Rajasthan Nikay Chunav | Who Is Winning Nikay Chunav

जयपुर. राजस्थान में नगरीय निकाय चुनाव के दूसरे चरण का मतदान कल यानी 11 सितंबर को होगा. इस चरण में प्रदेश के छह नगर निगमों के लिए भी वोट डाले जाएंगे. इनमें जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, अजमेर, पाली और अलवर जैसे बड़े शहर शामिल हैं. इसलिए यह चुनाव केवल वार्ड, सड़क, नाली, सफाई और स्थानीय सुविधाओं तक सीमित नहीं माना जा रहा. इन शहरों के नतीजे भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकेत देने वाले होंगे.
विधानसभा चुनाव 2028 में अभी समय है, लेकिन निकाय चुनाव को उसकी शुरुआती परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है. वजह सफ है. नगर निगम चुनाव में आम तोर पर स्थानीय मुद्दे सबसे आगे रहते हैं, लेकिन बड़े शहरों में वोट डालने वाला मतदाता सरकार के कामकाज, स्थानीय नेचाओं के काम करने का तरीका, उनका बात व्यवहार और विपक्ष की भूमिका को भी देखता है. ऐसे में 11 सितंबर का मतदान छह शहरों में किस पार्टी को बढ़त देता है, यह आने वाले दिनों की राजनीति में चर्चा का बड़ा मुद्दा बन सकता है.
जयपुर में सबसे बड़ा सवाल राजधानी का
छहों निगमों में जयपुर की लड़ाई सबसे ज्यादा नजर में रहेगी. जयपुर ग्रेटर और जयपुर हेरिटेज के अलग-अलग राजनीतिक समीकरण हैं. राजधानी होने के कारण यहां का चुनाव सिर्फ पार्षदों की जीत-हार तक नहीं रुकता. सरकार, भाजपा संगठन और कांग्रेस, तीनों के लिए जयपुर का परिणाम मनोवैज्ञानिक बढ़त का सवाल बन सकता है. मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का विधानसभा क्षेत्र सांगानेर जयपुर ग्रेटर में आता है. ऐसे में भाजपा के लिए राजधानी में अच्छा प्रदर्शन सरकार और संगठन दोनों के लिए अहम माना जाएगा. उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी भी जयपुर से विधायक हैं. दूसरी ओर कांग्रेस के लिए हेरिटेज इलाके में अपनी पकड़ बनाए रखना बड़ी चुनौती है. जयपुर में सफाई, ट्रैफिक, सड़क, पानी और ड्रेनेज जैसे मुद्दे सीधे लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े हैं. इसलिए यहां मतदाता का फैसला केवल पार्टी के नाम पर नहीं, स्थानीय कामकाज और उम्मीदवार की छवि पर भी असर डाल सकता है.
जोधपुर में गहलोत बनाम शेखावत की साख का सवाल
जोधपुर का चुनाव अलग मायने रखता है. यह अशोक गहलोत की राजनीतिक कर्मभूमि रही है. सरदारपुरा से गहलोत की लंबे समय से मजबूत पकड़ रही है. दूसरी तरफ जोधपुर से केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत भाजपा के बड़े चेहरे हैं. ऐसे में जोधपुर के दोनों नगर निगमों का चुनाव कांग्रेस और भाजपा के लिए स्थानीय बोर्ड से आगे की लड़ाई है. यहां परिणाम यह संकेत भी देगा कि शहर में गहलोत की पुरानी राजनीतिक पकड़ कितनी मजबूत है और शेखावत के नेतृत्व में भाजपा संगठन कितना प्रभावी है.
मेवाड़ में उदयपुर की परीक्षा
उदयपुर को भाजपा का मजबूत शहरी गढ़ माना जाता रहा है. इसलिए कांग्रेस के लिए यहां सेंध लगाना आसान नहीं होगा. लेकिन यही वजह है कि उदयपुर का नतीजा भाजपा के लिए भी कम अहम नहीं है. लंबे समय से मजबूत रहे गढ़ में पार्टी का प्रदर्शन उसके स्थानीय संगठन और नेतृत्व की स्थिति बताएगा. गुलाबचंद कटारिया के सक्रिय राजस्थान की राजनीति से बाहर जाने के बाद उदयपुर में भाजपा का स्थानीय नेतृत्व अपने दम पर कितना मजबूत है, यह भी चुनाव के बाद चर्चा का विषय बन सकता है. कांग्रेस के लिए उदयपुर में बेहतर प्रदर्शन दक्षिण राजस्थान में अपनी मौजूदगी मजबूत करने का मौका होगा.
अजमेर में कई नेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर
अजमेर का चुनाव भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. यहां भाजपा के लिए केंद्रीय मंत्री भागीरथ चौधरी, विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी और विधायक अनिता भदेल जैसे नेताओं की स्थानीय पकड़ की परीक्षा होगी. कांग्रेस के लिए अजमेर इसलिए अहम है क्योंकि यह सचिन पायलट का पुराना संसदीय क्षेत्र रहा है और उनके पुराने समर्थकों का असर यहां की राजनीति में चर्चा में रहता है. अजमेर में व्यापारी वर्ग, सरकारी कर्मचारी, सिंधी समाज और अल्पसंख्यक मतदाता जैसे अलग-अलग समूह चुनावी समीकरण बनाते हैं. इसलिए यहां का परिणाम एक सीधी पार्टी बनाम पार्टी लड़ाई से ज्यादा स्थानीय समीकरणों पर भी निर्भर कर सकता है.
पाली में प्रदेशाध्यक्ष की गृह सीट का दबाव
पाली का चुनाव भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण माना जाएगा. पाली उनका गृह जिला है. प्रदेश भाजपा की कमान संभालने के बाद अपने ही इलाके में पार्टी को मजबूत प्रदर्शन दिलाना उनके संगठनात्मक प्रभाव का सवाल बनेगा. पाली में चुनावी मुद्दे भी बाकी शहरों से कुछ अलग हैं. टेक्सटाइल उद्योग, बांडी नदी का प्रदूषण, पानी, सीवरेज और शहर की सुविधाएं यहां लोगों के बीच बड़े मुद्दे हैं. भाजपा के सामने इन स्थानीय सवालों पर भरोसा कायम रखने की चुनौती होगी, वहीं कांग्रेस अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश करेगी.
अलवर में भाजपा के साथ कांग्रेस की भी परीक्षा
एनसीआर से जुड़ा अलवर राजस्थान के दूसरे शहरों से कुछ अलग राजनीतिक मिजाज रखता है. यहां औद्योगिक विकास, रोजगार, अपराध, स्थानीय सुविधाएं और आसपास के सामाजिक समीकरण चुनाव में असर डालते हैं. केंद्रीय मंत्री और अलवर सांसद भूपेंद्र यादव के लिए शहर में भाजपा का प्रदर्शन अहम रहेगा. वहीं कांग्रेस के भंवर जितेंद्र सिंह की स्थानीय पकड़ भी इस चुनाव में परखी जाएगी. अलवर शहर से भाजपा विधायक और मंत्री संजय शर्मा के लिए भी स्थानीय संगठन और टिकट वितरण के बाद पार्टी को जीत तक पहुंचाना बड़ी जिम्मेदारी होगी.
11 सितंबर के बाद क्या बदलेगा?इन छह नगर निगमों को एक साथ देखें तो तस्वीर काफी दिलचस्प बनती है. जयपुर में राजधानी की प्रतिष्ठा है. जोधपुर में गहलोत और शेखावत जैसे बड़े नेताओं की साख जुड़ी है. उदयपुर भाजपा के पुराने शहरी आधार की परीक्षा है. अजमेर में कई बड़े नेताओं के स्थानीय प्रभाव का सवाल है. पाली में भाजपा प्रदेशाध्यक्ष का गृह जिला है और अलवर में राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े बड़े चेहरे मैदान में हैं. इसलिए 11 सितंबर को डाला जाने वाला वोट भले ही नगर निगम के पार्षद और बोर्ड के लिए हो, लेकिन इसका राजनीतिक असर उससे कहीं बड़ा हो सकता है. अगर भाजपा इन बड़े शहरों में मजबूत प्रदर्शन करती है तो वह इसे सरकार के कामकाज और संगठन की स्वीकार्यता के संकेत के तौर पर पेश कर सकती है. कांग्रेस को बढ़त मिलती है तो उसके लिए यह 2028 से पहले वापसी की जमीन तैयार होने का संदेश होगा.
निकाय चुनाव परिणाम का विधानसभा के लिए क्या मायनेनिकाय चुनाव को सीधे 2028 के विधानसभा चुनाव का परिणाम मानना जल्दबाजी होगी. स्थानीय उम्मीदवार, जातीय और सामाजिक समीकरण, वार्ड स्तर के मुद्दे और स्थानीय नेताओं की पकड़ यहां बहुत मायने रखती है. फिर भी छह बड़े नगर निगमों का सामूहिक परिणाम प्रदेश के शहरी राजनीतिक मूड की एक तस्वीर जरूर सामने रखेगा. यही वजह है कि 11 सितंबर का मतदान सिर्फ छह नगर निगमों के बोर्ड की लड़ाई नहीं है. यह भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए अपने-अपने गढ़, संगठन और नेताओं की जमीन पर ताकत परखने का मौका है. और सबसे बड़ी बात, इसके नतीजे 2028 की तरफ बढ़ती राजस्थान की राजनीति में पहला बड़ा सियासी संकेत दे सकते हैं.



