीम नहीं भेजता है तो उसकी पूरी दावेदारी कमजोर पड़ सकती है. इससे दुनिया को यह संदेश जाएगा कि भारत बहु-खेल आयोजनों को लेकर उतना गंभीर नहीं है. कमरे और लॉजिस्टिक्स को लेकर होने वाली बहस दुनिया के सामने ज्यादा मायने नहीं रखती. परंपरागत रूप से एथलीट ओलंपिक या एशियन गेम्स विलेज में रहने के अनुभव को बेहद खास मानते आए हैं. इन गेम्स विलेज में मिलने वाली सुविधाएं अधिकतम तीन सितारा होटल के स्तर की होती हैं लेकिन असली महत्व अनुभव का होता है. कोई भी खिलाड़ी गेम्स विलेज में पांच सितारा होटल जैसी सुविधाओं की उम्मीद नहीं कर सकता. इसके बावजूद हर खिलाड़ी इस अनुभव का हिस्सा बनना चाहता है.

खेल गांव में रुकने से फायदा होगा

कल्पना कीजिए कि वैभव सूर्यवंशी की मुलाकात लॉस एंजिल्स ओलंपिक 2028 के गेम्स विलेज में जैनिक सिनर या कार्लोस अल्काराज से होती है. दोनों के बीच दबाव से निपटने को लेकर बातचीत होती है. इस तरह का अनुभव किसी भी लॉजिस्टिकल परेशानी से कहीं ज्यादा बड़ा है. ऐसे मौके सिर्फ बहु-खेल आयोजनों में ही मिलते हैं. यही वजह है कि ओलंपिक और एशियन गेम्स जैसे आयोजनों में लॉजिस्टिक्स को कभी भी प्राथमिकता नहीं दी जा सकती. भारतीय खिलाड़ियों के लिए मौजूदा स्थिति निश्चित तौर पर आदर्श नहीं है. अगर एसीसी ने मोहसिन नकवी के नेतृत्व में समय रहते कदम उठाया होता और होटल बुक कर लिए होते तो हालात बेहतर हो सकते थे. एक साल पहले होटल उपलब्ध थे, लेकिन तब कुछ नहीं किया गया. अब स्थिति यह है कि बहुत कुछ सुधारा नहीं जा सकता. नागोया के पास अतिरिक्त होटल उपलब्ध नहीं हैं. ऐसे में जो विकल्प सामने है, उसे स्वीकार करना होगा या फिर छोड़ना होगा.

सुविधा भूल जाओ गोल्ड देश लाओ

बीसीसीआई यह भी समझता होगा कि भारत जिस तरह खेलों को अपनी सॉफ्ट पावर बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, उसमें एशियन गेम्स में अपनी सर्वश्रेष्ठ टीम भेजना जरूरी है. अगर आप रोजर फेडरर से पूछें, जिन्हें टेनिस इतिहास के महानतम खिलाड़ियों में गिना जाता है, तो वह शायद बताएंगे कि उनके करियर के सबसे यादगार पलों में से एक 2008 बीजिंग ओलंपिक में स्टान वावरिंका के साथ जीता गया डबल्स गोल्ड मेडल था. फेडरर ने उस उपलब्धि को अपनी कई ग्रैंड स्लैम जीतों से भी ऊपर रखा है. अपने देश के लिए किसी बहु-खेल आयोजन में स्वर्ण पदक जीतना और पदक समारोह के दौरान अपने देश का राष्ट्रध्वज ऊपर जाते देखना किसी भी खिलाड़ी के लिए बिल्कुल अलग अनुभव होता है.

अगर खिलाड़ियों के सामने होटल की सुविधाओं और देश के लिए गोल्ड मेडल जीतने के बीच चुनाव की स्थिति आती है तो वे निश्चित तौर पर मेडल को प्राथमिकता देंगे. यह बात साफ है कि एसीसी की लापरवाही के कारण मौजूदा स्थिति बिल्कुल आदर्श नहीं है लेकिन जिंदगी आखिर कब आदर्श रही है? हर चीज अपनी जगह पर परफेक्ट नहीं होती ऐसे में जब दांव पर देश के लिए एशियन गेम्स का गोल्ड मेडल हो तो कुछ दिनों की असुविधा बहुत बड़ी कीमत नहीं है.

About the AuthorRajeev MishraAssociate editor

राजीव मिश्रा, खेल पत्रकारिता में एक जाना पहचाना चेहरा है जो अपनी बेबाक विशलेषण के लिए जाने जाते है. वर्तमान में नेटवर्क 18 में एसोसिएट स्पोर्ट्स एडिटर के रूप में कार्यरत हूँ. इस भूमिका में मैं डिजिटल स्पोर्ट्स …

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New Delhi,Delhi

First Published :

September 07, 2026, 13:41 IST

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