‘दुनिया को दिखाओ कि तुम 300 गेंदें खेल सकते हो’, वैभव सूर्यवंशी को कोच का नया चैलेंज

नई दिल्ली. क्रिकेट की पिच पर जब कोई 15 साल का लड़का अपनी बेखौफ बल्लेबाजी से दुनिया को हैरान करता है, तो उम्मीदों का आसमान अचानक बहुत बड़ा हो जाता है. वैभव सूर्यवंशी के साथ भी पिछले कुछ महीनों में कुछ ऐसा ही हुआ है. आईपीएल की चकाचौंध से निकलकर पिछले महीने इंग्लैंड के खिलाफ भारत की टी20 टीम में डेब्यू करने तक, वैभव का सफर किसी परीकथा जैसा रहा है. लेकिन सफेद गेंद की तेज-तर्रार दुनिया से निकलकर जब बात लाल गेंद यानी टेस्ट क्रिकेट की आती है, तो खेल के नियम और मिजाज पूरी तरह बदल जाते हैं. वैभव के बचपन के कोच मनीष ओझा का मानना है कि टी20 टीम तक पहुंचना भले ही तूफानी रहा हो, मगर भारत की टेस्ट कैप हासिल करने की राह उतनी सीधी और आसान नहीं होगी. कोच चाहते हैं कि उनका यह होनहार शागिर्द अब दुनिया को यह साबित करके दिखाए कि वह सिर्फ चौके-छक्के ही नहीं लगा सकता, बल्कि लाल गेंद के सामने 300 गेंदें खेलकर क्रीज पर डटे रहने का हुनर भी रखता है.
वैभव सूर्यवंशी (Vaibhav Sooryavanshi) के सामने अब लाल गेंद की क्रिकेट में खुद को साबित करने का बेहतरीन मौका है. उन्हें दलीप ट्रॉफी (Duleep Trophy) के लिए ईस्ट जोन का उपकप्तान बनाया गया है. यहां उन्हें लगातार कई चार दिवसीय मुकाबले खेलने को मिलेंगे. महज 15 साल की उम्र में इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिलना उनके टैलेंट पर चयनकर्ताओं के भरोसे को दर्शाता है, लेकिन असल चुनौती मैदान पर रन बनाने की होगी.
अगर वैभव के अब तक के प्रथम श्रेणी करियर पर नजर डालें, तो आंकड़े बताते हैं कि लाल गेंद के मिजाज में ढलना अभी बाकी है. उन्होंने अब तक खेले 12 प्रथम श्रेणी पारियों में महज 17.25 की मामूली औसत से 207 रन बनाए हैं. हालांकि, अंडर-19 यूथ टेस्ट में उनका प्रदर्शन शानदार रहा है, जहां उन्होंने ऑस्ट्रेलिया अंडर-19 के खिलाफ दो जबर्दस्त शतक जड़े थे. यह साबित करता है कि उनमें लंबी पारियां खेलने की क्षमता तो है, लेकिन सीनियर स्तर की लाल गेंद क्रिकेट में निरंतरता लाना अभी बाकी है.
मानसिक बदलाव और गियर बदलने की कलाकोच मनीष ओझा (Mainsh Ojha) के मुताबिक, वैभव के लिए सबसे बड़ा इम्तिहान तकनीक से ज्यादा मानसिकता का होगा. सफेद गेंद के प्रारूप में बल्लेबाज हर गेंद पर प्रहार करने की ताक में रहता है, लेकिन लाल गेंद की स्विंग और सीम के सामने यह रणनीति आत्मघाती साबित हो सकती है. नई लाल गेंद के सामने संयम बरतना, जोखिम को कम करना और खराब गेंदों का इंतजार करना ही लंबी पारी की नींव रखता है.
ओझा का स्पष्ट कहना है कि वैभव को अब अलग-अलग गियर में बल्लेबाजी करना सीखना होगा. टेस्ट क्रिकेट में हालात के अनुसार अपनी लय को धीमा और तेज करना पड़ता है. जब गेंदबाज हावी हों तो डिफेंस को मजबूत रखकर तूफान को टालना होता है और जैसे ही मौका मिले, स्कोरबोर्ड को आगे बढ़ाना होता है. कोच की साफ सलाह है कि वैभव दुनिया को यह दिखाए कि वह सिर्फ तेज 50 या 70 रन बनाने वाला बल्लेबाज नहीं है, बल्कि वह लंबी पारी बुनने की कला भी बखूबी जानता है.
घरेलू क्रिकेट का कठिन सफर और निरंतरता की शर्तआज के दौर में युवा खिलाड़ियों को टी20 क्रिकेट खेलने के ढेरों मौके मिलते हैं, लेकिन टेस्ट टीम का दरवाजा केवल घरेलू क्रिकेट की तपस्या से ही खुलता है. रणजी ट्रॉफी और दलीप ट्रॉफी जैसे टूर्नामेंट्स में एक सीजन के दौरान किसी खिलाड़ी को बमुश्किल 7 से 10 मैच ही खेलने को मिलते हैं. मनीष ओझा कहते हैं कि टेस्ट टीम में जगह बनाने के लिए इन सीमित मौकों में लगातार शतक और दोहरे शतक लगाने पड़ते हैं. यह प्रदर्शन किसी एक सीजन का तुक्का नहीं हो सकता, बल्कि लगातार दो से तीन साल तक घरेलू क्रिकेट में रनों का अंबार लगाना पड़ता है. इस सफर में उतार-चढ़ाव आएंगे, असफलताएं भी मिलेंगी, इसलिए वैभव के साथ-साथ क्रिकेट फैंस और चयनकर्ताओं को भी धैर्य दिखाना होगा.
हुनर पर पूरा भरोसाइन तमाम चुनौतियों के बावजूद कोच को वैभव की क्षमता पर अटूट विश्वास है. उनका कहना है कि वैभव ने नेट्स में लाल गेंद के साथ लंबा वक्त बिताया है और घंटों पसीना बहाया है. उनके पास हर तरह की गेंदबाजी को खेलने की ठोस बुनियादी तकनीक मौजूद है. अब सारा दारोमदार इस बात पर है कि यह 15 वर्षीय युवा खिलाड़ी मैदान पर उतरकर अपने टेम्परामेंट को किस तरह संभालता है. अगर वैभव ने लाल गेंद के इम्तिहान में खुद को ढाल लिया, तो भारतीय क्रिकेट को आने वाले समय में एक ऐसा मुकम्मल बल्लेबाज मिलेगा जो तीनों फॉर्मेट पर राज करने का दम रखता है.



