Health

आप जो चॉकलेट खाते हैं क्या वह हाइजेनिक होती है? बनाते समय कैसे रखा जाता है हेल्थ का ख्याल

Last Updated:December 17, 2025, 19:44 IST

Chocolate and Health: आमतौर पर यह माना जाता है कि डार्क चॉकलेट सेहत के लिए अच्छी होती है. लेकिन लिमिट में. चॉकलेट कोकोआ से बनाई जाती है. इसमें मौजूद फ्लेवेनोएड और एंटीऑक्सीडेंट्स के सेहत पर कई फायदे हैं लेकिन सवाल है कि फैक्ट्रियों में जब चॉकलेट बनाई जाती है तो उस समय क्या सेहत का ख्याल रखा जाता है. चॉकलेट बनाते समय साफ-सफाई और हाइजीन का कितना ख्याल रखा जाता है, आइए इसके बारे में जानते हैं.आप जो चॉकलेट खाते हैं क्या वह हाइजेनिक होती है? कैसे समझें यह शेफ हैचॉकलेट खाने के फायदे या नुकसान.

Chocolate and Health: हमारे रोजना के जीवन में चॉकलेट रची बसी है. शायद ही कोई ऐसा ही जिसने चॉकलेट न खाई हो. वैसे डार्क चॉकलेट के कई फायदे हैं. इसे कोकोआ से बनाई जाती है. हेल्थ एक्सपर्ट की मानें तो डार्क चॉकलेट में कई तरह के एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं जो शरीर से फ्री रेडिकल्स को हटाकर ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करते हैं. ये ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के कारण ही कोशिकाओं में इंफ्लामेशन होता है और कई तरह की बीमारियां होती हैं. इसलिए चॉकलेट कोशिकाओं के डैमेज को रोककर बैड कोलेस्ट्रॉल को कम करता है और दिमाग की सेहत को बूस्ट करता है. इससे ब्लड सर्कुलेशन भी बेहतर होता है. पर सवाल यह है कि जो चॉकलेट हमारे पास पहुंचती है क्या वह हेल्दी होती है या उसे बनाने में हाइजीन का ख्याल रखा जाता है. यही सवाल हमने दुनिया की सबसे बड़ी चॉकलेट कंपनी नेस्ले के नेशनल कॉरपोरेट अफेयर के हेड कुंवर हिम्मत सिंह से की तो उन्होंने चॉकलेट के हाइजीन को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी दी.

चॉकलेट का रॉ मैटेरियल कितना हेल्दी

कुंवर हिम्मत सिंह ने बताया कि आप सब जानते हैं नेस्ले दुनिया की सबसे बड़ी फूड और वेबरेज कंपनी है. इस तरह हमारी यह जिम्मेदारी भी बनती है कि हम दुनिया की उतकृष्ट चॉकलेट को लोगों तक पहुंचाएं. हम किटकैट सहित 2000 से ज्यादा प्रोडक्ट बनाते हैं और सबमें हाई क्वालिटी की हाइजीन का ख्याल रखा जाता है. रॉ मैटेरियल के प्रत्येक चरण में कड़ी निगरानी की जाती है. हम जो भी कच्चा माल लेते हैं वह एफएसएसएआई से लाइसेंस प्राप्त वेंडर से ही लेते हैं. इसमें कई तरह की जांचें होती है. जो माल हाई क्वालिटी की होती है सिर्फ उसी को ही हम लेते हैं. बाकी को रिजेक्ट कर देते हैं. मसलन अगर हमें गेंहू या कोकोआ लेने हैं तो हम उन्हीं से लेते हैं जिसमें भारतीय मानक के हिसाब गुणवत्ता होती है. इसके बाद जब ये रॉ मैटेरियल फैक्ट्री में आते हैं तो हम इसकी गहन जांच करते हैं. कच्चे माल से लेकर चॉकलेट के पैकेजिंग स्टेज तक 40 मानकों पर हम इसका परीक्षण करते हैं. हर तरह से यह सुनिश्चित करते हैं कि कच्चे माल से किसी तरह की हेल्थ संबंधी दिक्कतें न हो.

विभिन्न रेगुलेशन से गुजरना जरूरी

चॉकलेट हेल्थ पर कोई प्रतिकुल असर न करे इसके लिए विभिन्न स्वायत्त निगरानी संस्थाओं से मंजूरी लेनी होती है. चॉकलेट हेल्दी है या नहीं, इसके लिए लोकल फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड रेगुलेशन (FSSAI) के मानकों का पालन किया जाता है. इसके लिए यह संस्था चॉकलेट की गहन रासायनिक जांच करती है. इस मानक को पार करने के बाद फूड सेफ्टी मैनेजमेंट स्टैंडर्ड द्वारा सर्टिफाइड किया जाता है. इस मानक पर शत प्रतिशत खड़ा उतरने के लिए नेस्ले को ISO 9001:2015 सर्टिफिकेट मिला हुआ है. वही फेक्टरी की लेबोरेटरी में प्रोडक्ट का हेल्थ पर असर को लेकर हमेशा रिसर्च चलती रहती है. इसके लिए इस लेबोरेटरी को NABL की ओर से सर्टिफिकेट प्राप्त है. लेबोरेटरी हमेशा यह सुनिश्चित करती है कि चॉकलेट या अन्य प्रोडक्ट से रत्ती भर भी स्वास्थ्य पर प्रतिकुल असर न पड़े.

कैसे समझें कि चॉकलेट से कोई हेल्थ समस्या नहीं होगी

फेक्ट्री में चॉकलेट बनाने की एक प्रक्रिया होती है. जो फेक्ट्री होती है वहां लगभग 500 से 700 मीटर के दायरे में ऑटोमेटिक मशीनें होती हैं. चॉकलेट बनाने के कई स्टेज होते हैं. सबसे पहले कोकोआ में विभिन्न सामग्रियों के साथ अनुकूल तापमान पर घोल तैयार किया जाता है. इसके बाद यह चॉकलेट के ब्लॉक तक पहुंचता है. इन ब्लॉकों में निश्चित मात्रा में घोल जाता है और यहां चॉकलेट आकार लेती है. इसके बाद नियत तापमान पर यह आगे बढ़ता और फिर इसके बार अलग-अलग होते हैं. इसके बाद ऑटोमेटिक रूप से चॉकलेट पर फॉयल की परत चढ़ती है और आखिर में इसकी पैकेजिंग होती है. 500-700 मीटर के दायरे में यह प्रक्रिया चलती रहती है और मशीन पूरी तरह से शीशे से ढकी रहती है. यानी अंदर कुछ भी जाने का सवाल नहीं है. फेक्ट्री के अंदर जो भी कर्मचारी होते हैं वह सिर्फ वर्दी में होते हैं. इसके अलावा उनके पास कुछ भी नहीं होता. फेक्ट्री में किसी तरह के बेल्ट, मेटल का सामान, सिक्के आदि ले जाना वर्जित है. काम करते वक्त सब एक खास तरह के मास्क से पूरे शरीर को ढके रहते हैं. मशीन में इस तरह के ऑटोमेटिक डिटेक्टर लगे होते हैं कि जैसे ही कुछ अतिरिक्त चीजें चॉकलेट के अंदर गई कि यह आवाज करने लगती है और उसी पल मशीन को रोक दिया जाता है और उस प्रोडक्ट के पूरे लॉट को हटा दिया जाता है. फिर मशीन की सफाई होती. इन सबके बाद दोबारा प्रक्रिया शुरू की जाती है. इस तरह देखा जाए तो बड़ी कंपनियों में चॉकलेट के हाइजीन पर खासा ध्यान दिया जाता है.

कितने दिनों तक चॉकलेट सुरक्षित

कुंवर हिम्मत सिंह ने बताया कि हमारे हर प्रोडक्ट पर मैनुफेक्चरिंग डेट, टाइम, शिफ्ट आदि दिया रहता है. इसके साथ ही पैकेट पर बेस्ट बिफोर यूज या एक्सपायरी डेट भी होती है. कोई भी व्यक्ति यदि उस अवधि तक इस चॉकलेट को खाए तो उसे किसी तरह का नुकसान नहीं होगा. अगर प्रोडक्ट एक्सपायरी डेट में होता है तो हम इसे मानक तरीके से डंप कर देते हैं.

About the AuthorLakshmi Narayan

Excelled with colors in media industry, enriched more than 19 years of professional experience. Lakshmi Narayan is currently leading the Lifestyle, Health, and Religion section at . His role blends in-dep…और पढ़ें

First Published :

December 17, 2025, 19:05 IST

homelifestyle

आप जो चॉकलेट खाते हैं क्या वह हाइजेनिक होती है? कैसे समझें यह शेफ है

Source link

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

Uh oh. Looks like you're using an ad blocker.

We charge advertisers instead of our audience. Please whitelist our site to show your support for Nirala Samaj