जालोर की ‘स्वर्ण बावड़ी’ कैसे बनी ‘सांड बावड़ी’? नाम के पीछे छिपी है इस राजा की कहानी

Last Updated:September 20, 2026, 07:39 IST
Jalore Historic Swarn Babdi:जालोर की ऐतिहासिक सांड बावड़ी अपने नाम के पीछे छिपी कहानी को लेकर खास पहचान रखती है. इतिहासकार बंसीलाल सोनी के अनुसार, कभी इसे ‘स्वर्ण बावड़ी’ के नाम से भी जाना जाता था. इससे जुड़ी लोककथा राजा वीरमदेव और जैसलमेर से आए एक संदेशवाहक की कहानी बताती है. मान्यता के अनुसार वीरमदेव की जान को खतरे की सूचना देने के लिए संदेशवाहक सांड पर सवार होकर जैसलमेर से जालोर पहुंचा था. सांड की इसी स्थान पर मृत्यु हो गई, जिसके बाद बावड़ी का नाम सांड बावड़ी पड़ने की बात कही जाती है. यह बावड़ी जालोर किले के पुराने जलस्रोतों से जुड़ी परंपरा का हिस्सा भी मानी जाती है. स्थानीय मान्यताओं में इसके कभी नहीं सूखने और पानी के ओवरफ्लो होने की बातें भी मिलती हैं.
जालोर. राजस्थान के जालोर की ऐतिहासिक सांड बावड़ी जिसे आज इसी नाम से जाना जाता है, लेकिन इतिहासकार के अनुसार कभी इसका नाम ‘स्वर्ण बावड़ी’ हुआ करता था. इस बावड़ी के नाम के पीछे राजा वीरमदेव से जुड़ी एक ऐसी कहानी बताई जाती है, जो इसे जालोर की दूसरी ऐतिहासिक बावड़ियों से अलग पहचान देती है. इतिहासकार बंसीलाल सोनी ने लोकल18 को बताया कि जालोर के राजा कान्हड़देव का विवाह जैसलमेर के भाटी राजपूत परिवार में हुआ था.
इसी रिश्ते के चलते वीरमदेव को जैसलमेर पक्ष से भांजे के रिश्ते से जोड़ा जाता है. जब जैसलमेर में यह जानकारी मिली कि वीरमदेव की जान को खतरा है और कोई व्यक्ति धोखे से उन्हें नुकसान पहुंचाना चाहता है, तो तुरंत उन्हें सावधान करने के लिए संदेश भेजा गया. तब यह संदेश एक संदेशवाहक के जरिए सांड पर सवार होकर जालोर भेजा गया.
इस वजह से नाम पड़ा सांड बावड़ी
संदेश लेकर सांड इतनी तेजी से जालोर पहुंचा कि शाम तक जैसलमेर से यहां पहुंच गया. लेकिन जालोर पहुंचते ही इसी स्थान पर उस सांड की मृत्यु हो गई. इसके बाद संदेशवाहक पैदल जालोर के किले तक पहुंचा और राजा कान्हड़देव को पूरा संदेश दिया. उन्हें बताया गया कि वीरमदेव की जान को खतरा है, इसलिए किसी भी संदिग्ध व्यक्ति के हाथ से उन्हें भोजन न कराया जाए और उनकी सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाए.
सांड बावड़ी का संबंध जालोर किले में मौजूद बावड़ियों से है
इतिहासकार बताते हैं कि सांड बावड़ी का संबंध जालोर किले में मौजूद बावड़ियों से भी बताया जाता है. यह बावड़ी सिर्फ अपने नाम की कहानी के कारण ही खास नहीं है, बल्कि जालोर के पुराने जलस्रोतों और किले से जुड़ी परंपरा का भी हिस्सा मानी जाती है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह बावड़ी कभी सूखती नहीं थी. पुराने समय में इसके पानी के ओवरफ्लो होने की बात भी बताई जाती है. इसके पानी को लेकर भी कई तरह की मान्यताएं प्रचलित रही हैं और इसे चमत्कारी बताया जाता रहा है.
About the Authorदीप रंजन सिंह Content Producer
दीपरंजन सिंह लगभग एक दशक से पत्रकारिता के फिल्ड से जुड़े हुए हैं. वह अभी न्यूज18 हिंदी के राजस्थान डिजिटल डेस्क से जुड़े हैं, जहां वे बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले लगभग एक दशक से सक्रिय पत…
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Jalor,Rajasthan
First Published :
September 20, 2026, 07:39 IST



