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‘क्या संविधान उस श्रद्धालु की रक्षा नहीं करेगा, जिसे मूर्ति छूने की इजाजत नहीं’, सबरीमाला केस में सुप्रीम कोर्ट का सीधा सवाल

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ सबरीमाला अय्यप्पा मंदिर मामले और धार्मिक अधिकारों से जुड़े कानूनी सवालों पर सुनवाई कर रही है. इस दौरान सीजेआई सूर्यकांत की अध्‍यक्षता वाली पीठ ने याच‍िकाकर्ताओं और मंद‍िर के पुजारी से तीखे सवाल पूछे. कोर्ट ने मंद‍िर के पुजारी से पूछा, क्या संविधान उस श्रद्धालु की रक्षा नहीं करेगा, जिसे मूर्ति छूने की इजाजत नहीं है? जब धर्म और आस्था के नाम पर किसी श्रद्धालु के साथ जन्म या जाति के आधार पर भेदभाव होता है, तो क्या न्यायपालिका और संविधान मूकदर्शक बने रह सकते हैं? सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम में आस्था, अछूत परंपराओं और संवैधानिक नैतिकता को लेकर वकीलों और जजों के बीच जोरदार बहस देखने को मिली.

सुप्रीम कोर्ट से 2018 के उस फैसले की समीक्षा करने की मांग की गई है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी. नवंबर 2019 में कोर्ट ने माना कि ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं’, अनुच्छेद 25, 26 और अनुच्छेद 14 यानी समानता का अधिकार के बीच के टकराव को सुलझाने के लिए एक बड़ी बेंच की आवश्यकता है.

दिन की शुरुआत सीनियर एडवोकेट वी.वी. गिरि की दलीलों से हुई, जिन्होंने कहा कि जब कोई श्रद्धालु मंदिर जाता है, तो उसे उस मंदिर के देवता और वहां की प्रथाओं में विश्वास होना चाहिए.

वी.वी. गिरि का तर्क: अनुच्छेद 25(1) के तहत मेरा अधिकार मंदिर के भीतर अपनाई जाने वाली प्रथाओं के साथ जुड़ा हुआ है. आगम शास्त्रों के अनुसार, केवल एक विशेष संप्रदाय के पुजारी ही मूर्ति को छू सकते हैं. यदि कोई अनधिकृत व्यक्ति मूर्ति को छूता है, तो उसे ‘अपवित्रता’ माना जाता है. ऐसे में राज्य का कोई भी हस्तक्षेप हिंदू उपासकों की धार्मिक आस्था का हिंसक उल्लंघन होगा.

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की टिप्पणी: “कुछ मंदिरों में आप शिवलिंग पर जल चढ़ा सकते हैं, जबकि अन्य में आप मूर्ति को छू भी नहीं सकते. यह छुआछूत से जुड़ा नहीं है, बल्कि पूजा की एक विशेष विधि (अनुष्ठान) का हिस्सा है.”

सुप्रीम कोर्ट का सबसे अहम सवाल

वी.वी. गिरि की ‘अपवित्रता’ और ‘जन्म के आधार पर अधिकार’ की दलील पर जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने एक बेहद तीखा और महत्वपूर्ण सवाल किया, “मैं पूरी श्रद्धा के साथ मंदिर जाता हूं. मेरा मानना है कि वह देवता मेरा रचयिता है. लेकिन वहां मुझे बताया जाता है कि मेरे जन्म या वंशावली के कारण मुझे स्थायी रूप से मूर्ति को छूने की अनुमति नहीं है. क्या ऐसी स्थिति में संविधान उस श्रद्धालु के बचाव में नहीं आएगा? रचयिता और उसकी रचना के बीच ऐसा भेदभाव कैसे हो सकता है? जन्म के आधार पर यह स्थायी अक्षमता कैसे जायज है और यह देवता को अपवित्र कैसे कर सकती है?” इसी पर जस्टिस पी.बी. वराले ने भी पूछा कि क्या तकनीक और शिक्षा के इस दौर में एक आस्तिक को तर्कशील नहीं होना चाहिए?

‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ टेस्ट को खत्म करने की मांग

धार्मिक मामलों में कोर्ट का दखल न हो:दोपहर के सत्र में सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों पर जोर दिया. उन्होंने तर्क दिया कि अदालतों को ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा परीक्षण’ को पूरी तरह से त्याग देना चाहिए. “अगर किसी प्रथा का धर्म से संबंध है, तो संप्रदाय जो कहता है, कोर्ट को उसे मान लेना चाहिए. एक गैर-धार्मिक अदालत को इन प्रथाओं का परीक्षण नहीं करना चाहिए.”

उन्होंने अनुच्छेद 26 (धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार) की तुलना अनुच्छेद 30 (अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक संस्थानों के अधिकार) से की. उन्होंने कहा कि जैसे अल्पसंख्यक संस्थानों को सामान्य संस्थानों से ज्यादा स्वायत्तता मिलती है, वैसे ही धार्मिक संप्रदायों को भी अपने मामलों को प्रबंधित करने की अधिक छूट मिलनी चाहिए. उन्होंने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 25 और 26 में प्रयुक्त “नैतिकता” का अर्थ बहुसंख्यक राय नहीं, बल्कि ‘संवैधानिक नैतिकता’ होना चाहिए.

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