Pali News: जिस दौर में छुआछूत थी चरम पर, रामप्रताप ने खुलवाई थी राजस्थान की पहली दलित पाठशाला

Last Updated:August 23, 2026, 14:46 IST
पाली जिले के गुंदोज गांव के स्वतंत्रता सेनानी रामप्रताप शर्मा ने अन्याय और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ जीवनभर संघर्ष किया. बचपन में माता-पिता को खोने और पैतृक जमीन छिन जाने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। 1938 में जोधपुर पुलिस में हेड कॉन्स्टेबल बने, लेकिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस का ओजस्वी भाषण सुनकर 1939 में नौकरी छोड़ स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए.
पाली. इतिहास की किताबों में अक्सर युद्धों और तारीखों के नाम दर्ज होते हैं, लेकिन किसी गांव या समाज की असली तकदीर वे लोग बदलते हैं जो अपने संघर्षों से क्रांति का रास्ता बनाते हैं. आज हम आपको सुना रहे हैं पाली जिले के गुंदोज गांव के एक ऐसे ही नायक की कहानी, जिन्होंने जीवन में हर मोड़ पर अन्याय के खिलाफ मोर्चा खोला. महज 12 साल की उम्र में सिर से माता-पिता का साया उठ जाने और जागीरदारों द्वारा पैतृक ज़मीन छीन लिए जाने के बावजूद, उन्होंने कभी हार नहीं मानी. व्यवस्था से लड़ने के लिए वे पुलिस में भर्ती हुए और हेड कॉन्स्टेबल बने.
लेकिन साल 1938 में जोधपुर में ‘नेताजी’ सुभाष चंद्र बोस का राष्ट्रभक्ति से भरा भाषण सुनकर उन्होंने खाकी वर्दी का त्याग कर दिया और हमेशा के लिए स्वतंत्रता संग्राम व सामाजिक समानता की लड़ाई में कूद पड़े. जब समाज में छुआछूत का दौर था और दलित बच्चों के लिए स्कूलों के दरवाजे बंद थे, तब रामप्रताप शर्मा ने किराए के एक छोटे से कमरे में ‘राजस्थान की पहली दलित पाठशाला’ की शुरुआत की.
नेताजी के भाषण का ऐसा जादू, पुलिस की वर्दी उतार बने क्रांतिकारीबात 1934 की है, जब ननिहाल बगड़ी के एक खुले दरबार में सामंतों को कमजोरों और सेठ-साहूकारों को पीटते देख रामप्रताप ने अन्यायी व्यवस्था से टकराने की ठानी. वे सेना में जाना चाहते थे, लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों के चलते 1938 में जोधपुर पुलिस में बतौर हेड कॉन्स्टेबल भर्ती हुए.इसी दौरान जोधपुर आए विलायत से लौटे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आमसभा की सुरक्षा का जिम्मा हेड कॉन्स्टेबल रामप्रताप शर्मा के पास था. नेताजी के ओजस्वी भाषण और राष्ट्रभक्ति के विचारों ने उनके भीतर ऐसी ज्वाला सुलगाई कि उन्होंने 1939 में पुलिस की नौकरी से इस्तीफा दे दिया. गांव लौटकर वे मारवाड़ लोक परिषद से जुड़े और जागीरदारी प्रथा के खिलाफ खुलकर मैदान में उतर आए.
जेल गए लाठिया खाई मगर नही टूटने दिया हौंसलाजमनालाल बजाज और हीरालाल शास्त्री के मार्गदर्शन में सत्याग्रह आंदोलन में भाग लेने पर 1943 में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. उन पर कई झूठे मुकदमे दर्ज किए गए. करीब दो साल जेल में बिताने के बाद 1945 में वे बरी हुए. रिहा होते ही वे फिर से किसान आंदोलनों में जुट गए और अंग्रेजों व जागीरदारों का विरोध करते हुए कई बार जानलेवा हमलों का शिकार भी हुए.
किराए के मकान से रखी राजस्थान की पहली दलित पाठशाला की नींवरामप्रताप शर्मा विनोबा भावे के विचारों से प्रभावित थे और छुआछूत के घोर विरोधी थे. उस दौर में जब दलित समाज के बच्चों के लिए स्कूलों के दरवाजे बंद थे, तब शर्मा जी ने सत्याग्रही सेठ पुखराज जैन का मकान किराए पर लिया और 1945 में ‘शिक्षा समिति’ गठित कर राजस्थान की पहली दलित पाठशाला शुरू की. अपने छोटे भाई मगराज की सरकारी नौकरी छुड़वाकर उन्हें इन बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा सौंपा. आजादी के बाद 1955 में इस पाठशाला को अंग्रेज अफसरों के पुराने बंगलों में शिफ्ट कर दिया गया, जो आज राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, गुंदोज के रूप में जाना जाता है.
दलित बेटी को दिया पिता का नामजयनारायण व्यास और मथुरादास माथुर के मार्गदर्शन में उन्होंने पाली के गांव-गांव पैदल जाकर छुआछूत उन्मूलन की अलख जगाई. वे न केवल सामाजिक सुधार की बातें करते थे, बल्कि उन्होंने एक दलित बच्ची को गोद लेकर अपनी बेटी की तरह पाला-पोसा, शिक्षित किया और उसका विवाह कराया. देश आजाद होने के बाद वे गांव के पहले सरपंच चुने गए और 1954 में कांग्रेस के पहले जिलाध्यक्ष भी बने. आजादी की लड़ाई से लेकर सामाजिक समरसता के इस सफर तक, स्वतंत्रता सेनानी रामप्रताप शर्मा की यह गाथा आज भी मारवाड़ की माटी में गर्व से गाई जाती है.
About the AuthorMonali Paul
नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…
और पढ़ेंFirst Published :
August 23, 2026, 14:46 IST



